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भाजपा के इस राज्य में भी हुआ दंगे का श्रीगणेश

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उत्तराखण्ड के मैदानी इलाके में मिश्रित आबादी के तौर पर बसाये विस्थापितों से आबाद हुआ तराई का यह इलाका जो कौमी गुलदस्ते के रुप में जाना जाता था वहीं इसके वाशिंदे अपने आप को गर्व से मिनी भारत के रुप में कहते नही अघाते थे, लेकिन अहिंसा के पुजारी के जन्मदिन पर इस मिनी भारत में हैवानियत का ऐसा नंगा नाच होगा कि विभिन्न समुदायों से सजा यह गुलदस्ता न केवल बिखर जायेगा बल्कि कभी न भूलने वाले दर्द की सौगात दे जायेगा इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी...

सलीम मलिक

dange3उत्तर प्रदेश में रहते हुए उत्तराखण्ड में जो नहीं हुआ वह उत्तराखण्ड राज्य गठन के दस साल बाद ऐसा हुआ कि इसके छींटे तो चाह कर मिटाए भी जा सकते है लेकिन जख्म भरने में अगर अर्सा लग जायें तो भी यह माना जायेगा कि यह काम बहुत थोड़ी कीमत ही हो गया!

बात की जा रही है दो दिन पूर्व रुद्रपुर में हुए दंगे की. जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी को अपनी श्रद्धान्जली देने में लगा था तो उस समय उत्तराखण्ड के रुद्रपुर नगर में हैवानियत का नंगा नाच अपने चरम पर था. धार्मिक ग्रंथ के अपमान से उपजे विवाद के बाद हालात उस स्तर में पहुंच गये जहां रिश्तों के बीच की शर्म और लिहाज ने दम तोड़ दिया. और इसे इत्तेफाक कहा जाये या फिर कुछ और कि यह दंगा ऐसे समय में हुआ है जब सत्ता में भारतीय जनता पार्टी है और कुछ ही माह के बाद विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है.

उत्तराखण्ड के मैदानी इलाके में मिश्रित आबादी के तौर पर बसाये विस्थापितों से आबाद हुआ तराई का यह इलाका जो कौमी गुलदस्ते के रुप में जाना जाता था वहीं इसके वाशिंदे अपने आप को गर्व से मिनी भारत के रुप में कहते नही अघाते थे, लेकिन अहिंसा के पुजारी के जन्मदिन पर इस मिनी भारत में हैवानियत का ऐसा नंगा नाच होगा कि विभिन्न समुदायों से सजा यह गुलदस्ता न केवल बिखर जायेगा बल्कि कभी न भूलने वाले दर्द की सौगात दे जायेगा इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

अस्सी के दशक में रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान पूरे देश में फैली नफरत की आंधी के दौर में जो तराई अपने आप को झुलसने से बचा ले गयी वह इस बार उतनी खुशनसीब साबित न हुई तो इसके निहितार्थ घटना के एक दिन बाद राजनैतिक बिसात पर भी तलाशने की कवायद आरम्भ हो गयी है.

घटना के बाद स्थानीय उपजिलाधिकारी का यह बयान की दंगा पूर्व नियोजित था और कुछ बाहरी लोग हर हाल में शहर की फिजां को खराब करने का मंसूबा पाले ही हुये थे, इस बात की पुष्टि करता है कि यदि प्रशासन मुस्तेद होता तो घटना को टाला जा सकता था. अब जिस प्रकार की सूचनायें छन-छन कर आ रही है उससे साफ है कि दरअसल राज्य के इस शांत हिस्से को हिंसा की आग में बरबाद करने की इबारत पहले ही लिखी जा चुकी थी जिसे पढ़ने में प्रशासन व उसका खुफिया विभाग पूरी तरह से फेल हुआ.

सितम्बर के पूर्वाद्ध में उत्तरप्रदेश के पीलीभीत जिले के एक गुरुद्वारे में गुरुग्रंथ साहिब के अपमान के बाद घटना में कथित तौर पर लिप्त एक समुदाय के दो युवको को उनके समुदाय ने निर्दोष माना था. इसको लेकर समुदाय विशेष के लोगों ने प्रशासन की इस बात के लिये तीखी आलोचना की थी. यहां पर प्रशासन की नामसझी का आलम यह रहा कि बेहद संवेदनशील हो चुके इस मुददे पर वह अपनी कार्यवाही से समुदाय विशेष के लोगों में विश्वास बहाली न कर सका जिससे उनके अंदर असुरक्षा की भावना पनपने लगी. और बाद में इस कमजोर भावना को भड़काने का काम करने में असामाजिक तत्व पूरी तरह से सफल हो गये.

हालांकि दंगे के बाद जिस प्रकार से प्रशासनीक मुस्तैदी दिखा कर दंगे पर काबू पाया गया वह प्रशंसनीय है लेकिन सवाल यह है कि इस प्रकार की मुस्तैदी दिखाने में प्रशासन पहले क्योंdange1 चूक कर गया. अभी बाद में घटना के जिम्मेदारों की शिनाख्त के लिये जांच की जायेगी लेकिन घटना के आरोपियों के तौर पर पकड़ में आये लोग महज मोहरे ही न हो बल्कि नफरत की जमीन पर बिछी शतरंज की बिसात पर खेलने वाले खिलाड़ी और मास्टर माइन्ड हो तो ही इस जांच का कोई सबक हो सकता है वरना तो हो सकता है कि कानूनी तौर पर प्रशासन अपने आप को बचा ले जाये लेकिन सामाजिक तौर पर इसके होने वाले व्यापक नुकसान की भरपाई समाज को ही करनी पड़ेगी. ऐसे में प्रशासन के साथ-साथ समाज के अगुवा तबके की जिम्मेदारी भी है कि वह प्रशासन के साथ मिलकर ऐसी साजिशों को बेनकाब करने का काम करे जिससे कि ‘लम्हो ने खता की थी सदियों ने सजा पायी है’ जैसे हालत न पैदा हो सकें.

हालांकि राज्य के इतिहास में कभी भी इस प्रकार के धार्मिक उन्मांद की संस्कृति नहीं रही लेकिन जिस प्रकार से बीते कुछ समय से लगातार माहौल को दूषित करने का प्रयास किया जा रहा है उससे यहां भी संस्कृति से खिलवाड़ करने की बुनियाद पड़ने की बात से इंकार नही किया जा सकता जिसे केवल उसी हालत में नेस्तानाबूत किया जा सकता है कि समाज के पैरोकार ठान ही ले कि किसी भी हालत में राज्य के समाजिक परिवेश के ताने-बाने को दंगाइयों के हाथ में नही सौपा जा सकता. तराई की फिजांओं में आई समाजिक विसंगति को तराई की जमीन पर दफन करने का काम तराई की ही उर्वरा जमीन कर सकती है और करेगी भी,, अमनपसंद समाज की यही चाहत है.

Comments  

 
0 #1 naveen 2011-10-07 18:56
this is a shameful act which has deeply hammered the harmony of the city. Indeed the incidents point to vested interests of political parties. All the social organizations, and responsible citizens should come forward to protest this incident and maintain harmony in the society.
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