Last Update : 30 10 2017 09:56:38 AM

उत्तराखण्ड भाजपा में सब अपने—अपने मालिक

उत्तराखण्ड भाजपा में प्रत्याशी घोषित करने के लिए सोशल मीडिया पर तारीफों और नारों की संख्या देखकर निर्णय होंगे या जमीनी स्तर पर काम करने वालों को तरजीह मिलेगी...

देहरादून से मनु मनस्वी

खुद को सबसे अधिक अनुशासित होने का दावा करने वाली भाजपा के नेता गाहे बगाहे पार्टी लाइन की ऐसी तैसी कर खुद लम्बरदार बन जाते हैं, जिससे पार्टी खुद असहज स्थिति में आ जाती है, परंतु हैरत की बात यह है कि ऐसे नेता ढपोरशंख बनकर खुद को योग्य बताने में पीछे नहीं हट रहे हैं।

पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अंत तक मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित नहीं किया था। इसका असल और इकलौता कारण यह था कि प्रदेश में भाजपा के पास ऐसा कोई कद्दावर चेहरा था ही नहीं, जो मुख्यमंत्री पद के लायक हो। लेकिन भाजपा इसे अपनी रणनीति का हिस्सा बताती रही और कहती रही कि भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र है, जिसकी वजह से कोई भी चेहरा मुख्यमंत्री हो सकता है।

बहरहाल इस बीच पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया और यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को प्रदेश से जुड़े मुद्दों पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती तक दे डाली। वह तो बाद में हाईकमान की ओर से स्पष्ट किया गया कि मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा चुनावों के बाद होगी, तब जाकर बलूनी चुप हुए। वर्ना सोशल मीडिया के जरिये तो वे चुनाव से पहले ही सीएम पद की कुर्सी दबोचने की फिराक में थे।

इससे कुछ पहले जब विधानसभा चुनावों की आहट शुरू हो रही थी, पार्टी के एक अन्य नेता और महानगर अध्यक्ष रहे उमेश अग्रवाल ने भी खुद को धर्मपुर क्षेत्र से विधायक प्रत्याशी घोषित कर शहरभर की सड़कों को नववर्ष और होली की शुभकामनाओं वाले होर्डिंग्स से पाट दिया।

उनका दावा इसलिए भी मजबूत था कि अग्रवाल पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल खंडूड़ी के खासमखास थे। पर ऐन मौके पर वर्तमान मेयर विनोद चमोली को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया, जिसके बाद उमेश अग्रवाल को लगा कि उन्हें मेयर पद की उम्मीदवारी तो हर हाल में मिलेगी ही, लेकिन यहां भी सुनील उनियाल गामा नामक नेता उनकी राह में आ गए हैं। गामा ने फेसबुक पर अपने समर्थन में एक पेज बनाकर खुद को मेयर प्रत्याशी दर्शाते हुए समर्थकों के जरिये कई फोटो डाली हैं।

गौरतलब है कि अभी निगम चुनावों में लगभग छह माह का समय शेष है और अभी यह तक स्पष्ट नहीं है कि इस बार चुनाव में आरक्षण की स्थिति क्या है। पर दावा करने वालों को इससे क्या मतलब? वे तो मात्र अपने समर्थकों के बूते खुद को सवाल यह है कि बिना हाईकमान द्वारा घोषित हुए ये नेता कैसे खुद को प्रत्याशी घोषित कर सकते हैं?

क्या भाजपा का इन छुटभैये नेताओं पर कतई अंकुश नहीं? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या प्रत्याशी घोषित करने के लिए सोशल मीडिया पर तारीफों और नारों की संख्या देखकर निर्णय होंगे या जमीनी स्तर पर काम करने वालों को तरजीह मिलेगी?

Posted On : 30 10 2017 09:56:38 AM

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