Last Update : 11 11 2017 09:04:35 AM

मनरेगा कर्मचारियों की मांगों की नहीं कोई सुनवाई

आजादी के सत्तर सालों में और 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के बावजूद सभी ग्राम पंचायतों को पंचायत सचिव उपलब्ध नहीं है, जिस कारण आम जनता को भी समस्याओं को झेलना पड़ता है...

मुश्ताक अली अन्सारी

उत्तर प्रदेश में पंचायती राज विभाग के अलग-अलग संचालित होने से आम जनता को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और मनरेगा कर्मचारियों के हितों से खिलवाड़ हो रहा है। पिछले दो वर्षो से पंचायती राज एवं ग्राम विकास विभाग एवं ग्राम विकास विभाग के कर्मचारी अधिकारी चौदहवें वित्त आयोग की व्यय व्यवस्था को लेकर अपनी अपनी मांगो के लेकर आन्दोलन कर चुके हैं। परन्तु भारत सरकार की तरह पंचायती राज एवं ग्राम विकास विभाग एकीकृत नहीं है, जबकि राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, मणिपुर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत विभिन्न राज्यों में पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभाग एकीकृत है।

वर्तमान समय में पंचायती राज विभाग उत्तर प्रदेश के द्वारा आउट सोर्सिंग के माध्यम से चौदहवें वित्त आयोग के धन के व्यय के लिए पंचायत स्तर पर पंचायत सहायक, लेखा सहायक, कम्प्यूटर आपरेटर, तकनीकी सहायक, अवंर अभियन्ता को संविदा पर नियुक्ति करने की प्रक्रिया जारी है। वर्ष 2006 में मनरेगा लागू होने के साथ पंचायत स्तर पर ग्राम रोजगार सेवक, तकनीकी सहायक, लेखा सहायक, कम्प्यूटर आपरेटर, तकनीकी सहायक (क्षेत्र पंचायत) अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी कार्यरत है।

वहीं ग्राम विकास अधिकारी को ग्राम पंचायतोें में सचिव का कार्यभार दिया गया इसके बावजूद एक ग्राम पंचायत अधिकारी/ग्राम विकास अधिकारी के पास 4 से 14 ग्राम पंचायतों का कार्यभार है। आजादी के सत्तर सालों में और 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के बावजूद सभी ग्राम पंचायतों को पंचायत सचिव उपलब्ध नहीं है, जिस कारण आम जनता को भी समस्याओं को झेलना पड़ता है।

पंचायती राज विभाग से वित्त आयोगों एवं स्वच्छता अभियान का संचालन किया जा रहा है। मनरेगा से प्रधानमंत्री आवास, स्वच्छ पेयजल, राजकीय आजीविका मिशन, संचालित है पंचायती राज विभाग का अपना प्रशासनिक ढाचा है, ग्राम विकास विभाग का अपना प्रशासनिक ढाचा है और मनरेगा योजना के लिए पंचायतों के तीनो स्तरों पर संविदा पर कर्मिक तैनात है जिन्हें केटेजन्सी मद आधारित मानदेय दिया जाता है। जो कन्टेन्जेसी कम बनने से समय पर नहीं मिलता है, जब मनरेगा कार्मिक पंचायत सचिव के सामान्य निर्देशन में मनरेगा समेत पंचायती राज एवं ग्राम विकास की योजनाओं का संचालन में ग्राम स्तरीय कार्मिक की भूमिका का निर्वाहन करते है। जब पहले से पंचायतों में प्रशासनिक एवं तकनीकी स्टाफ नियुक्ति है तो आउट सोर्सिंग के माध्यम से भर्ती किया जाना उचित नहीं है।

चतुर्थ राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पंचायती राज एवं ग्राम विकास का विलय किया जाये ताकि सभी योजनाओं को जनहित में संचालित किया जा सके। 

(मुश्ताक अली अन्सारी अखिल भारतीय मनरेगा संविदा कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक हैं।)

Posted On : 11 11 2017 08:58:45 AM

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