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विनयन हमारे हीरो थे

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विनयन धार्मिक नहीं थे लेकिन चर्च का रैडिकल तबका, प्रगतिशील मुस्लिम व सिक्खों के संगठन के बीच भी लगातार आवाजाही करते रहे. जब बिहार सरकार ने एक लाख का इनाम रखा था तो चर्च ने ही उन्हें संरक्षण दिया था. जहानाबाद का अरवल कांड काफी चर्चित हुआ था, जिसमें पुलिस ने 23 लोगों की नृशंस हत्या कर दी. यह अप्रैल, 1986 का साल था. अरवल में मजदूर किसान संग्राम समिति की शांतिपूर्ण सभा हो रही थी, जिस पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाई. पुलिस के इस नरसंहार ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा.

संजय कृष्ण 

भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लड़ाई अन्ना हजारे भी लड़ रहे हैं और एक लड़ाई जेपी ने भी लड़ा था। तब जेपी ने इसे दूसरी आजादी का नारा दिया था। जेपी के इस आंदोलन में कई प्रतिभावान अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर आंदोलन में कूद पड़े थे, उनमें एक नाम डॉ विनयन का भी है। विनयन अब हमारे बीच नहीं हैं। 18 अगस्त, 2006 को पटना मेडिकल कालेज में मलेरिया और टाइफाइड से जूझते हुए उन्होंने अंतिम सांसें ली। आजादी मिलने के एक महीने बाद 11 सितंबर, 1947 को झांसी में उनका जन्म हुआ था, लेकिन पैतृक स्थान आगरा था। आरभिंक पढ़ाई-लिखाई आगरा व लखनऊ में हुई। एमबीबीएस की फाइनल परीक्षा छोड़ यायावरी को ओर प्रवृत्त हो गए। हिमालय की ओर कूच किया और 40 दिन का उपवास किया। साधु-संतों का जीवन निकट से देखा तो इनके प्रति भी विरक्ति पैदा हो गई। पर सत्य की खोज के लिए अनवरत यात्रा जारी रही। स्वामी अग्निवेश के साथ राजनीति में पहला कदम रखा। लेकिन यह साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रहा। इसी बीच अगस्त 1974 में दिल्ली में जेपी से भेंट हुई और जेपी के कहने पर बिहार आंदोलन से जुड़ गए। अगले महीने पटना पहुंचे और जेपी के निर्देश पर गांव स्तरीय सरकार गठन के लिए जहानाबाद आ गए। इसके बाद तो मृत्युपर्यंत जहानाबाद ही इनका हाल-मुकाम रहा। जहानाबाद इनकी कर्मभूमि रही। इसी धरती पर उन्होंने विचारों की सान को तेज किया और लगातार प्रयोग करते रहे। 

vinyanविनयन का कुल जमा परिचय यही नहीं हैं। विनयन ने बिहार के पिछड़े जिले जहानाबाद से जो लड़ाई शुरू की, आगे चलकर उसने देश का भी ध्यान खींचा। विनयन ने गरीब-गुरबों की लड़ाई के लिए समय-समय पर कई संगठनों को खड़ा किया। इनमें 1980 में मजदूर किसान संग्राम समिति और 1988 में जनमुक्ति आंदोलन प्रमुख हैं। विनयन जंगल बचाने और जंगल पर आदिवासियों के अधिकार को लेकर नेशनल फ्रंट आफ फारेस्ट पीपल एंड फारेस्ट वर्कर्स का आरंभ किया। इस संगठन ने बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों में काफी काम किया। आगे चलकर, 2006 में वन अधिकार अधिनियम जो बना, उसमें इस आंदोलन की ही देन प्रमुख है। विनयन कई संस्थाओं से भी जुड़े रहे इनमें लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी  योजना आयोग प्रमुख है। योजना आयोग की बैठकों में वे जाते रहे।  जहानाबाद विनयन का केंद्र था, लेकिन कैमूर की पहाडिय़ों से लेकर रांची की पहाडिय़ों तक उनका कार्यक्षेत्र फैला हुआ था। दलित-आदिवासी, असंगठित मजदूरों, भूमिहीनों के साथ-साथ महिलाओं और पिछड़ों की लड़ाई को भी विनयन ने एक धार दी। उसे एक तार्किक जामा पहनाया। हिंसा में विश्वास नहीं करने वाले विनयन ने एक समय मजदूरों और दलितों की लड़ाई के लिए नक्सली संगठनों से भी हाथ मिलाया। जिसके कारण उन्हें नक्सली करार देकर एक लाख का इनाम भी घोषित कर दिया गया। पर, हिंसा को कभी मन से स्वीकारा नहीं।

विनयन की प्रतिभा एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। पढऩा, सोचना, नई बातों पर बहस करना उनका प्रिय शगल था। पटना के एएन सिन्हा संस्थान से लेकर जेएनयू और दिल्ली विवि के बौद्धिक केंद्रों में बैठकी करते। मीडिया से लेकर पुलिस और गुप्तचर विभाग तक उनको जानने-मानने वाले लोग थे। कभी-कभी गुप्तचर विभाग वाले ही उन्हें आगाह भी करते थे। 

विनयन धार्मिक नहीं थे लेकिन चर्च का रैडिकल तबका, प्रगतिशील मुस्लिम व सिक्खों के संगठन के बीच भी लगातार आवाजाही करते रहे। जब बिहार सरकार ने एक लाख का इनाम रखा था तो चर्च ने ही उन्हें संरक्षण दिया था। जहानाबाद का अरवल कांड काफी चर्चित हुआ था, जिसमें पुलिस ने 23 लोगों की नृशंस हत्या कर दी। यह अप्रैल, 1986 का साल था। अरवल में मजदूर किसान संग्राम समिति की शांतिपूर्ण सभा हो रही थी, जिस पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाई। पुलिस के इस नरसंहार ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा।  

विनयन संपूर्ण क्रांति से लेकर नक्सल आंदोलन और सुधारवाद से लेकर गांधीवाद तक का सफर तय करते रहे। गांधी की तरह लगातार प्रयोग करते रहे। किसी खास विचारधारा के कायल कभी नहीं रहे। प्रयोग के तौर सबको आजमाया जरूर। लेकिन किया वहीं, जो विवेक ने कहा। 

जब 1992 में देश में सांप्रदायिकता का उभार हो रहा था, मंदिर-मस्जिद का विवाद गहरा रहा था, तब विनयन ने पटना से अयोध्या तक पदयात्रा की। एक मार्च से लेकर 15 मार्च तक। इस पदयात्रा में सौ लोग शामिल हुए जिनमें छह महिलाएं, 20 आदिवासी एवं अधिकांश हरिजन, पिछड़े व कुछ ऊपरी जातियों के थे। यही नहीं, इसमें तीन ईसाई, एक मुस्लिम और बाकी हिंदू थे। इस तरह वह एक ओर सामंतों से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर सांप्रदायिकता से। इन लड़ाइयों के अलावा आगे जो खतरा देख रहे थे, वह था बहुराष्ट्रीय कंपनियों को। तब अपने एक इंटरव्यू में कहा था, 27-28 सालों तक हमने खेत मजदूरों की लड़ाई लड़ी जो भू-स्वामियों, सामंती सोच वालों अैर राजसत्ता के खिलाफ थी। मगर आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का खतरा सामने खड़ा है। इस खतरे के सामने तो खेत मजदूर क्या और किसान क्या? बड़े किसान भी इस खतरे से बच नहीं पाएंगे, तो छोटे किसानों की औकात क्या? 

विनयन का यह दूरदर्शितापूर्ण विचार क्या आज का हकीकत नहीं है? झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश तक.....क्या देश की खनिज संपदा को लीलने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आतुर नहीं हैं? आज विनयन नहीं हैं। उनके विचार जिंदा है। हर साल उनकी बरसी पर जहानाबाद जिले के नवादा आश्रम में उनके चाहने वाले एकत्रित होते हैं, उन्हें याद करते हैं। क्या आपको विनयन की याद नहीं?

Comments  

 
0 #2 Roma 2011-12-09 13:54
Sanjayji,
khushi hui yeh lekh padh kar. aise krantikario ko aaj yaad hi kaun karta hai. Dr. viniyan ke jiwan ke upar hi hum kai sathiyo ne lekh likhe hai aur uska prakashan bhi hua hai lekin unke jiwan ke baare mein aur bhi likhe jane ki zaroorat hai. unke dwara kaimur ki pahadiyo mein kiya gaya karya abhutpurva hai abhi bhi waha par adivasio dwara nirantar janwadi tarike se sangarsh zari hai. unke sangarsh ke saath hum jude hue hai aur Dr. viniyan dwara banaya gaya sangathan kaimur mukti morcha ke saath kaam kar rahe hai.
Roma, sonbhadra
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0 #1 Govind 2011-09-22 22:38
:-)
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