पुरुषों के लिए ‘इज्जत लुटने‘ या ‘बेइज्जत होने‘ जैसी कोई अवधारणा है ही नहीं। फिर भी पुरुषों के सामने ‘बेइज्जत जिंदगी‘ और ‘बाइज्जत मौत‘ का विकल्प हो तो वे ‘बेइज्जत जिंदगी‘ का ही विकल्प चुनेंगे...
गायत्री आर्य
हाल ही में लीबिया में एक पिता ने किशोरावस्था वाली अपनी तीन बेटियों की गला रेतकर हत्या कर दी। गद्दाफी के सैनिकों द्वारा उनका बलात्कार किया गया था। उन बच्चियों का अपराध था कि उन्होंने अपने उपर हुए हमले से बचने के लिए ना तो जौहर किया, ना ही कुएं में कूदी। यहां तक कि बलात्कार के बाद भी उन्होंने किसी भी तरीके से आत्महत्या का प्रयास नहीं किया।
वे जीना चाहती थीं। लेकिन दुनिया के अधिकांश पिताओं की तरह उस पिता को भी लगा कि बलात्कार के बाद जीवन का कोई मतलब नहीं और उन्हें मार दिया। लेकिन दिमाग में सवाल कुलबुलाता है कि उस पिता को ऐसा क्यों नहीं लगा कि अपनी ही बच्चियों की हत्या के बाद उसके जीवन को कोई मतलब नहीं रह जाएगा ! उसके हाथों ने खुद अपनी गर्दन क्यों नहीं काटी? पुरुषों और पितृसत्ता को अपना जीवन हमेशा से ही कितना अनमोल लगता रहा है?

स्त्रियों के जीवन में ऐसी कितनी ही चीजें हैं जहां हत्या या आत्महत्या ही एक बेहतर विकल्प के रुप में उभरता है। इसके विपरीत पुरूषों के जीवन में कुछ भी घटने या कुछ भी कर गुजरने के बावजूद भी उनकी हत्या या आत्महत्या का विकल्प नहीं उभरता। दो समान जीवों की सामाजिक नियती में इतना बड़ा फर्क क्यों? एक को खैरात में भी जीवन नहीं मिलता,दूसरे को न सिर्फ जीने का हक है बल्कि अपने समजीवी का जीवन लेने का भी हक मिल गया।
किसी भी हाल में जिंदा रहने की जितनी ललक पुरुष में है, स्त्रियों में वैसी ही ललक अपनी इज्जत बचाने के प्रति है। जहां पुरुषों का पहला प्यार हर हाल में जिंदा रहना है। वहीं स्त्रियों का पहला प्यार अपनी इज्जत बचा के रखना है उसके लिए चाहे जिंदगी से ही हाथ क्यों ना धोना पड़े। वैसे तो पुरुषों के लिए ‘इज्जत लुटने‘ या ‘बेइज्जत होने‘ जैसी कोई अवधारणा है ही नहीं। फिर भी यदि पुरुषों के सामने ‘बेइज्जत जिंदगी‘ और ‘बाइज्जत मौत‘ का विकल्प हो तो निःसंदेह वे ‘बेइज्जत जिंदगी‘ का ही विकल्प चुनेंगे। क्योंकि वे इस सुंदर सत्य को जानते हैं कि जिंदगी का सच में कोई मोल नहीं।
उनके लिए जीवन अनमोल है, सबसे पहले है, सबसे कीमती है। ‘बेइज्जत‘ या ‘बाइज्जत‘ अमूर्र्त चीजें हैं अलौकिक हैं। इनके बरक्स जीवन शाश्वत है, किसी भी सूरत में जीवन की अवहेलना पुरुष नहीं करना चाहते। इसके विपरीत किसी भी स्त्री का चुनाव ‘बेइज्जत जिंदगी‘ और ‘बाइज्जत मौत‘ में से ‘बाइज्जत मौत‘ ही रहेगा। पुरुषों में जो तड़प और चाहत जिंदगी के लिए है, स्त्रियों में वैसी ही तड़प और चाहत ‘इज्जत‘ के लिए है । हमारा इतिहास ऐसी कितनी ही घटनाओं का साक्षी है।
स्त्रियों का जीवन की अलौकिक चीजों के प्रति अंतहीन प्यार, श्रृद्धा, विश्वास व समर्पण है। वे जीवन जैसी लौकिक चीज की अपेक्षा ईश्वर, इज्जत, मर्यादा आदि के प्रति अटूट श्रृद्धा से समर्पित हैं। जबकि पुरुष ने हमेशा शाश्वत चीजों के प्रति ही अपना प्यार और श्रृद्धा दिखाई है। वह अलौकिक चीजों के चक्कर में खटकर जीवन का रस, आनंद, सुख नहीं खोना चाहता। लेकिन पितृसत्ता ने स्त्रियों के जीवन में अलौकिक चीजों को लौकिक चीजों के मुकाबले कम महत्वपूर्ण ठहराया है। इसका असर यह हुआ कि हम स्त्रियाँ अपने जीवन में लगभग ना के बराबर ही विश्वास करती हैं।
विभाजन के वक्त स्त्रियों और बच्चों की लाशों से भरे कुएं इस बात के गवाह हैं। पता नहीं कितनी स्त्रियों ने बलवाइयों के हाथों पड़ने से बचने के लिए जिंदगी का मोह छोड़ा और ‘बाइज्जत मौत‘ का विकल्प चुनकर आत्महत्या की। ऐन जिनकी आंखें के आगे उनके बीवी-बच्चों ने आत्महत्या की वे पुरुष भी जिंदा रहे! भला किसलिए? अपनी जवान बहनों, बेटियों, पत्नियों और बच्चों की आत्महत्या के गम में उन्हें तड़पना, कलपना और नीमपागल होना मंजूर था। लेकिन अपनी हत्या-आत्महत्या मंजूर नहीं थी।
क्यों उन असंख्य पुरुषों के पैरों ने अपनी बीवी-बच्चों, बेटियों और बहनों, माओं के साथ कुएं की देहरी नहीं लांघी? क्योंकि जिंदगी की डोर ने उन्हें और उन्होंने जिंदगी की डोर को कसकर पकड़ा था। जिंदगी की डोर सिर्र्फ पुरुषों को ही क्यों थामे रहती है हर हाल में? स्त्रियों की जिंदगी की डोर रेशम की सी है, संुदर पर बेहद नाजुक, जब-तब टूटने वाली! हम क्या करें ऐसी सुंदर लेकिन नाजुक डोर का जो हमें मुसीबत के वक्त जिंदगी की तरफ खींच नहीं सकती?
वैज्ञानिकों को मौजूदा समय और स्पेस से परे धर्म, संस्कृति, परंपरा के पितृसत्तात्मक हिस्से से रहित एक छोटी सी काॅलोनी या नगर बसाकर देखना चाहिए। जहां पितृसत्तात्मक मूल्य ना हों, जहां स्त्रियों के जीवन में ‘अमूर्र्त‘ चीजों के लिए कोई जगह ना हो। जहां पुरुष श्रेष्ठ और स्त्री कमतर की भावना से रहित हों। जहां पुरुष को दिमाग और देह का रुप और स्त्री को सिर्फ देह ना माना जाए, वहां कुछ चैंकाने वाले परिणाम आने की प्रबल संभावना है। निश्चित तौर पर उस जगह में स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा, यौन हिंसा में भारी कमी आएगी। उस जगह कि स्त्रियों में उतनी और वैसी ही जिंदा रहने की तड़प होगी जैसी और जितनी पुरुषों में होती है।
प्रिंट और इलेक्टाªनिक मीडिया को स्त्री के शरीर से चिपकी ‘इज्जत‘ नाम के इस ‘जन्मजात कवच‘ को तोड़ने की पहल करनी चाहिए। कम से कम ‘इज्जत लुट गई‘ ‘असमत तार-तार हो गई‘ जैसे शब्दों के प्रयोग पीडि़ता के संदर्भ में तुरंत बंद करने चाहिए। या फिर यदि मीडिया व अन्य तमाम बौद्धिक तबका इन शब्दों के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ पा रहा तो इन शब्दों को सही संदर्भों में प्रयोग करें। कहा जाना चाहिए कि बलात्कार करके अमुक पुरुष की इज्जत लुटी।
आखिर हमें भी तो कभी अहसास हो कि हमारे साथ-साथ हमारे भाई, पिता, पति, बेटे, दोस्त भी ‘इज्जतदार‘ पुरुष हैं! पुरुषों को हमने ‘इज्जतभरी‘ जिंदगी जीने के अधिकार से क्यों महरुम किया हुआ है भला? उन्हे भी तो इज्जत भरी जिंदगी जीने का सुख और इज्जत संभाल कर रखने के कड़े जतन से गुजरना चाहिए। उन्हें भी तो पता चले कि इस मेहनत का फल कितना मीठा है, मीठा है भी या नहीं!
खुद को बलात्कार से बचाने के लिए अतीत में जिन स्त्रियों ने जौहर किये, कुएं में कूदी या फिर आज भी इज्जत के नाम पर जिनकी हत्या की जा रही है उन्हे जान से मारने की जिम्मेदारी सिर्फ बलात्कारियों के मत्थे नहीं मढ सकते। उनकी हत्या के लिए जितना हमलावर जिम्मेदार है उतना ही बाकि ‘मासूम इज्जतदार समाज‘ भी जिम्मेदार है।
वे सब उन असंख्य मासूमों की हत्या के जिम्मेदार हैं जो ‘इज्जत लुट गई या अस्मत तार-तार हो गई‘ जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग कर रहे हैं। निःसंदेह बलात्कार एक हादसा है जो देह और दिमाग को घायल करता है। लेकिन हादसों से निपटने का हल हत्या या आत्महत्या भला कैसे है? इज्जत स्त्रियों के ‘सृजनद्वार‘ में चिपकी कोई झिल्ली नहीं जो वहशियाना हमले में फट जाए! वह पूरे व्यक्तित्व का हिस्सा है, जितना स्त्री का उतना ही पुरुष का भी।
इज्जत बचाने के नाम पर की जाने वाली हत्याएं, आत्महत्याएं और जौहर असल में एक निर्दोष व्यक्ति के कत्ल के दोषी हैं। पीडि़ता की हत्या करके या उसे आत्महत्या के लिए उकसाकर और दोषी के खिलाफ कोई भी कड़ी प्रतिक्रिया ना दिखा कर समाज असल में बलात्कारियों के पक्ष में ही खड़ा होता है, उनका उत्साहवर्धन करता है। साथ ही मां-बाप से उनकी बेटी, भाई से उसकी बहन, पति से उसकी पत्नी को हमेशा के लिए छीन लेते हैं।
पितृसत्तात्मक मूल्यों के दबाव में निर्दाेष पीडि़ताओं को मारा तो जाता है लेकिन मां-बाप, भाई-बहन, पति के दिल का कोई कोना तो ठीसता ही होगा हमेशा। एक तरफ जिस स्त्री या बच्ची पर पाश्विक हमला हुआ है पितृसत्तात्मक मूल्य उलटे उसे ही दोषी ठहराकर मंा-बाप व रिश्तेदारों को पीडि़ता की हत्या के लिए उकसाते हैं। दूसरी तरफ यही पितृसत्तात्मक संस्कार बलात्कारी को न तो उसके अपराध के लिए शर्म महसूस करवाता है न ही समाज को उसके बहिष्कार व कड़े प्रतिरोध और असहयोग के लिए तैयार ही करता है।
असल में पितृसत्तात्मक विचार, मूल्य और संस्कार अपनी प्रकृति में बेहद हिंसक, कू्रर, अमानवीय और अन्याय से भरे हैं। ये मूल्य ना सिर्फ स्त्री जाति के लिए खतरनाक हैं बल्कि पुरुषों के लिए दुख का विषय हैं। ये मूल्य पुरुषों को स्त्रियों के प्रति हिंसक, अमानवीय, और कू्रर बनने पर मजबूर करते हैं ।
आखिर इन्ही संस्कारों के कारण एक पिता अपने कलेजे का टुकड़ा खोता है, एक भाई अपनी बहन खोता है, पति अपनी जीवनसाथी को खोता है। यदि सच में पिताओं को अपनी बेटी, भाइयों को अपनी बहन, पतियों को अपनी पत्नी को खोने का दुख नही ंतो यह एक अप्राकृतिक और असहज करने वाली बात है जो कि किसी भी समाज के लिए खतरनाक है।


