Last Update : 24 09 2017 04:03:11 PM

यूपी के 'लौंडों' की सांस्कृतिक समझदारी बदल देगा लड़कियों का यह आंदोलन

बीएचयू के वीसी वही हैं जो कहते हैं, मेरे लिए बेटी वो है जिससे पूछा जाए कि उसके लिए उसका कैरियर महत्वपूर्ण है कि उसके भाई का? तो वो लड़की वो बोले मेरा नहीं, भाई का ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे पितृसत्ता के पोषक प्रशासक लड़कियों के पक्ष में कोई बेहतर फैसला ले पाएंगे ऐसा कहना मुश्किल ही है....

अनुराग अनंत की रिपोर्ट

"मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी" बीएचयू की पहचान बताती ये पंक्ति प्रसिद्ध रसायन शास्त्री और बीएचयू के छात्र रहे शांति स्वरूप भटनागर की कलम से निकली है। ये बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगीत की पहली पंक्ति है और पहली पंक्ति से बीएचयू के प्रति प्रेम, विश्वास और आस्था का प्रबल प्रवाह दिखता है।

ये पंक्तियाँ बीएचयू की पहचान में सूक्ति वाक्य की तरह दोहराई जाती रही हैं। प्रसिद्ध सामाजिक और राजनीतिक चिंतक तुलसीराम बीएचयू को "बीएचयू माई" कहा करते थे। वही बीएचयू जो लाखों लोगों की स्मृतियों में सुखद अनुभूति और गर्व का पर्याय बनकर बसा हुआ है।

उसी बीएचयू के सिंहद्वार पर "अनसेफ बीएचयू" और "बचेगी बेटी, तभी तो पढ़ेगी बेटी" का बड़ा सा बैनर टंगा है। बीएचयू की छात्राएं आंदोलित हैं और उन्होंने बीएचयू का सिंहद्वार घेर लिया है। नारे गूंज रहे हैं 'एक-दो-तीन-चार, नहीं सहेंगे अत्याचार', 'G.C. VC बाहर आओ', 'वी वांट जस्टिस'

लड़कियां मुट्ठी बाँधकर हवा में लहराती हैं और लगता है जैसे सबने 'मजाज़' का कहा मान के सिर के पल्लू को परचम कर लिया है। 22 सितम्बर, सुबह 6 बजे से ये मंजर बना हुआ है। बीएचयू में लड़कियां सुरक्षा के सवाल पर आंदोलित हैं और फिलहाल वो आर-पार की लड़ाई का मन बनाये हुए हैं।

छात्राओं के आंदोलन की क्या वजह है?
बीएचयू का ये महिला आंदोलन 21 सितम्बर शाम 7 बजे भारत कला भवन चौराहे पर दृश्य कला विभाग की बीए द्वितीय वर्ष की छात्र के साथ छेड़खानी के विरोध में है। छात्रा शाम सात बजे के करीब अपने हॉस्टल की तरफ जा रही थी, तभी पल्सर बाइक से आये तीन लड़कों ने उसके साथ छेड़खानी की और उसके जींस में हाथ डाल दिया।

वहां अँधेरा था इस वजह से लड़की बाइक का नंबर नहीं नोट कर सकी और न ही बाइक सवार लड़कों को पहचान सकी। वो बुरी तरह डर गयी थी और रोने लगी थी। घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर गार्ड थे जिन्हें उस लड़की ने घटना के बारे में बताया, पर किसी भी तरह की फौरी मदद नहीं मुहैया कराई गयी। और कला भवन चौराहे से बामुश्किल 20 मीटर दूरी पर प्राक्टोरियल बोर्ड बैठा हुआ था, जब उनसे घटना के सम्बन्ध में बताया गया तो वो वहां प्रॉक्टर, सुरक्षा अधिकारी और गार्ड्स लड़की से ही उल्टा सवाल पूछने लगे 'तुम इतनी रात को क्यों घूम रही हो?'

लड़की वहां से रोते हुए त्रिवेणी कॉम्प्लेक्स स्थित अपने छात्रावास पहुँची और अपनी साथियों से घटना के बारे में बताया। लड़की डरी हुई थी, रो-रोकर बुरा हाल था। वो अपनी बात कहते कहते बेहोश हो जा रही थी। लड़की की ये दशा देख कर छात्राएं आंदोलित हो गयीं। जिस पर वार्डन ने लड़कियों को समझाने की कोशिश की और 'अपनी सुरक्षा, अपनी इज्जत अपने हाथ' और इज्जत का हवाला देकर बात को देखने समझने की सलाह दी, जिस पर लड़कियों में और गुस्सा बढ़ गया।

लड़कियां रात में ही वीसी से मिलना चाहतीं थी पर वार्डेन, प्रॉक्टर और वीसी ने मुद्दे की गंभीरता को नहीं समझा और सही समय पर कोई संवाद नहीं किया, जिससे लड़कियां अगली सुबह 6 बजे से ही सिंहद्वार पर इकठ्ठा होने लगीं और शुरुआत में त्रिवेणी कॉम्प्लेक्स और फिर महिला महाविद्यालय के छात्रावासों से लड़कियां वहां पहुँचने लगीं। सुबह दस बजे तक लगभग डेढ़ से दो हज़ार लड़कियां लंका गेट पर इकठ्ठा हो गयीं। आंदोलन को लड़कों का भी समर्थन मिला और बड़ी संख्या में लड़कियां सुरक्षा के सवाल पर सिंहद्वार पर अभी तक डटी हुई हैं।

प्रधानमंत्री को आंदोलन के चलते रास्ता बदलना पड़ा 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 और 23 सितंबर को बनारस दौरे पर हैं। उन्हें सिंहद्वार से ही होकर गुजरना था, जिसकी वजह से अफसरों के हाथ-पाँव फूल रहे थे। मालवीय जी की प्रतिमा सजाई गयी थी। रास्ते से रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदारों को हटाया जा चुका था, पर अचानक महिलाओं के इस स्वतः स्फूर्त आंदोलन से प्रधानमंत्री के रास्ते में थोड़ा परिवर्तन करना पड़ा। पुलिस ने लड़कियों को चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें विश्वविद्यालय के भीतर करके सड़क पर थोड़ी जगह बनाई और प्रधानमंत्री के रूट को थोड़ा-सा परिवर्तित करके प्रधानमंत्री का काफिला गुजार दिया गया।

विवादों से घिरा रहा है वीसी गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कार्यकाल 
बीएचयू के वीसी गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है। उनके ऊपर विश्वविद्यालय पर एक ख़ास तरह की राजनीतिक समझ थोपने का आरोप लगता है। वो विश्वविद्यालय में एक ख़ास तरह की सांस्कृतिक परिवेश बनाना चाहते हैं, जिसकी जड़ें पितृसत्ता, मनुवाद से पोषित होतीं हैं। प्रोफ़ेसर त्रिपाठी के कार्यकाल काले अध्यायों की मोती किताब होता जा रहा है।

चाहे मामला परास्नातक की छात्र से बतात्कार का हो, परिसर में नाबालिक से यौन शोषण और बलात्कार का हो, 24 घंटे पुस्तकालय की मांग कर रहे छात्रों पर गंभीर मुक़दमे करने और बर्बर दमन कराने का मामला हो, परिसर में छात्राओं पर पहरा बिठाने का मामला हो सारे मामलों में प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने अपनी सामंती समझ और बोगस सोच का परिचय दिया है। उन्होंने परिसर में परचा बाँट रहे छात्रों पर लाठियां चलवाईं, महिलाओं के छात्रावासों के शाम में बंद होने का समय घटा दिया, रात आठ बजे के बाद छात्राओं से मोबाइल फोन जमा करने का निर्देश दिए, लड़कियों के हॉस्टल में नॉनवेज पर रोक लगा दी, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे कामोत्तेजना बढ़ती है। ऐसे ही कई कारनामे प्रोफ़ेसर त्रिपाठी के नाम दर्ज हैं।

बीएचयू में ये दिन आते आते आये हैं 
छात्र-छात्राएं बतातीं हैं बीएचयू में घुटन होने लगी है। लड़कियां यहाँ एकदम सुरक्षित नहीं हैं। उनके भीतर भीषण दर का माहौल है। ये स्थिति बनते बनते बनी है और इसके जिम्मेदार प्रोफ़ेसर त्रिपाठी और उनकी दकियानूसी सोच है।

ऐसे में प्रोफ़ेसर त्रिपाठी का राजदीप सरदेसाई के लिए दिया गया बयान सभी को याद होगा, "राजदीप को आने दीजिये, मैं उन्हें कैंपस में लड़कों से पिटवाऊंगा" ये पीटने वाले लड़के कौन हैं जाहिर है वीसी की आपराधिक और शोहदे किस्म के लड़कों को सह है और वो उनके एक इशारे पे कुछ भी कर सकते हैं और वीसी उन्हें बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

वीसी ने बीएचयू में एक आपराधिक गठजोड़ रचा है शायद इसीलिए वो अभी तक लड़कियों से बात नहीं करने आ रहे हैं। प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने नवम्बर 2015 में इग्नू स्थापना दिवस समारोह के मंच से बयान दिया दिया था कि 'शोध छात्र फेलोशिप के पैसे से बाइक खरीदते हैं और लड़कियां दहेज के लिए पैसा इकठ्ठा करती हैं।' ये उनकी ओछी समझ और छात्र विरोधी नज़रिये को दिखाती है।

मार्च 2017 में महिला महाविद्यालय बीएचयू में उन्होंने कहा कि 'मेरे लिए बेटी वो है जिससे पूछा जाए कि उसके लिए उसका कैरियर महत्वपूर्ण है कि उसके भाई का? तो वो लड़की वो बोले मेरा नहीं, भाई का ज्यादा महत्वपूर्ण है।' ये बयान वीसी साहब के पितृसत्ता पर आस्था और लड़कियों को कमतर कर आंकने वाली समझ का परिचायक है।

ऐसे ही कई किस्से और बयान हैं, जैसे 24 लाइब्रेरी के आंदोलन में जून 2016 को छात्रों के समर्थन में इकट्ठा हुए छात्रों नेतृत्व कर रहीं आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे से प्रॉक्टर ने कहा, 'अगर तुम जैसी मेरी बेटी होती मैं उसे जिन्दा जला देता।' वीसी और प्रशासन की सोच समझ और बयानों के ऐसे कई नमूने हैं जिनसे ये पता चलता है कि ये घुटन भरा महिला, वाद-विवाद आधारित समवेशी माहौल धीरे धीरे कैसे आपराधिक तरीके से ख़तम और खराब किया गया और ये दिन हमारे सामने है कि सर्वशिक्षा की राजधानी के सिंहद्वार पर 'अनसेफ बीएचयू' लिखा हुआ टंगा है।

विश्वविद्यालय में संस्कृति के नाम पर सड़ांध फैलाती वीसी की पिछड़ी सोच 
वीसी की सरपरस्ती में संस्कृति के नाम पर एक पहरेदारी और खाप जैसा माहौल बनाया जा रहा है। लड़कियों के जींस पहनने, किसी के साथ घूमने फिरने, बात करने, दोस्ती करने, खाने पीने सब पर प्रशासन और वहां के संस्कृति के रक्षक और वैसी धर्मो रक्षित: धर्म: वाली सोच के सिपाही ये काम कर रहे हैं। वार्डेन, प्रॉक्टर से लेकर स्वयंभू चरित्रवान और संकृतिवाहक इन भीड़तंत्र के रचयिता बने हुए हैं। यही वो दमघोटू निजाम है, जो हमें ऐसे दिन दिखाता है।

बीएफए के छात्र शाश्वत उपाध्याय के फेसबुक प्रोफ़ाइल पर छात्राओं के आंदोलन के समर्थन में की गयी एक पोस्ट पर ऐसे ही एक समझदार संस्कृति रक्षक अपनी समझ का परिचय देते हुए देखे जा सकते हैं। कुणाल राय नाम का ये लड़का खुद को वीएचपी से जुड़ा हुआ बताता है और लड़की के साथ हुई घटना को सही बताते हुए तर्क देता है कि लड़की ने जींस पहन रखी थी इसलिए जो हुआ सही हुआ।

आंदोलन में खींचतान और अफ़वाह का माहौल भी रहा 
शाम ढलते ढलते आंदोलन में खींचतान देखी गयी। जब बीएयू गेट पर 'अनसेफ बीएचयू' और 'बचेगी बेटी, तभी तो पढ़ेगी बेटी' वाले पोस्टर लगाए गए तो एबीवीपी से जुड़ीं छात्राओं ने आरोप लगाया कि ये वामपंथियों द्वारा आंदोलन को राजनीतिक रुख देने की कोशिश की जा रही है। कुछ छात्र और छात्राएं अलग हटके 10-20 की संख्या में बैठ गए और राष्ट्रवादी और वामपंथ विरोधी नारे लगाने लगे। फिर कुछ छात्र बैनर को हटाने के मांग करते हुए झगड़े पर उतारू हो गए। झगड़ा नहीं हुआ और थोड़ी नोक-झोंक के बाद पोस्टर हटा लिया गया।

रात होते होते अफ़वाह फ़ैली की आंदोलन में शामिल वामपंथी संगठन के सदस्यों ने महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर कालिख पोतनी चाही है। एबीवीपी की छात्र नेता एकता सिंह ने इस बाबत एक पोस्ट लिखी और इस घटना की निंदा भी की।

इस सन्दर्भ में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के धनंजय त्रिपाठी से पूछा तो उन्होंने कहा "ये कोरी अफवाह है और वीसी के इशारे पर आंदोलन को कमजोर करने वाले तत्व इसे अंजाम दे रहे हैं। यहाँ ना तो लाल सलाम के नारे लगे हैं, ना लाल झंडे हैं, और ना कोई संगठन इसपर अपनी दावेदारी कर रहा है। हमने एक जॉइंट एक्शन कमिटी बनाई है, जिसमे सभी विचार के लोग शामिल हैं, वामपंथी, अम्बेडकरवादी, लोहियावादी, समाजवादी और गांधीवादी भी। कैम्पस में काम करने वाला हर संगठन इस आंदोलन में सक्रिय है।

जहाँ इतने सारे संगठन हों वहां हम खुद कैसे चाहेंगे कि एक संगठन क्रेडिट ले ले, अपना विचार आंदोलन पे थोपे। अनसेफ बीएचयू यहाँ की लड़कियों का भोगा-झेला सच है। और रही बात महामना की प्रतिमा पर कालिख पोतने की कोशिश करने वाली बात का तो पहली बात यहाँ पढ़ने वाला कोई लड़का या लड़की ऐसा कर ही नहीं सकती, उसकी आत्मा साथ नहीं देगी और दूसरी बात कोई उपद्रवी तत्व चाहेगा तो आसानी से पहचान लिया जायेगा और इतनी बड़ी मात्रा में पुलिस बल है यहाँ जो प्रतिमा को घेरे हुए है। प्रतिमा तक जाने की इजाजत किसी को नहीं है। ये अफवाह है। जिसमें वीसी के इशारे वाले छात्र संगठन शामिल हैं।

पूरी रात वीसी मिलने नहीं आये 
लड़कियां सारी रात वीसी से मिलने के लिए गेट पर बैठीं रहीं पर वीसी नहीं आए। उन्होंने प्रॉक्टर को बात करने के लिए भेजा, पर छात्राएं वीसी से नीचे किसी से बात नहीं करना चाहतीं। वीसी का कहना है कि छात्राओं का एक प्रतिनिधि मंडल उनसे आ कर उनके घर पर मिले, छात्रों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और वीसी को खुले में माइक मीटिंग करने को कहा है। रात में अफवाह उड़ी थी कि वीसी चार बजे के आसपास मिल सकते हैं पर वीसी नहीं आये और आंदोलन रात भर चलता रहा।

क्या मांग है छात्राओं की 
छात्राओं की मांग को लेकर भी दो धड़े हैं। एक धड़ा एबीवीपी समर्थक है जो सुरक्षा के इंतजाम बढ़ने, दोषियों को सजा देने, रास्तों पर लाइट और कैमरे लगाने की बात करता है। तो दूसरा और बड़ा धड़ा है वो व्यापक मांग कर रहा है वो कैम्पस में बेख़ौफ़ आज़ादी की मांग कर रहा है। हॉस्टल की टाइमिंग बढ़ने और पितृसत्तात्मक सोच के प्रभाव में डूबे प्रशाशन के खिलाफ आर पार की लड़ाई चाहता है। इसके लिए कुछ संस्थाओं के निर्माण की बात भी करता है जॉइंट एक्शन कमिटी का चार्टर। 

जॉइंट एक्शन कमिटी की मांगें 
— स्वतंत्रता, समता, सुरक्षा, शिक्षा एवं शांति
— छेड़खानी के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाय।
— परिसर के सभी अंधेरे रास्तों और चौराहों पर प्रकाश की उचित व्यवस्था की जाय।
— 24/7 सुरक्षा गार्डों को परिसर की सुरक्षा के लिए और जिम्मेदार बनाया जाय। 
— परिसर के सभी प्रशासनिक कर्मचारियों एवं अध्यापकों में लैंगिक संवेदनशीलता लायी जाए
— सभी छात्राओं के लिए छात्रावास कर्फ्यू टाइमिंग्स हटाई जाएं।
— महिला छात्रावासों के अधिकारीगण तथा अन्य सहायक कर्मचारी में सामंजस्य को बढ़ावा दिया जाए
— लापरवाह व गैर ज़िम्मेदार सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ जल्द से जल्द उचित करवाई की जाए।
— विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न प्रवेशद्वारों पर चेक पॉइंट बनाये जाएँ।
— महिला छात्रावास में खाने के व्यंजन एवं सभी आहारों में समता हो।
— GSCASH (Gender Sensitisation Committee and Sexual Harassment) स्थापना की जाय।
— महिला सुरक्षाकर्मियों की भर्ती की जाय।
— परिसर में प्रत्येक संकाय या संस्थान स्तर पर लैंगिक संवेदनशीलता के प्रसार के कार्यक्रम अनिवार्य किए जाएं।
— परिसर के सभी प्रवेशद्वारों पर CCTV कैमरें लगाए जाएं।
— परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं और प्रॉक्टर की जवाबदेहिता तय की जाय।
— महिला हेल्पलाइन नंबर परिसर में मुख्य-मुख्य जगह पर लिखा जाय।

सर्वशिक्षा की राजधानी बीएचयू के सर ये कलंक नवरात्र के पहले दिन ही पड़ा और देवी के उपासना करने वाला देश देश की बेटियों के सड़कों पर न्याय के लिए रिरियाते बैठा हुआ देख रहा है। कितना दुखद है खुद को माता का भक्त बताने वाले, माता के नाम पर व्रत रखने वाले मोदी जी एक लड़की पर हुए अत्याचार की सुध नहीं ले पाए। वो अगर एक आदेश देते तो तानाशाहों की तरह बैठे हुए वीसी नंगे पाँव बात करने आते।

पर नहीं ऊपर से कोई आदेश नहीं आया होगा, इसलिए वीसी साहब रात को मीठी नींद सोये होंगे। मगर उनकी ये नींद टूटेगी और बीएचयू के आम छात्र-छात्राएं ही अपने विश्वविद्यालय के सर लगे कलंक को धोयेंगे। ऐसी उम्मीद कर सकते हैं। 

(जनज्वार के सहयोगी पत्रकार अनुराग अनंत बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ से पत्रकारिता में पीएचडी कर रहे हैं।)

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Posted On : 23 09 2017 04:41:45 PM

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