Sat19052012

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असुरक्षित आशियानों की दिल्ली

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लोगों का तर्क है कि एमसीडी नक्शा पास नहीं करती, पर हमें तो रहने के लिए मकान चाहिए, इसलिए हमें रिश्वत देने से भी कोई परहेज नहीं है.वहीं एमसीडी का कहना है कि हमने कड़े नियम बनाए हैं, लेकिन पुलिस इस व्यवस्था को घूस लेकर खराब कर रही है...

राजीव गुप्ता

मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में मकान बहुत महत्वपूर्ण है. हर इंसान की इच्छा होती है कि सिर ढकने के लिए उसका  अपना आशियाना हो. इसी की  जद्दोजेहद में इंसान अपने जीवन की अधिकतम आयु लगा देता है, मगर यही आशियाना जब उसके अपनों की मौत का कारण बन जाये तो जाहिर है वह टूट जायेगा.  
 
कुछ ऐसा ही पश्चिमी दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में रहने वाले गगन पाठक के परिवार के साथ हुआ. 2 दिसंबर, 2011  की सुबह अचानक चारमंजिला मकान के भरभराकर गिर जाने से लगभग चार लोग मौत की नींद सो गए, जिनमें से तीन लोग (माँ, पत्नी और बेटी ) तो गगन पाठक के परिवार के ही थे  और लगभग दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए.  

india-building-collapseललिता पार्क ( 15   नवम्बर, 2011 , पूर्वी दिल्ली ) और चांदनी महल ( 27 सितम्बर, 2011 दरियागंज ) के बिल्डिंग - हादसों के बाद यह तीसरा बड़ा हादसा था. और फिर से सरकार का स्क्रिपटिड ड्रामा शुरू हो जाता है. नेताओं का दौरा, मृतकों के परिजनों से हमदर्दी,  मुआवजे का ऐलान, विजिलेंस जांच के आदेश, इंजिनियरों का सस्पेंशन,  दोषियों को कड़ी सजा का आश्वासन और भविष्य में ऐसी घटना न होने देने का संकल्प आदि -आदि.
 
 एमसीडी की वेबसाइट पर जारी सूची के अनुसार  27  मई 2010  से लेकर 2 दिसंबर 2011  तक लगभग 190 ऐसी कॉलोनियां हैं  जो कि अनधिकृत रूप से बनायी गयी हैं. दिल्ली जो कि भारत की राजधानी है, फिर भी यहाँ अनाधिकृत कालोनियों का निर्माण हो रहा है. यह इतना मत्वपूर्ण विषय नहीं है, असली मुद्दा यह है कि किस विभाग की लापरवाही से ये अनाधिकृत निर्माण हुआ है या हो रहा है ? 
 
लोगों का तर्क है कि एमसीडी नक्शा पास नहीं करती, पर हमें तो रहने के लिए मकान चाहिए. इसलिए हमें रिश्वत देने से भी कोई परहेज नहीं है. वहीँ एमसीडी का कहना है कि हमने कड़े नियम बनाए हैं, लेकिन पुलिस इस व्यवस्था को घूस लेकर खराब कर रही है.  हम तो अवैध निर्माण गिराना चाहते हैं, लेकिन पुलिस हमारा साथ ही नहीं देती.  
 
अगर पीडब्ल्यूडी या डीडीए की कमी से कहीं अवैध निर्माण हुआ है तो झट से एमसीडी में सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता कांग्रेस- सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं, परन्तु अगर इससे उल्टा होता है अर्थात ललिता पार्क या चांदनी महल में कोई मकान गिरता है तो फिर दिल्ली सरकार और केंद्र के कांग्रेसी नेता एमसीडी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं. लाशों पर भी राजनेता अपनी राजनीति चमकाने से गुरेज नहीं करते.
 
सभी जानते हैं कि  1977 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ईस्ट दिल्ली के वेलकम इलाके में सरकारी जमीन पर  रातोंरात सैकड़ों झुग्गियां एक साथ बसा दी गईं थी, क्योंकि मामला वोट का था. विरोध करने वाले विरोध करते रह गए और वह कॉलोनी वहां हमेशा के लिए बसनी थी और बस गई. यह तो मात्र एक उदहारण है. दिल्ली में जाने कितने ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे, जहां वोट की राजनीति के चलते कॉलोनियां हमेशा के लिए बसा दी जाती है.  ऐसी अवैध कॉलोनियों को बसाना और फिर पास कराना कोई नया काम नहीं है.

इस धंधे में पहले राजनेता उन्हें अपनी जीत के लिए बसाते हैं, फिर उनसे  'नोट' लेकर अपना मुआवजा ऐठ लेते हैं. ऐसी अवैध कॉलोनियों में बिजली से लेकर पानी तक अर्थात लगभग आवश्यक सारी सुविधाएँ भी मिल ही जाती हैं. नोट और वोट का यह ऐसा मिश्रण होता है कि क्या मजाल कोई कुछ बोल दे. एक बार कॉलोनी बस गई तो बस गई,  फिर कोर्ट से लेकर सबके सब बेबस हो जाते हैं.  
 
हालाँकि हाई कोर्ट ने कुछ साल पहले निर्देश दिया था कि ऐसी कॉलोनियों में किसी प्रकार की कोई नागरिक सुविधाएं न दी जाएं, परन्तु मानवता की आड़ लेकर सब काम हो गया. कॉलोनियों को सुविधाएं दी गयी और उनके पास कराने का प्रस्ताव भी लाया गया. और तो और लगभग 1218 कॉलोनियों को तो प्रोविजनल सर्टिफिकेट दे दिया गया है.     
 
कुछ कमियां नियमों में भी हैं. जिनके चलते अवैध निर्माण के लिए लोग मजबूर भी हैं. मसलन दिल्ली में 1958 में जो बिल्डिंग बायलॉज बने थे, आज भी उन्हीं पर अमल किया जाता है, जबकि यहाँ की जनसँख्या अब दुगने से भी ज्यादा हो गयी है. कुछ कमेटियां जरूर बनीं, पर  उनकी रिपोर्ट कभी लागू ही नहीं हो पायीं. वर्ष 1977 में 600 से ज्यादा जिन कॉलोनियों को पास किया गया आज तक उनके नक्शे पास नहीं होते, क्योंकि बायलॉज इसकी इजाजत नहीं देते.  
 
चांदनी चौक जैसे इलाको में जहां के भवन सैकड़ों वर्ष पहले मिट्टी के ईंट-गारों से बने थे, आज उनकी हालत जर्जर हो चुकी है. ऐसे इलाकों के बारे में एक बार फिर से सोचना होगा.  राजधानी होने के नाते वर्षभर में लाखों लोग दिल्ली बसने या रोजगार की तलाश में आते हैं, जिससे सभी प्रकार की व्यवस्था बनाये रखने में दिक्कत तो होगी परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली का प्रशासन और राजनेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और लोग मरते रहें.  
 
दिल्ली पुलिस जिसकी पूरे देशभर मिसाल दी जाती हो, उसकी नाक के नीचे धडल्ले से अनाधिकृत निर्माण होना अपने आप में प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है. इन सभी कमियों के बावजूद चाहे वह आम जनता की हो अथवा प्रशासन की सबको नोट और वोट की राजनीति से ऊपर उठकर इस समस्यां का समाधान खोजना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि अब ऐसे बिल्डिंग हादसे दिल्ली में न हों और गगन पाठक की तरह कोई और अपना परिवार न खोये.

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