आजकल बच्चे अपना समय वीडियों गेम, कंप्यूटर, मोबाइल या कॉटून चैनलों पर बिताना पसंद करते हैं। जिसकी वजय से शारीरिक गतिविधियां तो जैसे खत्म सी हो गयी है। वैसे भी खेलने-कुदने के लिए पहले जैसे खुले मैदान कहां रह गये हैं उनकी जगह तो बड़ी-बड़ी इमारतों ने ले ली है...
विभा सचदेवा
मोटापे के विशेषज्ञों का कहना है, ‘आज के युग को कंप्यूटर चिप्स के युग की बजाय पटैटो चिप्स का युग कहना ठीक रहेगा। प्रगतिशील देशों से कंप्यूटर चिप्स की तकनीक लेने के बाद अब भारत पटैटो चिप्स की तकनीक पर ध्यान लगा रहा है।’ मोटापे में भले ही आज अमेरिका पहले स्थान पर हो लेकिन वह समय दूर नहीं जब भारत पहला स्थान ले लेगा। भारत में मध्यवर्गीय बच्चों में जिस तेजी से मोटापा बढ़ रहा है वह चिंता का विषय बन गया है।

पिछले साल कई अखबारों में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में सन् 1998-2005 से अब तक 20 प्रतिशत मोटापे में वृद्धि हुई है और सबसे ज्यादा मोटापा बच्चों में बढ़ा है। मैक्स हॉस्पिटल के डॉक्टर प्रदीप चौबे का कहना है, ‘भारत में मोटे लोगों की संख्या लगभग 30 से 35 प्रतिशत हो गयी है। इसमें हर वर्ग के लोग मौजूद हैं और अगर अलग बच्चों की बात करें तो वह बचपन से ही इस श्रेणी में आ गये है तो आगे भी वह इसी श्रेणी में ही रहने वाले हैं।’
बंगलुरू स्थित इडीयू स्पोर्त्स कंपनी द्वारा 5 से 14 साल के लगभग 5000 बच्चों पर किये गये एक अध्ययन में 23 प्रतिशत बच्चों का बीएमआई बढ़ा हुआ पाया गया और इन बच्चों के माता-पिता को पता भी नहीं था कि वे मोटापे से ग्रस्त हैं। इसके अलावा ऑल इंडिया इंस्टीटयूट ऑफ मैडिकल साइंस द्वारा किये गये एक एक अध्ययन में सामने आया है कि 14-17 साल के बच्चों में लगभग 17 प्रतिशत बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली फोर्टिस हॉस्पिटल ने एक अध्ययन में पाया कि दिल्ली के स्कूली बच्चों में से 28 प्रतिशत बच्चे मोटापे के शिकार हैं।
मैक्स हॉस्पिटल के डॉ प्रदीप चौबे का कहना है, ‘बच्चों में तेजी से बढ़ते मोटापे की वजह रहन-सहन में बदलाव है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इतनी प्रगति के बाद भी लोगों को यह नहीं पता कि बीएमआई क्या है। उनके बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं और उन्हें पता तक नहीं । अभिभावको में सर्तकता की कमी भी इस समस्या की एक वजह है।’
मोटापे के इतनी तेजी से फैलने के कई कारण है जिसमें रहन-सहन में बदलाव, शहरीकरण, सामाजिक वातावरण, विदेशी सभ्यता आदि शामिल हैं। आज से कुछ साल पहले की बात करे तो बच्चों को शाम होते ही पार्कों या मैदानों में खेलने के लिए भेज दिया जाता था लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आजकल बच्चे अपना समय वीडियों गेम, कंप्यूटर, मोबाइल या कॉटून चैनलों पर बिताना पसंद करते हैं। जिसकी वजय से शारीरिक गतिविधियां तो जैसे खत्म सी हो गयी है। वैसे भी खेलने-कुदने के लिए पहले जैसे खुले मैदान कहां रह गये हैं उनकी जगह तो बड़ी-बड़ी इमारतों ने ले ली है।
पिछले 2-4 साल से एक नयी संस्कृति सामने आयी है जिससे बच्चों द्वारा की जाने वाली शारीरिक गतिविधियों की जगह मानसिक गतिविधियों ने ले ली है। आजकल शॉपिंग मॉलों में हजारों स्क्वेयर फीट में ‘गेमिंग जोन’ नाम की बच्चों के खेलने की जगह बना दी जाती है जिससे माता-पिता की शॉपिंग के साथ-साथ बच्चों को खेलने का वक्त मिल जाता है। लेकिन इन गेमिंग जोन में शारीरिक गतिविधियों वाले खेल नाम के ही होते हैं बल्कि यह जोन वीडियों गेमों से भरे रहते हैं। जिससे बच्चों का मानसिक विकास तो होता है लेकिन शारीरिक नहीं।
इसके अलावा आज के बच्चों के खाने-पीने की आदतें पूरी तरह विदेशी सभ्यता से प्रभावित हैं। बच्चों के मनपसंद खाने में बर्गर, मैगी, पिज्जा आदि आते हैं जो कि हाई कैलरी होते हैं। जिससे बच्चों को फायदेमंद कुछ नहीं मिलता अगर मिलता है तो सिर्फ मोटापा। इसलिए बच्चों में बढ़ते इस मोटापे के लिए खाने-पीने की आदतें, रहन-सहन, नयी तकनीक से लेकर सामाजिक वातावरण और आनुवांशिकता सब जिम्मेदार हैं।
बच्चों में बढ़ते मोटापे के बारे में गंगाराम हॉस्पिटल के डॉ मुकुंद का कहना है, ‘बच्चों में बढ़ते मोटापे के प्रमुख कारण बाहर का खाना-पीना और शरीरिक काम न करना है। वह बर्गर आदि के माध्यम से जरूरत से अधिक कैलेरी लेते तो हैं लेकिन उस कैलेरी को बाहर निकालने के लिए वह कुछ नहीं करते जिसकी वजह से मोटापा बढ़ता है। बच्चों में मोटापा बढ़ने के पीछे सामाजिक वातावरण भी काफी हद तक जिम्मेदार है। स्कूल कैंटीन में समौसे, चिप्स, कोल्ड्रिंग जैसे हाई कैलेरी चीजे मिलेंगी तो बच्चों का मोटा होना स्वाभाविक् है।
हील इंडिया मैग्जीन द्वारा दिल्ली के 13 से 19 वर्ष के बच्चों पर किये गये अध्ययन में पाया गया कि तीन में से एक किशोर हफ्ते में एक या दो बार बाहर खाता है, आधे से ज्यादा बच्चे हफ्ते में एक या एक से ज्यादा बार चिप्स खाते हैं, 35 प्रतिशत बच्चे हफ्ते में एक या दो बार कोला पीते हैं जिससे उन्हें 237 कैलरी मिलती हैं। इसी को देखकर पता लगाया जा सकता है कि बच्चों की खाने-पीने की स्थिति कितनी खराब है।
इस बारे में मोटापे से ग्रस्त बच्चों के माता-पिता का कहना कुछ इस प्रकार है..
8 वर्षीय हिमांशु (49 किलो) की मम्मी कुसुम का कहना है, ‘स्कूल से आते ही हिमांशु ऐसी के आगे लेट जाता है और उसे उसी समय ठंडी कोल्ड्रिंग चाहिए होती है। अगर मना करो तो बिलक-बिलक कर रोता है। रोटी-सब्जी तो वो कभी खुशी से खाता ही नहीं, हर रोज मैगडी का बर्गर, पिज्जा हट का पिज्जा मांगता है।’ वहीं दूसरी तरफ 16 वर्षीय (72 किलो) हिमानी की मम्मी पूनम का कहना है, ‘दिन-प्रतिदिन हिमानी का मोटापा बढ़ता ही जा रहा है, स्कूल के अलावा बाहर कहीं नहीं जाती है और जाये भी कहां आस-पास में कोई पार्क ही नहीं है।’
बच्चों के खाने-पीने के बारे में आहार विशेषज्ञ मेहर मलिक का कहना है, ‘बच्चों के माता-पिता को बचपन से ही मोटापे को रोकने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि अगर एक बार बच्चे इसके शिकार हो गये तो उसे रोकना बहुत मुश्किल है। बच्चों को ज्दाया से ज्यादा फाइबर वाली चीजें खाने की आदत डालनी चाहिए। जब भी बाहर जाये तो ध्यान रखे कि बच्चे का पेट घर से ही भर दे ताकि वो बाहर जाकर कुछ नहीं मांगे। और अगर कभी खिलाना भी पड़े तो ऐसा कुछ खिलाये जिसमें कम कैलोरी हो और अन्य लाभदायक चीजे ज्यादा।’
मोटापे के कारण बच्चे बीमारियों के भी तेजी से शिकार हो रहे हैं। जिसमें मधुमेह, उच्च रक्तचाप, जोड़ों में दर्द, मानसिक परेशानियां आदि शामिल है। 2006 में दिल्ली डाइबेट्स रिसर्च सैंटर की रिपोर्ट सामने आयी थी जिसमें मोटापे को देश के बच्चों में बढ़ते मधुमेह का प्रमुख कारण बताया गया था। बचपन में ही इस तरह की बीमारियों से ग्रस्त हो जाने के कारण बच्चों के आने वाले जीवन पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।
अमेरिका में पिछले साल किये गये अध्ययन में सामने आया था कि मोटे बच्चे पतले बच्चों की तुलना में जल्दी मरते हैं। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आग की तरह फैलती यह बीमारी देश के लिए कितनी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। इसलिए रहन-सहन बदलने से पहले उसके फायदे और नुकसान के बारे में जरूर सोच ले।



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