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Back समाज उपभोक्ता आंकड़ों से 45 गुना ज्यादा मौतें

आंकड़ों से 45 गुना ज्यादा मौतें

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जब चिकित्सा समुदाय कैंसर दिवस मनाने की विविध तैयारियों में था, उसी दिन वाशिंगटन विश्वविद्यालय के संस्थान ‘इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैलुएशन’ ने 1980 से 2010 के बीच जुटाए आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया 2010 में दुनियाभर में 12 लाख लोगों की मौत मलेरिया से हुई...

संजय स्वदेश

एड्स और कैंसर के बचाव के लिए खूब जागरुकता अभियान चलाये जाते हैं, जिनमें करोड़ों रूपये खर्च होते हैं। इसके समानांतर एड्स और कैंसर जैसी खतरनाक स्थितियों से बचाने के लिए उपयोगी उपकरण, दवा आदि का एक बड़ा बाजार मजबूत होते जाता है। मतलब ऐसे अभियानों से इनकी दवाओं का बाजार गर्म होता है।

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जिनके पास पैसा है, वह महंगी दवाओं से अपनी प्राणों की रक्षा में हजारों रूपये खर्च करते हैं। मगर इन गंभीर रोगों में गरीब की मौत कब हो जाती है, पता ही नहीं चलता है। दिसंबर में हर वर्ष एड्स दिवस मनाया जाता है। सप्ताह से पखवाड़े भर तक कार्यक्रम चलता है। विदेशी संस्थाओं के साथ-साथ अपनी सरकार भी ऐसे आयोजनों को अच्छी खासी फंड देती है।

चार फरवरी को विश्व कैंसर दिवस पर समाचार पत्रों में इसकी जागरुकता को लेकर पाठ्य सामग्री दिख जाती है। इसके लिए भी अनेक आयोजन होते हैं। मगर जिन बीमारियों की दवाओं का बड़ा बाजार नहीं बन पाया, उसको लेकर कहीं शोरगुल नहीं होता है।

जब चिकित्सा समुदाय कैंसर दिवस मनाने की विविध तैयारियों में था, उसी दिन वाशिंगटन विश्वविद्यालय के संस्थान ‘इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैलुएशन’ ने 1980 से 2010 के बीच जुटाए आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया 2010 में दुनियाभर में 12 लाख लोगों की मौत मलेरिया से हुई।

भारत में मलेरिया के मौजूदा अनुमानित आंकड़े से 45 गुना ज्यादा लोग मरे। मतलब मच्छर हर साल हजारों लोगों को मार रहे हैं। एड्स और कैंसर से भी इतने लोग हर साल नहीं मरते हैं। मच्छर मारने का सरकारी अभियान का कहीं कुछ अता-पता नहीं है। छत्तीसगढ़ समेत देश के अधिकतर आदिवासी इलाकों में मलेरिया से सर्वाधिक मौतें होती हैं।

मलेरिया से बचाव के लिए चले विभिन्न सरकारी अभियान घपलेबाजी में फंसे हैं। इसका ताजा उदाहरण है छत्तीसगढ़ में मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरदानी की खरीद-फरोख्त में सामने आई धांधली। यह खबर समाचार पत्र की सुर्खियां बनी। वर्तमान में यह प्रकरण हिलोरे लेते नहीं दिख रहा है। ऐसे ही हालत कमोबेश हर प्रदेश में हैं।

पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 2010 में मलेरिया से दुनियाभर में तकरीबन साढ़े छह लाख लोगों की मौत हुई। भारत के संदर्भ में तो इस अध्ययन रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि साल 2010 में भारत में मलेरिया से करीब 46,970 लोगों की मौत हुई।

इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 4,826 है, जबकि पांच साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 42,145 रही। इस रिपोर्ट के उलट भारत के राष्ट्रीय संक्रामक रोग नियंत्रण कार्यक्रम की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि 2010 में सिर्फ 1,023 लोगों की मौत मलेरिया से हुई। वर्ष 2002 में मलेरिया से भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के 19,000 बच्चों और इससे अधिक उम्र के लगभग 87,000 लोगों की मौत हुई थी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक उपचार की व्यवस्था और रोकथाम के उपाय बढ़ने से मलेरिया के कारण होने वाली मौतों के आकडे में गिरावट आई है। लेकिन रिपोर्ट के इस निष्कर्ष से लगता है कि यह सरकारी बाबुओं और आंकड़ों से मिली जानकारी के आधार पर है। सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए क्या-कुछ नहीं करती है। कभी आंकड़ों की बाजीगरी तो कभी बयानों का खेल खेला जाता है।

दरअसल, दवा कपंनियां भी मलेरिया की सस्ती और कारगर दवा बनाने के लिए प्रयासरत नहीं हैं। मलेरिया से सबसे ज्यादा गरीब वर्ग प्रभावित है। क्योंकि वो गंदगी के बीच रहता है और महंगे इलाज के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। गंदी बस्ती में ही मौत के मच्छर पैदा होते हैं। यदि यही बीमारी उच्च और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को होती तो कंपनियां भी इसे भुनाने के लिए दवा बनाने की होड़ में लग जाती है।

ऐसी स्थिति में मलेरिया के लिए भी एड्स और कैंसर की तरह जागरुकता उन्मूलन अभियान प्रायोजित किये जाते। हालांकि ऐसी बात नहीं है कि यह बीमारी किसी अमीर को नहीं होती है, संपन्न वर्ग भी इसकी चपेट में आता है, लेकिन इनकी संख्या नागण्य है। सम्पन्न वर्ग जागरुकता होने के कारण तुरंत इलाज करा लेता है, वहीं गरीब और आदिवासी इलाकों में स्थिति भयावह है।

गरीब वर्ग में थोड़ी-बहुत जागरुकता आई है, तो अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मलेरियां का प्रकोप काफी बढ़ चुका होता है। गैर-सरकारी संगठन और सरकार को चाहिए कि एड्स और कैंसर जैसी बीमारियों से जनता बचाने की तरह अपनी जागरुकता मलेरिया से बचाने में भी दिखाये।

sanjay-swadesh

 

युवा पत्रकार और मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट के संपादक.

Comments  

 
0 #1 prashant dubey 2012-02-06 12:16
acchi lekh hai...apne jo likha hai wah... vichar karne layake hai.....

my email plz. i want your nuber... mail add. ma bhaje.... thanks......
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