कुछ समय पहले मेरठ में भ्रष्टाचार अनुसंधान विभाग में तैनात थे। आदतन जब अमिताभ ने वहां भी भ्रष्टाचारियों के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए तो भ्रष्ट अधिकारियों को उनकी कार्यशैली से परेशानी होने लगी। वही हुआ जो हर बार होता है अर्थात ट्रांसफर...
जनज्वार. खुले आसमान और पेड़ के नीचे गाँव-देहात में सरकारी स्कूल चलना तो आम बात है, लेकिन अगर एक आईपीएस अधिकारी पेड़ के नीचे अपना आफिस चला रहा तो हैरानी की बात है। अपनी ईमानदारी के लिए चर्चित उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी अमिताभ एक अदद आफिस के अभाव में पेड़ के नीचे दफ्तरी काम-काज निपटाने को मजबूर है।
अमिताभ को सिस्टम में रह कर सिस्टम की गंदगी के खिलाफ लड़ने के लिए जाना जाता है। जेन्यूइन मुद्दों पर लड़ने के चलते वे हमेशा से सरकार एवं ताकतवर नौकरशाहों के निशाने पर रहे हैं। कई बार सस्पेंड किए गए, महत्वहीन पोस्टिंग पर भेजे गए, स्टडी लीव नहीं दी गई। लबोलुबाब यह है कि सिस्टम की गंदगी को साफ करने की सजा पिछले लगभग 19 साल से अमिताभ झेल रहे हैं।
कुछ समय पहले मेरठ में भ्रष्टाचार अनुसंधान विभाग में तैनात थे। आदतन जब अमिताभ ने वहां भी भ्रष्टाचारियों के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए तो भ्रष्ट अधिकारियों को उनकी कार्यशैली से परेशानी होने लगी। वही हुआ जो हर बार होता है अर्थात ट्रांसफर । इस बार इन्हें पुलिस के रुल्स एवं मैन्युल्स विभाग में एसपी बनाकर भेजा गया। अपनी आदत के अनुसार यहां भी इन्होंने काम करना चाहा तो पता चला कि यहां तो कोई काम ही नहीं है।
आईएएस को जैसे राजस्व परिषद भेजकर कालेपानी की सजा दी जाती है, वैसे ही आईपीएस को रुल्स एवं मैन्युल्स विभाग में तैनात करके सजा दी जाती है। महत्वहीन और बगैर काम वाले इस विभाग का सिस्टम भी अमिताभ समझने में जुट गए। पुलिस रुल्स एवं मैन्युल्स विभाग वायरलेस चैराहा स्थित रेडियो मुख्यालय लखनऊ में दो कमरो में संचालित होता है। एक में डीजी ओपी दीक्षित बैठते हैं तो दूसरे कमरे में अमिताभ एवं राहुल अस्थाना।
छोटे से कार्यालय में दो आईपीएस, किसी सजा या यंत्रणा से कम नहीं है। सूत्रों की माने तो राहुल अस्थाना और अमिताभ की कार्य’ौली में जमीन आसमान का अंतर है। राहुल अस्थाना पुलसिया भाषा का भरपूर प्रयोग करते हैं और पूरा रौब-दाब गांठते हैं। दिन भर खटपट और शोर-शराबे से अमिताभ को कार्य करने में बाधा और परेशानी होती थी।
समस्या बढ़ती देख अमिताभ ने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी परेशानी से अवगत कराया और एक अलग कमरा एलाट करने की गुजारिश की। बताया जा रहा है कि उन्होंने डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह समेत उन तमाम लोगों को पत्र लिखा जो नियमानुसार उन्हें अलग कमरा एलाट करा सकते थे। सरकारी पत्र और फाइल की रफ्तार किसी से छिपी नहीं है। चार दिन बीतने के बाद भी अमिताभ की बात का संज्ञान नहीं लिया गया। उन्हें अलग कमरा एलाट नहीं किया गया।
पर अपनी संघर्ष करने की आदत से मजबूर अमिताभ ने फिर एक रास्ता खोज निकाला। बिना किसी शोर-शराबे और हंगामे के वो रेडियो मुख्यालय में स्थित पार्क में एक पेड़ के नीचे पहुंच गए। एक टेबल और चार कुर्सियां डाली बन गया कार्यालय। अब वे इसी खुले कार्यालय में वो रोजमर्रा का काम-काज निपटा रहे हैं। पर यहां यह सवाल खड़ा होता है कि अपने देश और राज्य के सिस्टम में हर बार ईमानदार को ही क्यों इतनी परीक्षाएं देनी पड़ती हैं या उनकी इतनी परीक्षाएं क्यों ली जाती हैं।
क्या अमिताभ की मांग नाजायज है। क्यों अमिताभ ने कोई गुनाह किया है। एक सीनियर आईपीएस अधिकारी होने के बावजूद अमिताभ के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है वो न्यायोचित और न्यायसंगत है। अब देखना है कि पेड़ के नीचे अपना काम काज निपटा रहे इस आईपीएस को शासन-प्रशासन एक अलग कमरा एलाट कराता है या फिर उन्हें पेड के नीचे ही कार्यालय चलाने के लिए छोड़ देता है। बहरहाल यह कार्यालय लखनऊ की मीडिया में भी सुर्खियों में है।
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