Last Update : 06 08 2017 02:31:00 PM

नन्हा खिलाड़ी

सत्यनारायण पटेल की कहानी 'नन्हा खिलाड़ी' का शेष भाग

नन्हे खिलाड़ी की माँ की आँखें फटी की फटी रह गयी थीं और पहली-दूसरी जहाँ की तहाँ खड़ी रह गयी थी। नन्हा खिलाड़ी बॉल की तरह हवा में था...

फिर नन्हे खिलाड़ी ने सूरज लुढ़काया और सूरज भी चाँद की तरह उन औरतों के बीच पहुँच गया था। सूरज हरी साड़ी वाली के घुटने से टकरा कर रुका। उसने सूरज को उठाया और नन्हे खिलाड़ी की माँ तरफ़ लुढ़काते हुए इशारे से कहा- जा अपनी माँ के पास खेल!

फिर तीनों औरत हँसने लगी थीं। उनकी हँसी कुछ अजीब-सी थी। फिस...फिस...। उनकी हँसी से मेरे भीतर कुछ भीगने लगा था। कुछ सिहरने लगा था। पता नहीं था कि औरतें जन्मजात मूक थीं या रात की मुखालिफ़त का दण्ड भोग रही थीं! या फिर माननीय दैत्य कुमार ने उनकी जीभ खिंचवाकर अपने जूते का भीतरी तला बनवा लिया था! या कि अपनी जॉकेट की कालर बनवा ली थी!

उधर सूरज दो यात्रियों के पैरों के बीच से लुढ़कते हुए एक लड़की, ‘जो कि पूनम के चाँद-सी सूरत वाली थी’ के पैरों से टकराया था। चूँकि पूनम की चाँद तेईस-चौबीस की थी, और एंड्रायड फोन में अपने ईद के चाँद से मुखातिब थी, एकाएक पैरों से सूरज टकराया तो चौंक उठी थी-उई मम्मी!

नन्हा खिलाड़ी थोड़ी दूरी पर ठिठक गया था। डर था कि पूनम का चाँद कहीं दोपहर का सूरज न बन जाए! पूनम के चाँद के आसपास तमाम तारे-सितारे और आकाश गंगाएँ भी थीं। जो पूनम के चाँद की ‘उई मम्मी’ सुन खिलखिला उठी थीं। जिन्हें देख पूनम का चाँद भी हँस रहा था। नन्हा खिलाड़ी भी हँस रहा था और ख़ैर… मैं तो हँस ही रहा था। लेकिन मेरी बाईं बाजू बैठी युवती नहीं हँसी थी। न ही दाईं बाजू बैठा मोटा आदमी हँसा था।

जब हँसने वालों की हँसी थमी, तो पूनम के चाँद ने सूरज को उठा लिया। एक पल उसे देखा और फिर नन्हे खिलाड़ी तरफ़ लुढ़का दिया। नन्हे खिलाड़ी ने एक हाथ से अपने सूरज को उठाया और दूसरे हाथ से चाँद को लुढ़का दिया था।

चाँद लुढ़कता हुआ, उस आदमी की तरफ़ बढ़ा, जो खाना खा रहा था। लेकिन चाँद आदमी के पास रुका नहीं, वह डस्टबिन से जा टकराया था। डस्टबिन में भोजन कर रही मक्खियाँ डिस्टर्ब हुई, तो उड़कर बाहर आ गयी थी और चाँद पर मंडराने लगी थी। मानो उन्होंने चाँद को घेर लिया था, और अब कोई चाँद को उनसे छुड़ा न पाएगा। लेकिन जब मक्खियों ने देखा कि चाँद लुढ़काने वाला कोई माननीय दैत्य कुमार नहीं था, बल्कि नन्हा खिलाड़ी था, तो कुछ मक्खियाँ पुनः डस्टबिन में भोजन करने में व्यस्त हो गयी थी और कुछ डस्टबिन की बजाए उस आदमी की पोलीथिन की साग-भाजी का स्वाद चखने लगी थीं, आदमी ने हाथ को पंखा बना मक्खियों को उड़ाते हुए इशारे से कहा- मैं खाना खा रहा हूँ, तू अपना चाँद उधर ही लुढ़का।

नन्हा खिलाड़ी कुछ नहीं बोला था, बल्कि खाना खाते उस आदमी की आँखों में देखते हुए, ज़रा-सा यूँ मुस्कराया था कि जैसे धीमे से कोई फूल खिला था। फिर उसने एक हाथ से अपना चाँद उठाया और दूसरे हाथ से सूरज को लुढ़का दिया था। सूरज नन्हे खिलाड़ी की माँ की एड़ी से टकराया। माँ छोटे बच्चे को गोदी में लिए बैठी थी।

वह सूरज को उठा छोटे बच्चे को दिखा-दिखा कुछ बोलने लगी- ल.. ल.. ले.. सूरज लेगा। नन्हे खिलाड़ी की माँ उन औरतों की तरह मूक न थी। लेकिन बच्चे से लाड़ जताते हुए तुतला कर बोल रही थी। नन्हा खिलाड़ी माँ को तुतलाती देख मुस्करा रहा था। उसकी माँ का चेहरा कुछ ऎसा था कि जैसे चाँद के मुँह पर झीना दुपट्टा ढँका था! जबकि मुँह पर कुछ न ढँका था, बाल भी पीछे बँधे थे और दुपट्टा कंधे पर पड़ा था।

नन्हा खिलाड़ी माँ के कुछ क़रीब पहुँचा। माँ से सूरज लेने को हाथ बढ़ाया, तो माँ ने उसके दूसरे हाथ से चाँद भी ले लिया था। फिर वह बारी-बारी से गोदी के बच्चे को चाँद-सूरज दिखाने लगी थी। अब नन्हा खिलाड़ी सामान्य न रह सका था। उसका चेहरा जो कि पके नारीयल-सा पीला था, कुछ उदास-सा होने लगा था।

लेकिन तभी उसे एक अलग तरह की शरारत सूझी और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान कौंध उठी थी। हुआ यूँ था कि उन औरतों में से एक औरत की पिंडली पर उसकी निगाह टिक गयी थी। औरत की पिंडली पर दो मोर गुदे थे। वह औरत पता नहीं पचास, साठ या सत्तर की थी! लेकिन उसके चेहरे की झुर्रियों और पिंडली के ढीले गोश्त से लग रहा था कि सत्तर की ही होगी।

दरअसल खाना खाने के बाद उन औरतों के बीच एक समस्या पैदा हो गयी थी और वह यह कि कुछ खाना बच गया था। अब बचे हुए खाने का वे क्या करतीं! सो सोचा था कि उस आदमी को ही दे दें! लेकिन जब वह देने पहुँची तो आदमी ने इशारे से कहा- बस... और ज़रूरत नहीं । स्वामी विवेकानंद के चेहरे पर हाथ फिराते इशारा किया- पेट भर गया।

आदमी के मना करने पर औरत ने डस्टबिन की तरफ़ देखा ज़रूर था, लेकिन खाने को डस्टबिन में फेंकने की हिम्मत नहीं कर सकी थी, बल्कि उसी आदमी को देकर लौट रही थी।

जब वह नन्हे खिलाड़ी के सामने से गुज़र रही थी। तभी नन्हे खिलाड़ी की आँखों में शरारत चमकी थी। वह ऊँकड़ू-ऊँकड़ू दबे पैर... उस औरत के पैरों तरफ़ बढ़ा और पिंडलियों पर जहाँ मोर बने थे, वहाँ हाथों से लबुरता भौंका- भौं... भौं...!

औरत सिर्फ़ चौंकी ही नहीं थी, बल्कि बुरी तरह डर-सी गयी थी। हालाँकि उसकी चीख़ उतनी ज़ोर से न निकली थी, जितनी ज़ोर से वह चीख़ी थी। मानो कि मूल चीख़ जो नाभी से उठी थी, वह किसी संकरे सुराख़ में फँस गयी थी, और बाहर जो कुछ आ सकी थी, वह साबुत चीख़ नहीं थी, बल्कि डर, कराह और चीख़ मिश्रित अजीब-सी आवाज़ थी।

नन्हा खिलाड़ी ताली बजा-बजा हँसने लगा था। बूढ़ी औरत ग़ुस्सा थीं। वह नन्हें खिलाड़ी को डाँट रही थी, लेकिन मुँह से शब्द या वाक्य नहीं, कर्कश आवाज़ ही निकल रही थी। वह आँखें फाड़ व इशारे से नन्हे खिलाड़ी की माँ को कुछ कह रही थी। खिलाड़ी की माँ जैसे सब कुछ समझ रही थी, और उसने विनम्रभाव से कहा भी- मैं समझाती हूँ, अब ऎसा कुछ नहीं करेगा।

फिर नन्हे खिलाड़ी की माँ ने उसकी बाँह पकड़ी, अपने पास नीचे बैठाया और पीठ पर ज़ोर-ज़ोर से धौल जमाने लगी थी। माँ धौल जमा रही थी, और नन्हा खिलाड़ी हँस रहा था। नन्हे खिलाड़ी को देख सामने बैठा पूनम का चाँद भी हँसने लगा था- हे..हे..हे । खाना खा चुका आदमी भी हँसने लगा था-

हह्ह..हह्ह..हह्ह…। और फिर बूढ़ी औरत भी हँसने लगी थी-फिस...फिस...फिस...।

लेकिन गोदी का बच्चा, जिसे माँ ने नीचे लेटा दिया था, रोने लगा था। पता नहीं कि वह नीचे लेटाने की वजह से रो रहा था, या खिलाड़ी की पिटाई देख रो रहा था। वह रोते हुए कभी बूढ़ी औरत तरफ़, तो कभी माँ तरफ़ देख रहा था। बूढ़ी औरत से नीचे लेटे बच्चे का रोना न देखा गया, उसने खिलाड़ी की माँ को रोका और जैसे इशारे से कहा- ये तो बेशरम है, इसको छोड़ और छुटके को गोदी में उठा… ! उसका रोना न देखा जा रहा।

माँ ने छुटके को गोदी में उठाया। उसका मुँह चूमा। पर बच्चा चुप नहीं हुआ। फिर माँ ने कुर्ती के नीचे से पीला स्तन निकाल बच्चे के मुँह में पकड़ा दिया। बच्चा उंअ उंअ मम्म.. करता दूध धाने लगा। नन्हाँ खिलाड़ी फिर से यूँ खेलने लगा था कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

पूनम के चाँद की निगाह अभी भी नन्हे खिलाड़ी पर जमी थी। उसके मोबाइल के भीतर वाले ईदिया चाँद पर बदली छा गयी थी। पूनम के चाँद के सामने दो औरते बैठी थीं। अपने सिर के बालों की तरह ही वे भी उलझी और गुमसुम-सी थीं। न वे यात्री लग रही थी, न कहीं जाने वाली लग रही थी। जाने कब से न नहायी थी, न कपड़े धुले-साफ़ थे।

पहली ने नीचे पेटीकोट और ऊपर बुशर्ट पहनी थी, जिस पर मेल इतना था कि बुशर्ट के असल रंग का पता लगाना मुश्किल था। दूसरी ने ऊपर टी शर्ट व नीचे सलवार पहनी थी।

जब नन्हे खिलाड़ी का चाँद उनके बीच से गुज़रा, तो दोनों ने अजीब से ढ़ँग से आँखें फैला चाँद का लुढ़कना देखा था। फिर पता नहीं, दोनों के बीच आँखों ही आँखों में क्या घटा कि दोनों आमने-सामने खड़ी हो गयी थी। दोनों की आँखें तन गयी और भौंहे चढ़ गयी थीं। फिर पहली ने अपनी बग़ल में खुजलाते हुए कुछ बड़बड़ाया था, जो दूसरी ने ही सुना था।

जवाब में दूसरी ने बहुत भद्दे ढँग से अपनी जाँघ पर खुजलाते हुए कुछ कहा था, जो पहली को अच्छा न लगा था। फिर तो बस…। वहाँ मौजूद सभी की निगाह उन दोनों पर टिक गयी थी। और उन्होंने भी क्या-क्या नहीं किया था! एक-दूसरी के बाल खींचे। धक्का-मुक्की की। माँ-बहन की। और फिर अचानक यूँ चुप हो गयी थी कि जैसे कुछ हुआ ही न था! जैसे वे झगड़ नहीं रही थी, अभिनय कर रही थी। दोनों अपनी-अपनी जगह बैठ अपने में गुम हो गयी थी।

मैंने उधर से नज़रें समेटी ही थी कि मेरी बग़ल में मोटे व्यक्ति ने चौंका दिया था। वहाँ जैसे हर किसी को माननीय दैत्य कुमार की तरह चौंकाने की आदत पड़ गयी थी। मोटा आदमी अच्छा भला बैठा वाट्सएप पर किसी से चैट कर रहा था। बीच-बीच में खी खी हँस भी रहा था। तभी उसका मोबाइल गुनगुनाया, तो मोटे ने कॉल रिसीव की और बस…। किसी की माँ-बहन एक करने लगा था।

दो-तीन गाली सुनने के बाद, मैंने कयास लगाया था कि दूसरी तरफ़ मोटे की पत्नी होगी! क्योंकि उतनी भद्दी-गंदी गाली पत्नी ही सह सकती थी! मैं कुछ और कयास लगाता कि उससे पहले ही बग़ल वाली युवती सुबकने लगी थी। क्यों! किसे पता! युवती काफी देर से वाट्सएप में व्यस्त थी, और एक-दो बार उसकी तरफ़ देखने पर सब कुछ ठीक लगा भी था। कभी मुस्कराती। कभी गुनगुनाती।

फिर जाने क्या हुआ था कि युवती अचानक सुबकने लगी थी! फिर मुँह फाड़ कर रोने लगी थी। मैं थोड़ा असहज हो गया था। कोई यह न समझे कि युवती को मैंने कुछ कह दिया हो और वह रोने लगी हो! वह मुझसे आधी से भी कम उम्र की थी, मेरे मुँह से बेटी ही निकला और पूछा- क्या हुआ बेटी!

वह नाक और आँखें पोंछने के बाद बोली- कुछ नहीं!

-फिर रो क्यों रही हो, कोई परेशानी हो तो कहो ! मैंने चिंता से पूछा।

-मेरी मर्ज़ी.. आपको मतलब ! युवती ने कहा। मेरे पास चुप रहने और उसकी तरफ़ से ध्यान हटाने के सिवा कोई चारा न था।

वहाँ इतना कुछ चल रहा था, लेकिन इस सब से नन्हे खिलाड़ी को कुछ लेना-देना न था। वह अपने चाँद-सूरज से खेलने में मगन था। मैं भी युवती या मोटे के फटे में पैर डालने की बजाए नन्हे खिलाड़ी का खेल देखने लगा था। बीच-बीच में आने-जाने वाली ट्रेन की उद्घोषणाएँ भी सुन रहा था। घड़ी के काँटों पर भी नज़र मार लेता था। रात के उस टुकड़े की नौ बजने वाली थी, और मेरी ट्रेन दस बजे आने वाली थी। इस बीच मेरी इच्छा प्रसाधन केन्द्र जाने की भी हुई थी, लेकिन प्रसाधन केन्द्र पर कतार लम्बी थी, और इच्छा बहुत प्रबल न थी, सो जाना कुछ देर मुलतवी कर दिया था।

तभी ज़ोर की एक चीख़ ने ध्यान खींचा, और मैंने उधर देखा। पहली और दूसरी फिर जाने क्यों उलझ पड़ी थी। दूसरी ने पहली की छाती पर ज़ोर का धक्का दिया। पहली लड़खड़ाती हुई एक यात्री से जा टकरायी। यात्री के एक हाथ में सूटकेस था, और दूसरे हाथ से मोबाइल कान से लगाए था। वह वहाँ से गुजर रहा था, लेकिन उसका चित्त कहीं ओर था।

जब पहली उस यात्री से टकरायी, तो हाथ से सूटकेस, मोबाइल तो छूटा ही, यात्री का बेलैंस भी बिगड़ा और वह अपने से आगे चल रही एक मैम से जा टकराया था।

मैम थी कि बागड़ बिल्ली... बाप रे! यात्री की शक्ल पर नज़र-वजर कुछ न मारी, सीधा थप्पड़ ही जड़ दिया था- तड़। मैम वापस घूमी और चलने को क़दम उठाया ही था कि पैर नीचे चाँद आ गया। फिर तो पूछो मत! मैम का बेलैंस ऎसा गड़बड़ाया था कि सीधी डस्टबिन में जा घुसी थी।

मैम ने डस्टबीन से मुँह बाहर निकाला, तो जैसे समझ नहीं पा रही थी कि चीख़े कि रोए! मैम ने नन्हे खिलाड़ी की बाँह पकड़नी चाही थी, मगर उसने खरगोश की चंचलता से दौड़ लगा दी थी। खरगोश आगे, बिल्ली पीछे थी। हँस...हँस कर पूनम के चाँद ही नहीं, अनेक आकाश गंगा के पेट में भी बल पड़ रहे थे।

तभी क्या हुआ था कि चोर… चोर... की आवाज़ आयी। मैं एल ई डी तरफ़ देखने लगा था कि क्या माननीय दैत्य कुमार की पोल खुल गयी! कि वह फकीर नहीं! कि वह खादी नहीं पहनता! कि उसके पेट में गाय का माँस भरा है! लेकिन नहीं… ऎसा कुछ न हुआ था। एल ई डी में रोज़ की तरह एटीएम के सामने खड़ी क़तार दिखायी जा रही थी। क़तार में खड़े आदमी कोरश में प्रशंसा गीत गा रहे थे।

मैं बुदबुदाया- फिर आवाज़ किधर से आयी।

तभी ध्यान सीढ़ियों तरफ़ गया था और देखा कि उधर से एक के पीछे एक युवक भागता आ रहा था। आगे वाला युवक हाथ में पर्स लेकर भाग रहा था। शायद उसके पर्स में सौ-पचास के नोट थे! पीछे वाला युवक चोर...चोर चिल्लाता भाग रहा था। दोनों के पीछे एक पुलिस वाला भी भाग रहा था। शायद नन्हे खिलाड़ी ने उनका शोर न सुना और न उन्हें आते देखा था। वह खेलने मगन था।

बस यहीं...। मुझे लगा था कि खेल ख़त्म हो गया। सिर्फ़ वह खेल नहीं, जो नन्हा खिलाड़ी खेल रहा था, बल्कि नन्हा खिलाड़ी ही शायद। क्योंकि तेज़ गति से भागते युवक के घुटने से नन्हा खिलाड़ी इस क़दर टकराया था कि क्या बताऊँ! उसका सूरज छिटक कर पूनम के चाँद जैसी सूरत वाली के पास जा गिरा था। उसका चाँद बूढ़ी औरतों के बीच जा गिरा था और नन्हा खिलाड़ी...! ओह्ह…।

जैसे विराट कोहली के बल्ले के बीचोबीच बॉल टकरायी थी कि जैसे फुटबॉल पर भरपूर किक पड़ी थी! नन्हे खिलाड़ी की माँ की आँखें फटी की फटी रह गयी थीं और पहली-दूसरी जहाँ की तहाँ खड़ी रह गयी थी। नन्हा खिलाड़ी बॉल की तरह हवा में था! उस वक़्त उद्घोषिका के सिवा किसी की आवाज़ नहीं थी। कोई शोर नहीं था।
मोटा व्यक्ति, जो पत्नी को डाँट रहा था- ब्लड प्रेशर की गोली क्यों न रखी! मेडिकल पर हज़ार-पाँच सौ के नोट नी चल रहे.. खुल्ले पैसे नी.. दवाई कैसे लूँ!

लेकिन डांटते हुए उसने देखा कि नन्हा खिलाड़ी हवा में तैरता उसी की तरफ़ आ रहा, तो वह डाँटना छोड़ कुर्सी से उठने लगा था। लेकिन मोटे व्यक्ति को संभलने का, उठने का वक़्त न मिला था और नन्हा खिलाड़ी सीधा मोटे की तौंद पर आ गिरा था। मोटे का मोबाइल दूर जा छिटका और उसके ब्लडप्रेशर में सेन्सेक्स सा उछाल आ गया था। नकसुर से एक लाल फूग्गा निकल आया था। तिरंगी साड़ी वाली बूढ़ी औरतें, विवेकानन्द की तस्वीर वाली टीशर्ट पहना आदमी मोटे की तरफ़ दौड़े आए थे। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था कि क्या करूँ!

कोई मोटे की नाक से बहता ख़ून पोंछने लगा था। कोई उसे पानी पिलाने की कोशिश कर रहा था। दोनों युवक तो भागते हुए निकल गए थे, लेकिन उनके पीछे दौड़ता पुलिस वाला वहीं रुक गया था। वह बुरी तरह हाँफ रहा था, और भीड़ को अलग हटने को कह रहा था। मेरी बग़ल वाली लड़की ने मोटे का मोबाइल, जो दूर छिटक गया था, उठा कर पुलिस वाले को दिया। मोबाइल पर मुस्कराती स्त्री की तस्वीर देख सोचा था कि शायद मोटे की पत्नी होगी!

मोटे की तोंद ने नन्हे खिलाड़ी के लिए गद्दे का काम किया था। उसे युवक के घुटने से तो पसली में ज़ोर की लगी थी, लेकिन तौंद पर गिरने से खरोंच भी न आयी थी।

नन्हा खिलाड़ी और उसकी माँ डरे-सहमे से खड़े थे। तीन औरतें और वह आदमी इशारे से ढांढ़स बँधा रहे थे कि कुछ न होगा! कि इसमें नन्हे की क्या ग़लती थी! उसके हिस्से के मैदान पर शौच के टीले खड़े कर दिए, तो वह कहाँ खेले। उसके लिए तो वही मैदान और वही घर था।

घर! हाँ, मुझे भी तो घर जाना था। मुझे ले जाने वाली ट्रेन की सात नम्बर प्लैटफार्म पर उद्घोषणा हो रही थी। मैं बैग उठाकर चल पड़ा था। मेरे भीतर किसी कोने में नन्हा खिलाड़ी चाँद-सूरज लुढ़काता खेल रहा था। तिरंगी औरतें ख़ुश थीं। पूनम का चाँद और आकाशगंगाएँ किलक-चमक रही थीं। बग़ल वाली युवती अभी भी सुबक रही थी। मोटा कराह रहा था। आसपास शौच की गँध व स्मॉग की धुँध सघन हो रही थी। ऊपर से शौच का पहाड़ दबा रहा था। नीचे शौच की दलदल पैर खींच रही थी।

ओह्ह… मैं कैसे वक़्त में था! कैसे सफ़र में था! रात की हँसी और माननीय दैत्य कुमार के भाषण के शोर में कुछ सुनना-कहना कठिन होता जा रहा था। मैं ख़ुद को ढांढ़स बँधा रहा था कि जब तक नन्हा खिलाड़ी खेलता रहेगा, उम्मीद ज़िन्दा रहेगी। लेकिन नहीं मालूम कि कब तक खेल सकेगा- नन्हा खिलाड़ी!

समाप्त

कहानी का पहला हिस्सा : सत्यनारायण पटेल की नई कहानी 'नन्हा खिलाड़ी'

Posted On : 06 08 2017 02:31:00 PM

संस्कृति