Last Update : 05 08 2017 12:15:47 PM

सत्यनारायण पटेल की नई कहानी 'नन्हा खिलाड़ी'

सत्यनारायण पटेल की नई कहानी 'नन्हा खिलाड़ी'  

ओह्ह…! कैसी थी वह रात! और कैसा था उस रात का चेहरा! बेशर्म काली बिल्ली-सी दाँत निपोरती! जबकि पूरी रात तो थी ही नहीं! रात का टुकड़ा भर था! हाँ.. अनन्त रात का टुकड़ा! अनन्त रात का अमूर्त चेहरा मेरे भीतर धुकधुकी बढ़ा रहा था। लेकिन वह नन्हा खिलाड़ी जैसे रात के अस्तित्त्व से ही बेख़र था, या रात के टुकड़े को मैदान समझ अपने खेल की मस्ती में मस्त था। बेफिक़्रा था! कहीं ऎसा तो नहीं था कि उसकी बेफिक़्री से रात भीतर ही भीतर जल-भुन रही थी। कहीं उसकी बेफिक्री ख़तरा तो न थी रात के लिए! या रात के लाड़ले माननीय दैत्य कुमार के लिए!  न… शायद ऎसा नहीं होगा! कहाँ रात और कहाँ नन्हा खिलाड़ी!  जैसे कि एक तरफ़ लंगोटी वाला गाँधी और दूसरी तरफ़ माननीय दैत्य कुमार उर्फ़ फकीरा।

जब मैं इन्दौर से दिल्ली रवाना हुआ था, रात थी। वापसी के लिए जब मैं नई दिल्ली स्टेशन पहुँचा था, रात थी। आसमान के आँगन में एक भी तारा-सितारा न था। लगा था कि कलमुँही रात ही चट कर गयी होगी- ढोकला या फाफड़ा समझ कर! रात का शौक व चटोरापन किसी से छुपा न था! ब्रह्माण्ड जानता था कि रात के लिए पूरी धरती जैसे इन्दौर की छप्पन व सराफा वाली गली थी—चटोरी। संभव था कि रात ने तारों-सितारों को पोहे-जलेबी या फिर पानी पूड़ी की तरह खा लिए हों!

तारों-सितारों से भरी विशाल आसमानी परात को चाट-पोंछ कर यूँ साफ़ किया था कि जैसे जर्मन शेफर्ड कुतिया ने प्लैट से नॉनवेज साफ़ किया हो! या किसी उद्योगपति ने बैंक लोन चाट लिया हो! और फिर आसमान के आँगन में अँधेरा लीप, होंठों पर जीभ फेरती टहलने लगी थी। जैसे उसे कुछ पता ही न था। और ऎसी भोली, भलीमानुष और सुलक्षणा बन रही थी कि जैसे अल्ला मियाँ की गाय हो! कहीं से उसकी कुरूपता न झलके इसलिए कृत्रिम रोशनी की जगर-मगर से मेकअप किए हुई थी।

धरती के इस टुकड़े पर रात कब से थी, एकदम सही-सही बताना मुश्किल होगा। हाँ, इतना याद आ रहा था कि जब मैं जन्मा था, तब भी रात थी। दादी-नानी ने बताया था कि जब उनकी दादी-नानी जन्मी थी, तब भी रात थी। मानो रात कोई अजर-अमर सत्ता सुन्दरी थी, जिसकी उम्र तो बढ़ती थी, मगर कभी बूढ़ी नहीं होती थी!

ढ़िढ़ोरा तो यही पिटा जाता था कि लोगों द्वारा लोगों के बीच से ही, लोगों के लिए ही माननीय दैत्य कुमार चुना जाता। हालाँकि असल में जगजाहिर था कि रात ही माननीय दैत्य कुमार चुनती थी। रात ही राजतिलक करती और फिर उसके ज़रिए अपनी हुकुमत चलाती। प्रोपोगेंडा यह भी रहता था कि एक बार जो माननीय दैत्य कुमार चुना जाता। फिर वह किसी दल-पार्टी, जाति-नस्ल, और धर्म-सम्प्रदाय का नहीं रह जाता। लेकिन इतिहास में ऎसा कभी नहीं हुआ था। जो भी माननीय दैत्य कुमार चुना जाता था, उसका सारा चिंतन रात के हित में होता था। उसके सारे भाषण रात के प्रशंसा गीत होते थे। सीधी और सही बात यह कि माननीय दैत्य कुमार रात्रहित साधने और रात्रद्रोही स्वर कुचलने के लिए ही प्रतिबद्ध होता था, और था भी।

हालाँकि माननीय दैत्य कुमार स्थाई नहीं होता था। महज पाँच साल के लिए चुना जाता था। पाँच साल बाद रात को फिर से वही सब दिखावा करना पड़ता था। कभी वह माननीय दैत्य कुमार की शक्ल बदल लेती थी और कभी नाम, कभी पुरानी शक्ल का ही नवीनीकरण करवा लेती थी। लोगों को भी कुछ बदलाव महसूस हो, इसलिए कभी तिरंगे में केसरिया कुछ ज्यादा उभारा जाता था। कभी चरखे की ताड़ियों के साथ-साथ चाँद-तारे भी अदृश्य रूप से महसूस करवा दिए जाते थे।

कभी लंगोटीवाले को चरखे के पास से विस्थापित कर, माननीय दैत्य कुमार को बैठा दिया जाता था। कभी जगर-मगर और चकाचौंध इतनी बढ़ा दी जाती थी कि रात में दिन का भ्रम होने लगता था। कभी-कभी तो रात दिन से ज्यादा उजली नज़र आने लगती थी। हालाँकि यह सब ऊपरी तौर पर होता था। भीतरी तौर पर रात की नीति-कर्म, गुण-दोष और व्यावहार यथावत होते थे। यदि भीतर ज़रा-सा भी कुछ बदलता था, तो रातहित ही सर्वोपरी होता था। इतने सोच-विचार के बाद मस्तिष्क में यह बात किसी अयात की तरह उतरी थी कि रात अनन्त थी, अखण्ड थी, बलशाली थी, और उससे मुक्ति का सपना बचकानापन था, आत्महत्या की तैयारी थी और मृत्यु को पीले चावल देना था।

क्योंकि मैंने जीवन में उतना वीभत्स, उतना क्रूर व सख़्त न रात का टुकड़ा और न माननीय दैत्य कुमार देखा था, कि जो जपता तो था राम-राम ही, लेकिन उसके पेट में भरा रहता था गाय का माँस। जब नानी थी, कहती थी कि जिसके पेट में गाय का माँस भरा हो, वह कैसा ही माननीय दैत्य कुमार हो, वह चाहे जितना मितरों-मितरों या राम-राम जपे, वह न कभी मितरों का, न कभी राम का हो सकता। नानी को गुजरे बीस-बाईस बरस हो गए, लेकिन बात उस वक़्त भी सटीक थी, और तब भी लग रही थी। 

स्टेशन के भीतर दाखिल होकर मैं जहाँ बैठा था, वह न फुटबॉल मैदान था, न ही वहाँ मैच हो रहा था। लेकिन फिर भी कुछ ऎसा देखा, जो किसी फुटबॉल मैच में न देखा था। जैसे धड़कने गड़बड़ा गयी थीं। कलेजा मुँह को आ गया था। आँखों के सामने स्मॉग छा गयी थी। कानों में माननीय दैत्य कुमार का मितरों-मितरों या फिर अट्टहास गूँज रहा था। गूँजे भी क्यों नहीं, माननीय दैत्य कुमार रात का सबसे ताक़तवर सेवक जो था। दीवार पर टँगी एल ई डी स्क्रीन पर माननीय दैत्य कुमार का भाषण चल रहा था।  या फिर विज्ञापन में माननीय दैत्य कुमार उँगली व आँख दिखाता नज़र आ रहा था।

मैं लोहे की एक कुर्सी पर बैठा था- लोहे की तरह ही ठंडा और ख़ामौश, लेकिन कब तक बैठा रह सकता था उस तरह। मुझे इन्दौर पहुँचना था और पहुँचाने वाली लोहे की ट्रेन सराय रोहिला से आनी थी। लेकिन ट्रेन आने में काफी वक़्त था। दीवार पर टँगी घड़ी सात बजा रही थी, और ट्रेन क़रीब दस बजे आने वाली थी। तीन घन्टे न घड़ी के काँटे गिनते हुए काट सकता था, न ही विज्ञापन या माननीय दैत्य कुमार के भाषण को झेलते हुए।  

उस वक़्त कुछ सूझ नहीं रहा था कि  तीन घन्टों का क्या करूँ! मोबाइल में फ़िल्म देखूँ! फेसबुक, वॉट्स एप पर ख़र्च करूँ! किसी वेबसाइट से कुछ पढ़ लूँ! सोचा कि कुछ भी कर लूँ! किसी न किसी तरह इंतज़ार तो करना ही होगा! मैंने अपना एन्ड्रॉयड फ़ोन निकाला। उसमें इन्टरनेट डाटा भी था, लेकिन मोबाइल चालू करते ही देखा कि बैटरी ख़त्म हो रही! मेरे पास न पॉवर बैंक था, न चार्जर था, जिससे बैटरी चार्ज कर लेता। भीतर ही भीतर केचुओं की तरह कुलबुलाहट हुई- ओह्ह.. कैसे कटेंगे तीन घन्टे!

तभी आशा की किरण नज़र आयी और जैसे वक़्त को काटने की आरी ही हाथ लग गयी थी। ख़ुशी हुई थी कि विज्ञापन व माननीय दैत्य कुमार के भाषण को अनदेखा-अनसुना करके भी वक़्त काट सकूँगा। मैं जहाँ बैठा था न, वहाँ ठीक मेरे सामने वह नन्हा खिलाड़ी खेल रहा था।

दरअसल वह जगह जहाँ मैं बैठा था, प्लैटफार्म वाली जगह नहीं थी। वह एक नम्बर प्लैटफार्म और स्टेशन के तमाम आॉफ़िसों की ऊपरी मंजिल थी। जहाँ यात्री प्रतीक्षालय था, जिसकी भीतरी व्यवस्था जो थी, सो तो थी ही, लेकिन बाहर भी डेढ़-दो सौ कुर्सियाँ लगी थीं, जिनमें से पहली लाइन की एक कुर्सी पर मैं बैठा था। मेरे दाईं बाजू एक मोटा-सा आदमी और बाईं बाजू छरहरी-सी एक युवती बैठी थी। दोनों मोबाइल पर व्यस्त थे।

वहीं बाईं बाजू लम्बी-लम्बी दो-तीन क़तार लगी थीं। मुझे लगा था कि वहाँ एटीएम या डिपाजिट मशीन होंगी, जहाँ लोग काला धन जमा करने और सफ़ेद निकालने के लिए लाइन में लगे होंगे! उस लाइन में आम लोग तो थे ही, साथ ही मुझे कुछ कवि, क़िस्सागो, पाठक, श्रोता और एन जी ओ कर्मी जैसे लोग भी नज़र आए। कुछ सम्पादक और प्रकाशक भी। लगा था कि भीतर कोई लिट फेस्ट (लिटरेचर फेस्टिवल) हो रहा होगा! जहाँ साहित्य अकादमी प्राप्त कवि चुटकला या क़िस्सागो जाँघ से जाँघ रगड़ाने का क़िस्सा सुना रहा होगा!

क़तार को निरंतर लम्बी होते और उसमें झूमा-झटकी बढ़ते देख, मेरी उत्सुकता बेचैनी की हद पार करने लगी और मुझसे बैठा न जा रहा था। मैं उठा, और अपनी कुर्सी पर चढ़ क़तार तरफ़ देखने लगा था। देखते ही बुदबुदया था कि धत्त तेरी की,  और फिर ज़ोर से हँसने लगा था। हालाँकि उसमें हँसने जैसी कोई बात थी नहीं, पर यह बात तब समझ में आयी थी, जब युवती एवं मोटे ने मुझे अजीब-सी नज़रों से देखा था। कुछ ऎसे, जैसे मैं साइकी हूँ। शायद उनका यूँ देखना सही हो, क्योंकि क़तार प्रसाधन केन्द्र के आगे लगी थी, और कोई अनोखी बात नहीं थी। जगजाहिर था कि रात की हुक़ुमत में कहीं भी क़तार लगना साधारण बात थी, यह जानते-बूझते भी मैं हँसा था। लेकिन उस मोटे और युवती के पास, मुझ पर हँसने का शायद वक़्त न था, वे फिर से अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हो गए थे। 

मैं पुनः बैठ गया था और  जब बैठा तो यूँ लगा कि जैसे मैं कुर्सी पर नहीं बैठा था। बल्कि बैठा था अवचेतन के विशाल मचान पर। अकेला। चुप। आस-पास रात और सिर्फ़ रात। रात की साड़ी में तारे-सितारे, चाँद-सूरज जैसे तमाम चमकीले ग्रह हीरे-मोती की तरह जड़े थे। उन ग्रहों की रोशनी में दूर-दूर तक रंग-बिरंगे फूल-फल, तितली, अनाज, पशु-पक्षी, नदी-झरने, सागर-महासागर आदि-आदि भी नज़र आ रहे थे। मैं मुग्ध था कि स्वर्ग में होने जैसा अनुभव कर रहा था।  जैसे लोहे की नहीं, किसी और ही ट्रेन में सफर कर रहा था।

तभी भीतर कहीं से धरती का खयाल रिस आया था। मेरी मुग्धता व आन्तरिक ख़ुशी रेशा-रेशा बिखरने-सी लगी थी, बल्कि लहूलुहान-सी होने लगी थी, जैसे माननीय दैत्य कुमार ने सर्जिकल ब्लैड से हमला कर दिया था। मन की धरती पर करूणा से लबरेज भाखड़ा नांगल, सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर जैसे अनेक बाँध फूट पड़े थे। भीतर सब कुछ डूब रहा था और मैं एकदम अकेला, असहाय व रोता हुआ किनारे पर खड़ा था, और हमला यहाँ भी रुका नहीं था, बल्कि और बढ़ गया था, और बहुत तेज़, एकदम नाकाबिले बर्दाश्त-सी गँध मेरे धीरज का दम घोटने पर उतारू थी.

जबकि गँध, प्रसाधन केन्द्र की नहीं थी या फिर उस शौचालय को देख कर ही अंतस में वह खयाल रिस उठा था, कि बड़े-बड़े माननीय दैत्य कुमार सदियों से धरती पर सिर्फ़ शौच ही की राजनीति, शिक्षा-दीक्षा और फ़सल बोते आ रहे थे! हाँ..शौच! धर्म, जाति, नस्ल, साम्प्रदायिकता, बारुद और तोप-तमचों की शौच। धरती पर शौच के बड़े-बड़े पर्वत खड़े हो गए। शौच के दरिया-सागर और महासागर हो गए। शौच से उठती स्मॉग धरती की ख़ुशबू को विस्थिपित कर रही। शांति के कबूतर के पर कुतर रही।

रफ़्ता-रफ़्ता मेरे अवचेतन में भी अजीब-सी स्मॉग और गँध भरने लगी थी और मैं  सोचने लगा था कि जीवन कैसा होगा! अगर यूँ ही बढ़ती रही स्मॉग और गँध! ग़ैरक़ानूनी होगा बग़ैर मॉस्क व आॉक्सीजन सिलेण्डर के घर से निकलना! निकले तो पकड़ लेगी पुलिस और आत्महत्या का मुक़दमा दर्ज़ करेगी! क्या-क्या होगा, पता नहीं! जैसे ज़िन्दगी की ट्रेन शौच के पर्वत, दरिया-सागर के बीच से गु्ज़र रही थी। ख़तरे की घँटी बजाती हुई। खयाल ने इस क़दर घापे में लिया था कि दम फूलने लगा था। उबर भी पाता कि नहीं अपने दम। तभी एकदम से उस नन्हे खिलाड़ी ने ध्यानाकर्षित किया था, जो खेल रहा था बेफिक़्रा। कोई बेनामी खेल।

ऋतु शरद थी, लेकिन हवा खुश्क थी। न ज़रा ठंडी, न नम थी। अलबत्ता पाँच सौ-हज़ार के नोट की हत्या और ट्रम्प की जीत की ख़बरों से महौल में गर्माहट थी। भक्तों को लग रहा था कि जैसे अमेरीका में माननीय दैत्य कुमार के सगे भाई की जीत हुई हो! गर्व व अहंकार से भक्तों की छातियाँ फूल-फूल कर फटी-सी जा रही थीं। मेरे पास गर्म जॉकेट था, लेकिन पहनने की ज़रूरत न थी,  सो बैग पर यूँ ही पड़ा था।

मेरे सामने फर्श पर ही बैठे थे बहुत सारे यात्री। नहीं थी ऎसी कोई बैंच या कुर्सी, जैसी मेरे पीछे थी। कुछ ने बिछायी थी दरी-चादर और  कुछ उखड़ले ही लेटे-बैठे थे। एक न एक दिन जाना तो सभी को था एक ही जगह। मगर शौच की तीव्र गँध से सभी मतिभ्रम हो गए थे शायद। सभी को लोहे की ट्रेन का ही इंतज़ार था, जबकि वह कहीं पहुँचाती नहीं थी। यहाँ से बैठते थे, वहाँ उतार देती थी, वहाँ से बैठते थे, यहाँ उतार देती थी।

वहाँ बैठे-लेटों में ऎसे भी थे कुछ कि जिन्हें शायद लोहे की ट्रेन का इन्तज़ार नहीं था। न उन्हें कहीं जाना था, न किसी का इन्तज़ार था। बैठ थे चूँकि वहाँ बैठने की जगह थी। सड़क किनारे बैठना-लेटना ख़तरे से ख़ाली न था। फुटपाथ पर धुकधुकी लगी रहती थी कि कोई रौंदता न गुज़र जाए! वह जगह बाहर की तुलना में सुरक्षित और साफ़-सुथरी भी थी। उनकी बेफिक्री ऎसी थी, जैसे घर के आँगन में बैठे हों! उनकी बेफिक़्री से मैं ईर्ष्या तो कर सकता था, लेकिन बेफिक़्र नहीं हो सकता था। अगर हो सकता, तो फिर नन्हे खिलाड़ी की तरह अपनी मस्ती में मस्त होता। लेकिन नहीं था, क्योंकि शौच भरी थी मेरे भीतर भी। नसों में जैसे बह रही थी शौच की ही नहरे! नदी-नाले। नन्हे खिलाड़ी को नहीं छुआ था शौच की गँध ने शायद! छू लेती, तो फिर वह भी कहाँ बच्चा रहता, और कैसे खेल पाता, यूँ बेफिक़्रा! कभी चाँद को लुढ़काता। कभी सूरज को गुड़काता।

पता नहीं था कि  नन्हा खिलाड़ी जो खेल रहा था, दरअसल उस खेल का भी कोई नाम था कि नहीं! खेल तो खेल उन खिलौनों का भी कोई नाम था कि नहीं, जिन्हें मैं चाँद-सूरज कह रहा हूँ! जो खिलौने मुझे चाँद-सूरज नज़र आ रहे थे, वे दरअसल प्लास्टिक के गोल-गोल टुकड़े थे। कुछ ऎसे गोल कि जो न गेंद थे, न ग्लोब थे, न पहिए थे और न  ही किसी मन्दिर-मस्जिद के गुम्बद थे! कुछ यूँ लग रहे थे कि जैसे भारत माँ के स्तन हों और जिन पर माननीय दैत्य कुमार ने दाँत गड़ा-गड़ा कर गड्ढे ही गड्ढे कर दिए हों! गड्डेदार थे, फिर भी उजले और गोल थे।

नन्हा खिलाड़ी उनसे ऎसे गदगद भाव से खेलता कि जैसे वे न स्तन और न प्लास्टिक के टुकड़े थे, बल्कि चाँद-सूरज ही थे। और उसका खेलना कुछ यूँ था कि इधर से उधर और उधर से इधर लुढ़काना और पकड़ना, बार-बार ख़ुद ही लुढ़काना और ख़ुद ही पकड़ना था। इस खेल का भलेही कोई नाम न था। लेकिन नन्हा खिलाड़ी इस खेल में इतना डूबा था कि जैसे इबादत कर रहा था। उसके पेंट की जीब ख़राब थी कि नहीं, नहीं मालूम, लेकिन खुली ज़रूर थी, इसलिए दौड़ते वक़्त अक्सर तिंदोरी बाहर निकल आती थी।  

वह चाँद-सूरज को लुढ़काने की कोई योजना नहीं बनाता था। माननीय दैत्य कुमार की तरह अचानक ही निर्णय लेता था और जिधर मन करता उधर,  कभी चाँद, तो कभी सूरज लुढ़का देता था। यह ध्यान रखे बिना कि उधर कौन लेटा-बैठा था और  कौन आ-जा रहा था! कि क्या नफ़ा-नुकसान होगा! न वह यह जानता था कि वह भारत माँ के स्तन या चाँद-सूरज लुढ़का रहा था। न उसने माननीय दैत्य कुमार के बारे में कुछ सुना था, न उनकी शौच के पर्वत, दरिया-सागर के बारे में कुछ जानता था। उसे किसी तरह की गन्ध व स्मॉग परेशान नहीं कर रही थी, क्योंकि उसके तो जन्म से ही सब कुछ ऎसा था। न उसने साफ़ हवा के बारे में सुना था, न कभी कल्पना की थी। अगर उसके चाँद-सूरज किसी लेटे-बैठे या गुज़रते यात्री से न टकराए, तब तो पूरी धरती पर लुढ़कते रहते। लेकिन वे किसी दीवार से, पीलर से, किसी के पैर से, लेटे हुए के सिर से या डस्टबीन से टकराकर रुक जाते थे।

नन्हा खिलाड़ी हँसता। किलकता। कभी कमर से निंगलता-खिसकता थेगलीदार पेन्ट पकड़ता। कभी जीब से बाहर निकली तिंदोरी अन्दर करता, और  चाँद या सूरज जो भी लुढ़काया होता था, उसके पीछे-पीछे ऊँकड़ू दौड़ता था। एक हाथ से उठाता और दूसरे हाथ में पकड़े हुए को फिर लुढ़का देता। जिस दिशा में चाँद-सूरज लुढ़कते थे, उधर जो भी बैठे-लेटे रहते थे, उनके चेहरों पर मुस्कान का उजास फैल जाता था। जो चेहरे एंड्रायड मोबाइल में खोए थे, कुछ पल के लिए उनका भी ध्यान खींच लेता था। यूँ ही नन्हा खिलाड़ी खेल में मगन था।

एक बार क्या हुआ कि नन्हे खिलाड़ी ने चाँद लुढ़काया! उधर, जिधर तीन औरत बैठी थीं। औरतों को नन्हा खिलाड़ी जानता था, लेकिन चाँद लुढ़काने से पहले यह नहीं जानता था कि तीन औरत उधर बैठी क्या कर रही थीं!

उन औरतों के लिए न नन्हा खिलाड़ी नया था, न उसके चाँद-सूरज लुभावने थे। उनके मुँह एक-दूसरी तरफ़ थे। उनके बीच साग-भाजी की पोलीथिन रखी थी। उनके हाथ में रोटियाँ थीं। यानी कि वे खाना खा रही थीं और ख़ुश थीं। 

फिर चाँद लुढ़कते-लुढ़कते साग-भाजी पर चढ़ गया था और रुका वहाँ भी न था। केसरिया साड़ी वाली बुढ़िया के घुटने से न टकराता, तो नीचे रेल पटरी पर गिर कर ही रुकता। बुढ़िया की झुर्रियों पर दर्द की बिजली कौंध गयी थी। उसने बाएँ हाथ से चाँद को उठाया, और आँखों में रोष भर नन्हे खिलाड़ी को देखने लगी। मुझे लगा था कि बुढ़िया चाँद सहित नन्हे खिलाड़ी को किसी मंगल ग्रह पर न फेंक दे! मंगल पर न सही नीचे रेल पटरी पर ही फेंक दे! हरी साड़ी वाली के चेहरे पर भी कुछ अजीब से भाव थे। लेकिन भला हो सफ़ेद साड़ी वाली का। उसने केसरिया साड़ी वाली के हाथ से चाँद लिया और स्नेहिल मुस्कान के साथ नन्हे खिलाड़ी के हाथ में चाँद पकड़ाते हुए इशारे से कहा- जा उधर खेल।  

उन बुढ़ियाओं के चेहरों पर सिलवटों-झुर्रियों के सघन जाल थे। फिर भी बुढ़ियाएँ बेफिक़्र थीं।  वे उम्र और समझ की उस ऊँचाई पर थीं, जहाँ से जाति-धर्म, सम्प्रदाय-नस्ल के जाल और अमीर-ग़रीब के बीच की खाइयाँ गौण नज़र आ रही थीं- एकदम बेमतलब और फालतू! और वे पुनः ख़ुशी-ख़ुशी खाना खाने लगी थी। उनकी ख़ुशी का राज था कि जैसे वे जानती थी कि वे जब कभी, जहाँ कहीं पहुँचेगी, लोहे की ट्रेन से नहीं पहुँचेगी! अब तो ज़िन्दगी की ट्रेन जब कभी थमेगी, तब ही कहीं पहुँचेगी। इसलिए उन्हें न किसी ट्रेन का इन्तज़ार था, न माननीय दैत्य कुमार से किसी घोषणा की फिक़्र या उम्मीद थी।   

उनकी निश्चिंतता और बेफिक़्री देख मैं आश्चर्य में था कि जब शौच से उठती गंध और स्मॉग के बीच साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था, तब भी वे ख़ुश थीं। अपने पास जो कुछ था, मिल-बाँट खा रही थीं। मुझे आश्चर्य के साथ-साथ ख़तरे की गँध भी महसूस हो रही थी। हाँ.. ख़तरे की गँध! क्योंकि यह हरकत अनन्त रात के प्रधान सेवक माननीय दैत्य कुमार की पूरी मेहनत और शौच के ख़िलाफ़ थी। मिल-जुल रहना, एकजुटता प्रदर्शित करना, शांति-भाईचारा का प्रचार-प्रसार करना, हक़-ईमान की बात करना, या संविधान जैसी किसी मृत किताब की बात करना, या रात को रात या फिर कलमुँही कहना,  अघोषित रूप से प्रतिबंधित था। शौच के व्यापारियों की मंशा के विरूद्ध था। रात्रद्रोह था। ख़ैर..।

मैं मन ही मन ख़ुद से बतियाने लगा था कि ख़ुदा ख़ैर करे! औरतों पर किसी की नज़र न पड़े! वरना किसी अख़बार या टी वी चैनल की तरह उनके जीवन पर ग्रहण लग जाएगा।

मेरे भीतर संदेह भी साँस ले रहा था कि मैं जाने-अनजाने में कुछ ऎसा तो नहीं कर रहा हूँ, जो अनन्त रात को पसंद नहीं या उसके विरूद्ध हो! मुझसे रात की अखण्डता को ख़तरा तो नहीं! मेरी लोहे-भंगार सी सोच, कहीं माननीय दैत्य कुमार की सोने जैसी शौच के ख़िलाफ़ तो नहीं! कहीं मैं रात्रद्रोही तो न मान लिया जाऊँगा! क्या करूँ! इन्सान बनूँ कि रात्रभक्त! माननीय दैत्य कुमार का पिछवाड़ा चाटूँ कि गाल बजाऊँ! गाल बजा नहीं सकता, क्योंकि उसकी सुरक्षा में सेना-पुलिस तैनात। पिछवाड़ा चाटना भी कहाँ आसान! महाँकाल की भस्मारती में खड़े भक्तों की क़तार से लम्बी पिछवाड़ा चाँटने वाले भक्तों की क़तार। फिर न मेरी महाँकाल में आस्था थी और न दैत्य कुमार में रुचि थी! मौन कुमार बने रहने में ही मुझे भलाई सूझी थी और मैं मौन कुमार बने बैठा था।

मौन कुमार बने बैठा था, फिर भी चैन कहाँ था। आँतों में गुड़गुड़ाती गैस की तरह मग़ज़ में कुछ न कुछ कुलबुला रहा था। बहुत शिद्दत से महसूस हो रहा था कि मैं इतना डरपोक, कायर याकि फट्टू जीवन में कभी नहीं रहा था। ख़ुद से घृणा का काँटा भीतर ही भीतर कहीं चुभ रहा था। भीतर अचानक से मितली का ऎसा तूफ़ान उठा था कि मैं डस्टबीन की तरफ़ भागा और ओ..ओ… कर दो-तीन उलटियाँ की, तब कुछ सामान्य हुआ था। ख़ुद पर व्यंग्य करते बुदबुदाया- लो इंसानियत बाहर हो गयी, अब रात्रभक्त बनना आसान होगा! माननीय दैत्य कुमार का पिछवाड़ा चाटने में शहद चाटने जैसा आनन्द मिलेगा!

फिर अपनी कुर्सी की तरफ़ बढ़ते हुए सोचा था कि क्यों न ऎसा करूँ! अपने मोबाइल से नन्हे खिलाड़ी और औरतों का वीडियो बना लूँ! वीडियो माननीय दैत्य कुमार को वॉट्स एप कर दूँ! मानीनीय दैत्य कुमार रात्रभक्त की टोली भेज सर्जिकल स्ट्राइक करवा देंगे! रात्रद्रोहियों का सफ़ाया हो जाएगा! मुझे पद्मश्री और पद्मभूषण की चाह नहीं। काला धन सफ़ेद करवाने की चाह नहीं! बस.. माननीय दैत्य कुमार की कृपा दृष्टि हो, जीवन सफ़ल हो जाएगा! मैंने महसूस किया था कि इतना सोचते ही मेरे भीतर अपार ऊर्जा का संचार हुआ था और मेरे दिमाग़ में तेज़ी से शौच का टीला उगता महसूस हुआ था, जिसकी परछाईं आँखों में महसूस हो रही थी।

जब मैं वापस अपनी जगह बैठा था, तो मैंने क्या देखा! देखा कि बग़ल में बैठी युवती मुझे अजीब-सी नज़रों से देख रही। और अपनी नाक को रुमाल से ढँक रही। सोचा कि युवती को किसकी गन्ध आ रही होगी! उलटी की गयी इन्सानियत की या मग़ज़ में उगे शौच के टीले की! फिर वह सुन्दर-सी लड़की अचानक से मुझे बहुत ख़राब लगी। इच्छा हुई थी कि उसकी टी-शर्ट-जीन्स उतार लूँ। पटरी पर फेंक दूँ और उसे शौच से लिथड़ दूँ! मैंने महसूस किया था कि माननीय दैत्य कुमार की शौच तेज़ी से निर्भिक व दुस्साहसिक बना रही थी मुझे।

मैं निश्चित ही कुछ न कुछ करने वाला था कि भीड़ के रेले में से आदमी जैसा दो पाया, बल्कि एक आदमी ही प्रकट हुआ था। वह लगभग मेरा हम उम्र, यानी चवालीस-पैंतालीस का ही न था, बल्कि हुलिए से चलता-फिरता शौच का टीला था। उसने कमर से नीचे पेंट और ऊपर केसरिया टी शर्ट पहनी थी। टी शर्ट पर स्वामी विवेकानन्द की तस्वीर छपी थी। मुझे शंका हुई थी कि कहीं ये भक्त गैंग का तो नहीं! ख़ुशी थी कि माननीय दैत्य कुमार का सूचना तंत्र कितना मज़बूत था। मैं तो सोच ही रहा था कि उन्होंने भक्तों की गैंग से एक भक्त भेज दिया था। अब नन्हा खिलाड़ी और बुढ़ियाएँ कैसे बेफिक़्र रहेंगी! अभी वह सब कुछ तहश-नहश कर देगा!

लेकिन मेरी ख़ुशी ज्यादा देर न रह सकी थी, क्योंकि उस आदमी की कलाई खुल गयी थी। वह भक्त नहीं, भूखा था। वह उन बूढ़ी औरतों से इशारे में खाना माँग रहा था। उसके इशारे करने के ढँग से ही समझ में आया कि वह बोल नहीं सकता था। नहीं बोल सकने वाले, इशारों में बात कैसे करते हैं, मैं समझता था, क्योंकि इन्दौर में मेरे घर सामने के घर में दो बहने रहती थीं, जो जन्म से गूँगी थीं। उन्हें बात करते देखा करता था। ताज्जुब की बात ये थी कि खाना खा रही औरतें भी गूँगी ही थी।   

मैंने सोचा था कि क्या आदमी किसी औरत का पति होगा! लेकिन लगा था कि नहीं.. शायद नहीं होगा! क्योंकि तीनों ही औरतें आदमी से बहुत बड़ी-बूढ़ी थीं। हाँ… किसी का बेटा या भाई होगा! लेकिन शायद नहीं होगा! अगर होता तो औरतों से खाना माँगने की बजाए, उन्हीं के साथ बैठ कर खाता! शायद भारत माता का लाल था! पता नहीं, जो भी था। बहरहाल केसरिया साड़ी वाली ने उसे रोटी थमायी, सफ़ेद साड़ी वाली ने साग-भाजी की पोलीथिन दी और हरी साड़ी वाली ने मुस्कान बिखेरी। आदमी दाईं बाजू की दीवार तरफ़ बढ़ा और पीलर व डस्टबिन के बीच बैठ खाना खाने लगा था। आदमी श्वान की-सी गति से चबर-चबर खा रहा था। टी शर्ट पर स्वामी विवेकानन्द चिंतित थे कि भारत माँ का लाल आदमी से क्या होता जा रहा! लेकिन आदमी के पेट में जैसे-जैसे रोटी जा रही थी, उसके चेहरे पर तृप्ति उभर रही थी।    

मेरे सामने सैकड़ों यात्री फर्श पर बैठे थे। उनमें भी कुछ औरतें, कुछ बच्चे थे, जिन्हें कहीं नहीं जाना था। मुझसे क़रीब बारह-पन्द्रह फिट की दूरी पर जो औरत बैठी थी, वह नन्हे खिलाड़ी की माँ थी। वह गुलाबी रंग की सलवार-कमीज पहने हुए थी और कत्थई रंग का दुपट्टा गले में डाले हुए थी। उसकी आँखें सूखी-सूखी  और त्वचा ऎसी थी कि जैसे किसी ने सारा लावण्य सोख लिया था। अट्ठाइस-तीस बरस की लग रही थी। नन्हा खिलाड़ी तो उसका बच्चा था ही, एक बच्चा और उसकी गोदी में था। गोदी वाला बच्चा कुछ ही माह का था, जो अभी बैठना नहीं सीखा था। औरत बार-बार नन्हे खिलाड़ी को अपने पास बैठने का कह रही थी, लेकिन नन्हा खिलाड़ी चाँद-सूरज से खेलने में ही मगन था।

नन्हे खिलाड़ी की चंचलता और उसका खेल मेरा ध्यान खींच रहा था। नन्हे खिलाड़ी ने जो पेन्ट पहनी थी, वह जीन्स नहीं थी। लेकिन कुछ ऎसी डिजाइन की थी कि जैसी आज कल के युवक जीन्स पहनते।  घुटने, जाँघ और जाने कहाँ-कहाँ से फटी या रफू की हुई। पेन्ट के ऊपर धारीदार मैली शर्ट थी, जिसकी जेब उधड़ी हुई थी। लेकिन नन्हा खिलाड़ी ख़ुश था। उन तीन औरत, उस आदमी और अपनी माँ से भी ज्यादा ख़ुश था। उसे खेलता देखते हुए मैं शौच की गन्ध और स्मॉग को भूल-सा जाता था।

(सत्यनारायण पटेल की कहानी 'नन्हा खिलाड़ी' का अगला हिस्सा पढ़िए कल। कहानी कैसी लगी, बताने के लिए मेल करें editorjanjwar@gmail.com पर।)

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Posted On : 05 08 2017 12:15:47 PM

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