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विधवाओं का गांव

दो जून की रोटी के जुगाड़ में पत्थर तोड़ने वाले आदिवासियों को क्या पता कि वह अपनों के लिए जिंदगी नहीं मौत बो रहे हैं। कुछ ही सालों में देखते-देखते कांसेर विधवाओं का गांव बन गया और सरकारी अमले को इसकी फ़िक्र ही नहीं...

अजय प्रकाश

रजवाड़ों के लिए देशभर में ख्यात मध्य प्रदेश के जिला ग्वालियर से मात्र बारह किलोमीटर दूर एबी रोड पर एक गांव बसा है कांसेर। कांसेर की ख्याति आसपास के लोगों के बीच विधवाओं के गांव के रूप में है। विधवा भूरी, माडो, समुनी, पुशो, जानकी, कतुरी, सरूपी, शांति, कुलवती, नारायणी जैसे और भी न जाने ऐसे कितनी आदिवासी महिलाओं के नाम हैं, जिनकी मांग में अब सिन्दूर नहीं है और उनके बच्चों के बाप नहीं हैं।

गांव के मर्दों के असमय मरने का सिलसिला कब शुरू हुआ, इसका कोई साल और सन् तो लोगों को याद नहीं है, लेकिन कोई दस साल पहले तक कोई पांच साल, कोई साल भर पहले तो कोई कुछ ही दिन पहले अपनी चूडि़यां तोड़कर उस जमात में शामिल हुई हैं, जिनके पति अब बीमारी के कारण इस दुनिया में नहीं हैं।

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विधवा सरूपी कहती है, ‘दुनिया में कहीं और कोई औरत विधवा होती है तो उसके पास जीने के लिए पति की छोड़ी विरासत और संपत्ति होती है, जिससे वह अपना और परिवार का जीवन गुजार लेती है, लेकिन कंसेरा में मरने वाला मर्द पहले पूरी संपत्ति को बीमारी के ईलाज में बंधक बनाता है, फिर बीबी और बच्चों में रोग का कीड़ा बांटता और अंत में सूखी हड्डियों वाला शरीर लिये स्वर्ग पहुंच जाता है। बस हमें छोड़ जाता है और यह भीड़ उन्हीं अभागी सुहागिनों की है, जिसे समाज अब विधवा कहता है।’


ग्वालियर शहर से एबी रोड पर हाइवे से मात्र दो किलोमीटर पर बसे इस 150 घरों वाले आदिवासी गांव कंसेरा के करीब 350 वोटरों में लग भग 100 विधवाएं हैं, जिनमें ज्यादातर खुद भी बीमारी से ग्रस्त हैं। कांसेर के आदिवासी युवक धीरेन्द्र जिनकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती हैं, कहते हैं- 'काला पत्थर हमारे गांव को चट कर जायेगा।'

उनकी इस स्वीकारोक्ति पर एक दूसरा ग्रामीण बतकही के अंदाज में कहता है, 'और चट होने वालों में पहला नंबर तुम्हारा होगा।’ ग्रामीण साथी की बात सुनकर गुस्से में आये धीरेन्द्र अपने बचाव में गांव के कई लोगों के नाम गिनाते हैं, जिन्हें वह अपने साथ काले पत्थर के शिकार के रूप में पेश करते हैं और बताते हैं कि कैसे बाकी दूसरों का स्वास्थ्य उनसे भी डांवाडोल हालत में है। धीरेन्द्र की इस राय पर वहां खड़े लगभग दर्जन भर लोग हामी भरते हैं।

कांसेर बीमार है इसकी जानकारी तो हमें पहले से थी, लेकिन मरने वालों की गिनती इतनी बड़ी तादाद में होगी, इसका अंदाजा बिल्कुल नहीं था। गांव के लोगों ने बातचीत में बताया कि गांव में हर साल करीब 8-10 महिलाएं विधवा हो जाती हैं और कोई ऐसा घर नहीं है जिसमें एक-दो लोग बिस्तर पर न पड़े हों। इससे जाहिर था कि बीमार लोग अपनी पीड़ा बताने गांव की किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं आ सकते थे। ऐसे में हमने तय किया कि क्यों न घर-घर जाकर रोगियों और पीड़ितों से मिलकर ये जाना जाये कि काला पत्थर ग्रामीणों के लिए काल कैसे बना।

मध्य प्रदेश में सक्रिय सामाजिक संगठन एकता परिषद के कार्यकर्ता डोंगर शर्मा के साथ हम गांव की ओर बढने लगे तो घर दिखाने और रास्ता बताने के लिए कोई आदमी तैयार नहीं हुआ और लोग धीरे-धीरे बिखरने लगे। ग्रामीण भगीरथ का कहना था, ‘आप लोग मत जाइये। जितने मरे हैं उनको टीबी थी और जो मरने वाले हैं, उन्हें भी टीबी है। टीबी छुआछूत का रोग है, इसलिए कोई इनके घर नहीं जाता।’

भगीरथ की बात को आगे बढ़ाते हुए गांव के नौजवान धीरू कहते हैं, ‘चुनाव चाहे ग्राम प्रधानी का हो या फिर सांसद का, कोई नेता हमारे गांव में घुसकर वोट नहीं मांगता, फिर आप लोग क्यों जाने पर तुले हैं।’ सामाजिक कार्यकर्ता डोंगर शर्मा बताते हैं कि कभी -कभार गांव में टीबी की दवा देने वाले आते तो हैं, लेकिन इस गांव को टीबी के संक्रमण से बचाने का कोई गंभीर प्रयास कभी नहीं किया गया।

ग्रामीणों के मुताबिक गांव में परिवार का हर दूसरा सदस्य संक्रमणकारी रोग टीबी की बीमारी से ग्रस्त है और कुछेक का तो पूरा परिवार ही बीमारी के कारण समाप्त हो चुका है। शादी के कुछ ही दिन बाद विधवा हुई भूरी कहती है, ‘हमारे मां-बाप को क्या मालूम था कि ये पूरा गांव ही टीबी की बीमारी से सड़ रहा है। शादी होते ही मेरा मर्द जयराम मर गया, उसके कुछ दिन बाद उसका भाई अजय और अब तीसरे का नंबर है।’ घरों की और बढ़ने के क्रम में हमारी उस तीसरे से मुलाकात होती है और वह मुश्किल से अपना नाम शंकर बता पाता है।

शंकर हमें बताता है कि गांव से बाहर दक्षिण ओर काले पत्थरों का एक पहाड़ है, जहां कई एक क्रशर मशीनें लगी हैं। उन क्रशर मशीनों पर पत्थर ढोने-तोड़ने के लिए गांव के बाकी लोगों के साथ वह और उसके अन्य दो भाई भी जाने लगे। करीब तीन साल काम करने के बाद पहले बड़ा भाई जयराम मरा, फिर अजय की मौत हुई और अब उसे अपने मरने का डर सता रहा है। पता नहीं उस काले पत्थर की धूल में क्या जहर है कि जो जाता है उसी को टीबी हो जाती है।

हालत यह है कि विधवाओं के इस गांव में कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता। यहां तक कि एक बार शादी होने के बाद कोई रिश्तेदार अपनों की कुशल-क्षेम भी पूछने नहीं आता कि कहीं उसे भी वह जानलेवा रोग न लग जाये, जिससे कि कमोबेश गांव का हर आदमी पीडि़त है। ग्रामीण विमला देवी के अनुसार, ‘विधवा महिलाओं की गिनती ही काफी नहीं, बल्कि बच्चे और दूसरे लोग भी टीबी से ग्रस्त हैं। चूंकि उनकी उम्र कम है और वह काम पर नहीं जाते इसलिए वह धीरे-धीरे मरते हैं।

भारत में हर साल करीब 20 लाख लोग टीबी से संक्रमित होते हैं और 3 लाख 30 हजार रोगियों की मौत होती है। अकेले मध्य प्रदेश में वर्ष 2009-10 के बीच करीब 30 हजार टीबी रोगियों के मामले सामने आये जिसमें से 27 हजार के बारे में सरकार ने दावा किया कि उनके रोगों पर काबू कर लिया गया। मध्य प्रदेश में पिछले वर्ष करीब एक हजार लोगों की टीबी के संक्रमण से मौत हुई।

टीबी क्यों होती है? इस बारे में गांव में गिनती के स्वस्थ लोगों में शामिल विनय सिंह कहते हैं, ‘काले पत्थर की तुड़ाई के वक्त धूल उड़ती है और धूल से बचने का कोई रास्ता लोगों के पास नहीं होता। धूल इतनी खतरनाक होती है कि लोग रात को ठीक से सो नहीं सकते। मजदूर सोयें और सुबह काम पर आयें, इसके लिए ठेकेदार शराब देता है। कड़ी मेहनत, धूल का जहर, भरपेट अन्न का अभाव और शराब के सेवन ने कंसेरा गांव के लोगों की औसत उम्र 40 वर्ष कर दी है।’

अगर ऐसा है तो लोग काले पत्थर पर काम करने ही क्यों जाते हैं? सवाल पूछने पर धीरू कहते हैं, ‘किसकी हिम्मत है जो वहां काम पर नहीं जायेगा। सबके यहां काले पत्थर के ठेकेदारों का बकाया है। कोई शादी के खातिर तो कोई बीमारी के लिए कर्जे में है।’

साफ है कि गांव के लोग काले पत्थर के चंगुल में फंसे हुए हैं, लेकिन इस क्षेत्र की सांसद यशोधरा राजे सिंधिया को इस बारे में कुछ मालूम नहीं। प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा की सांसद और ग्वालियर के कथित राजघराने की विरासत के मालिकों में से एक हैं यशोधरा राजे कहती हैं, ‘यह मामला हमारे संज्ञान में नहीं है, हम इस बारे में जानकारी जुटाते हैं।’

ग्वालियर के जिलाधिकारी पी. नरहरि का कहना है कि ‘मैंने अभी-अभी जिले का कार्यभार संभाला है, इसलिए इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता।’ ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस बीमार गांव का खेवनहार कौन बनेगा, जिससे गांव को बचाने की उम्मीद जागेगी।

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Comments  

 
0 #7 Mridula garg 2012-02-28 08:45
vidhvaon ka gaav. heading hi bahut-kuchh kah deti hai. achhi report hai.
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0 #6 Nalini prsad 2012-02-28 08:43
widows's village.............................a investigetive story ajay. keep it up.
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0 #5 ऋषि 2012-02-24 06:59
बहुत बढ़िया रिपोर्ट
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0 #4 ऋषि 2012-02-24 06:58
बहुत बढ़िया
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0 #3 दिलीप खान 2012-02-23 13:14
अच्छी रिपोर्टिंग
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0 #2 riya 2012-02-22 13:13
ajay ji aapki is story ko padhkar shocked hoon. samajh me nahi aa raha hai ki vakai abhi bhi hamare desh me aise gaav hain. grameen maut ko gale lagane ke liye mazboor hain aur hamare janprtinidhi bekhabar bane rahte hain. aakhir kaise bachenge hamare desh ke aise gaav.
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0 #1 devendra 2012-02-22 12:36
dil dahlane wali stori hai.
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