दबंग व्यवसायी और स्थानीय प्रशासन का गठजोड, आमजन के उत्पीडन व दमन के लिये समाज में मुकम्मिल ताकत के रूप में स्वीकारा जा चुका है. उस पर सत्ता का साया, पत्रकारों की हिमायत और दलाल पैरोकारों की पुरजोर वकालत किसी भी नाचीज को बेजोड हस्ती बना देती है. ये अलग बात है कि इस तरह की हस्तियों का अपना भ्रामक कल्पनालोक होता है. भ्रामक कल्पनालोक में विचरती ऐसी ही एक हस्ती ने अपने मुलाजिम को घंटों बंधक बनाकर अमानवीय यातनाएं दीं और मरा समझकर सड़क किनारे फेंक भी गये. वाक्या है उत्तराखण्ड में जनपद नैनीताल के उस कसबे का जो लालकुंआ तहसील के नाम से जाना जाता है. इस पूरे मामले की पड़ताल कर अलग अंदाज में पेश किया है संजय रावत और सुधीर कुमार ने...
पात्र परिचय-
(1) रामबाबू गुप्ता- हाल निवासी तिवारी नगर, लालकुआ मूलनिवासी विषारदगंज, बरेली. ये भाटिया बंधुओं की सप्लाई एजेंसी में पिछले 3 वर्षों से बतौर रिक्शा चालक नौकरी करता है. सुबह से रात तक भाटिया बंधुओं के आर्डर का सरिया, सीमेंट, पाइप व अन्य सामान ढ़ोना रामबाबू की दिनचर्या है जिससे वो बमुश्किल अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता है.
(2) संटी-बंटी- इन भाटिया बंधुओं का नाम क्रमशः दीपक भाटिया -जीतेन्द्र भाटिया है ये दोनों भाई स्व. हरीश भाटिया नामक व्यवसायी के पुत्ररत्न हैं. इनके बड़े भाई आशीष भाटिया एक नेक, सुशील, कर्मठ और कत्र्तव्यनिष्ठ छवि के सांसद के प्रतिनिधि और पूर्व सभासद और पत्रकार है. आशीष भाटिया का राजनीतिक गलियारों की जूठन से बड़ा कारोबार स्थापित है. जिसमें शराब के ठेके, जमीनें और अचल सम्पत्तियों का कारोबार मुख्य है. इन्हीं के संरक्षण में संटी-बंटी खुद को ही सांसद समझने के दंभ में अपने धंधों को गति देते हैं.
(3) नरवीर- सप्लाई एजेंसी में नौकर मात्र है लेकिन भाटिया बंधुवों के हर जायज और नाजायज क्रियाकलापों में मुस्तैदी के साथ जुटा रहता है.
(4) पैरोकार- कामचलाउ वकील, तथाकथित पत्रकार और स्थानीय छुटभैय्ये जो भीड़ के रूप में भाटिया बंधुओं की पैरोकारी ही नहीं करते बल्कि अपने-अपने सम्बन्धों से दबाव भी बनाते हैं.
घटनाक्रम
बृहस्पति वार 15 सितम्बर को रामबाबू रोज की तरह रिक्शे पर भाटिया संस का माल ढ़ो रहा था. इसी दौरान उसे बिन्दुखत्ता निवासी एक व्यक्ति ने तीन हजार (3000/)रुपये दिये और
भाटिया संस से सीमेंट लाने को कहा. रिक्शे से सामान उतारने-चढ़ाने के दौरान पैसे रामबाबू की जेब से कहीं गिर गये. रामबाबू ने इस बात की जानकारी भाटिया बंधुओं को दी और गलती स्वीकारते हुए निवेदन किया कि यह रकम उसमे पारिश्रमिक में से थोड़ा-थोड़ा कर काट ली जाए. इसके बाद रामबाबू भोजनावकाश के लिए घर चला गया. करीब 3 बजे सायः भाटिया बंधुओं ने नरवीर को रामबाबू के घर भेजा और माल सप्लाई के बहाने दुकान में बुलवा लिया, जहां भाटिया बंधुओं और नरवीर ने मिलकर रामबाबू को अमानवीय यातनायें दीं और लाठी-डंडों, पानी के पाइप इत्यादि से जमकर पिटाई की. 6 घंटों की यातना झेलते-झेलते रामबाबू बेहोश हो गया, जिसे भाटिया बंधुओं ने मरा समझकर देर रात हाइवे किनारे फेंक दिया. रात भर रामबाबू के घर वाले उसे खोजते रहे पर उसका कहीं भी पता नहीं चल पाया. रात भर की ढू़ढ खोज के बाद सुबह 6 बजे रामबाबू के भाई प्रेमपाल ने उसे सड़क किनारे मरणासन्न हालत में पाया. खबर फैलने पर स्थानीय मीडिया ने मेडिकल सेवा 108 (एम्बुलैंस) बुला कर अस्पताल में भर्ती कराया.
दबंगों की अदालत-भाटिया बंधुओं की एजेंसी ‘भाटिया संस’ सामान्यतः साय 7 बजे बंद होती है लेकिन 15 सितम्बर को रामबाबू जब करीब 3.30 पर दुकान पहुंचा तो भाटिया बंधुओं का बाहुबल अपने चरम पर था, उन्होंने सांय 7 बजे नरवीर को आदेश दिया कि दुकान का शटर बंद किया जाये. दुकान बंद करने के बाद रामबाबू से गाली-गलौच के साथ पूछताछ शुरू की. इस बीच भाटिया बंधू शराब भी पीते रहे. शराब के शुरुर के साथ पहले चप्पलों से रामबाबू की पिटाई हुयी, थोड़ी थकान महसूस के बाद फिर शराब का दौर शुरू हुआ. अबकि बार रामबाबू को निर्वस्त्र कर दिया गया. इस दफा पिटाई कांच के स्केल और लोहे की सरिया से की गयी, रामबाबू के पास रोने बिलखने के अलावा कोई चारा नहीं था. फिर शराब का दौर चला, इस बार संटी-बंटी ने रामबाबू हाथ-पांव पकडे और नरवीर ने जी भर के पीटा. अब शराब अपना असर अच्छी तरह दिखाने लगी और भाटिया बंधुवों को रामबाबू की चित्कार मनोरंजक लगने लगी. अबकि बार शराब के दौर ने नया अविष्कार किया, रामबाबू की चित्कार का मजा लेने के लिये उसके जख्मों और नंगे बदन पर पैट्रोल डाला गया और रामबाबू को जबरन शराब पिलायी गयी. दर्द और शराब के नशे की हालत का लुत्फ भाटिया बंधुंओं को और मनोरंजक लगा तो नरवीर को कीलें और हथौड़ा पेश करने का आदेश दिया. दो-तीन कीलें रामबाबू के पैरों पर ठोंकी गयी तो रामबाबू बेहोश हो गया तब भाटिया बंधुओं को होश आया कि यह तो मर चुका है. शाम 4 बजे से 10 बजे तक चली इस अदालत ने फैसला किया कि इसे सड़क पर फैंक दिया जाये ताकी रात को गुजरने वाले वाहन इसे कुचलते हुए निकल जाये. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भाटिया बंधुओं की इन अदालती कार्यवाही में वो व्यक्ति भी मौजूद था जिसके 3 हजार रुपये रामबाबू से खो गये थे. रामबाबू के बयान के मुताबिक इस शख्स ने प्रताडित नहीं किया. यह सिर्फ मूक दर्शक बना वहां बैठा रहा.
मित्र पुलिस- उत्तराखण्ड पुलिस में लोगों का भरोसा बने इसलिए मित्रता-सेवा-सुरक्षा के नारे के अलावा एक नारा और वजूद में आया, वो था ‘मित्र पुलिस’.पर पुलिस की कार्यप्रणाली तो नहीं बदली मगर इस नारे को ही अलविदा कह दिया गया. रामबाबू के केस में भी पुलिसिया चरित्र वैसा ही था जैसे आम तौर पर देखा जाता है. पहले पुलिस रिपोर्ट ही दर्ज नहीं हुयी, हुई तो पुलिस कार्रवाई से बचती रही. अंततः पुलिस ने रास्ता ढूंढ ही निकाला. भाटिया बंधुओं को थाने बुलाया गया और रामबाबू पर समझौते का दबाव बना कर केस रफा-दफा करके चलता बनने का आदेश भी दे डाला. भाटिया बंधुओ ने एक हजार रुपये रामबाबू की तरफ बढ़ाये और चलते बने, रामबाबू ने रकम नहीं ली तो पुलिस और दबाव बनाने लगी. आखिरकार रामबाबू का परिवार थाने से लौट आया और हलद्वानी बेस अस्पताल में अपना ईलाज करा रहा है और दहला देने वाली घटना को याद कर सहम जाता है. रामबाबू की मां का कहना है कि समझौते से मना करने पर कोतवाल ने उन्हें गंदी गालियां दीं.
जनता का विरोध- रामबाबू की आपबीती और पुलिस की कार्यप्रणाली से गुस्साये लोगों में आक्रोश पैदा हो गया, परिणामस्वरुप लोग सड़कों पर उतर जाये और शासन-प्रशासन की खिलाफत करते हुए सांसद का पुतला फूंका गया जिसके बाद शासन स्तर से कार्यवाही का आदेश मिला और संटी-बंटी व उनके सहयोगी नरवीर की गिरफ्तारी संभव हो सकी.
गिरफ्तारी और रिहायी- जनता का विरोध न होता तो शायद ही भाटिया बंधुवो की गिरफ्तारी हो पाती, लेकिन सांसद प्रतिनिधि के पूंजीपती और दबंग भाइयों की गिरफ्तारी महज एक रस्मअदायगी थी. पुलिस ने सामान्य अपराध की धाराओं (343, 323, 504, 506) के अंतर्गत गिरफ्तार किया और उनके पैरोकारों व्यवसायी, पत्रकार मित्रों की मदद से उन्हें हाथों-हाथ जमानत भी मिल गयी.
एक्सट्रा शाट्स- भाटिया बंधुओं तथा नरवीर की गिरफ्तारी और जमानत की खबर हमें एक साथ ही मिली, खबर मिलते ही न्यायालय परिसर की तरफ दौड़ना लाजमी था. हमने दैनिक अखबारों के पत्रकार और फोटोग्राफर को भी बुलाया, पुलिस कर्मियों और उनके वकील से भी बातचीत की. इसके बाद का अनुभव लाजवाब था - वहां मौजूद सब पत्रकारों के फोन बजने लगे, किसी के ब्यूरो का तो किसी के परिचित का, किसी के सीनियर का तो किसी के मित्र का. स्थानीय नेता, पत्रकार, व्यवसायी, परिचित सभी भाटिया बंधुवो की हिमायत में दबाव बनाने लगे. एक तथाकथित पत्रकार ने हमसे कहा जाने भी दो ये अपने छोटे भाई हैं, हो गई गलती. इस पर एक वकील भी फब्ती कसी अरे करने दो फोटो, पत्रकारों का अधिकार है यार, नही तो मालिक, संपादक शाबाशी कैसे देगा. एक वकील ने कहा बडे ढीठ हैं, ये पत्रकार. खामखां इश्यू बना रहे हैं तभी तो पिटते हैं हर दूसरे दिन सड़कों पर.
भाटिया बंधुवो का अपना बचाव तथा उनके हिमायतियों की भीड़ तो समझ में आ रही थी लेकिन वकीलों के ताने और विरोध का मतलब बनता है, यानी कि उन्हें अपनी दलील पुलिस कार्रवाई की पूरी समझ है, वो जानते हैं कि भाटिया बंधुवो का अपराध है. केस फिर से खुल सकता है, धारायें फिर भी बढ़ायी जा सकती है. ऐसे में उनकी दुकानदारी जरुर प्रभावित होगी और लोगों का उन पर से और न्याय व्यवस्था से भी विश्वास उठ जाएगा. शायद यही उनके विरोध की वजह थी.



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vyas muni tiwari
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