Apr 26, 2017

हलाला में इतना मजा क्यों आ रहा है मर्दो!

धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए.....

मनोरमा


तीन तलाक और हलाला का मसला इन दिनों सुर्खियों में है, खासतौर से हाल ही में इसके विरोध और मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के संदर्भ में दिए गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान के बाद से। 

मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में से एक रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ द्वारा ग्यारह मई को तलाक, हलाला और बहु-विवाह की संवैधानिक स्थिति पर सुनवाई होने वाली है, ऐसे में इन मसलों पर बहस और चर्चा का बाजार पूरे देश में गर्म है। बहुत संभावना है कि जल्द ही सरकार की ओर से  मुस्लिम पर्सनल लॉ में आवश्यक बदलाव लाकर तीन तलाक को खत्म कर दिया जाएगा। 

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। देश की पूरी राजनीति का इन दिनों इसके समर्थन और विरोध में ध्रुवीकरण हो चुका है। राजनीतिक दलों के अपने एजेंडे हैं और उनका कोई भी रुख मुस्लिम महिलाओं और समाज की बेहतरी से ज्यादा अपने वोटबैंक की चिंता में है। दूसरी ओर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐसे ही तमाम संगठन जहां अब भी मुस्लिम शरीआ कानूनों में दखलअंदाजी के खिलाफ हैं, वहीं मुसलमान महिलाओं का एक बड़ा तबका तीन तलाक और हलाला जैसे प्रावधानों को खत्म किए जाने के पक्ष में है।

बहरहाल, तीन तलाक और निकाह हलाला पर चल रही बहस ने एक खास मानसिकता के लोगों को धार्मिक आधार पर टिप्पणियां करने, मुस्लिम औरतों का उपहास और भौंडा मजाक करने का भी मौका दे दिया है, क्योंकि हलाला उनके लिए मजा लेने की चीज है। तीन तलाक मसले पर बहस के बाद से सोशल मीडिया पर हलाला को लेकर ऐसी ही उपहास करने वाली हलाला सेवा मुफ्त में देने के प्रस्तावों के साथ ढेरों टिप्पणियां पढ़ी जा सकती हैं। 

गौरतलब है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला से अगर उसका पूर्वपति फिर से शादी करना चाहता है तो उसे निकाह हलाला करना होता है, जिसके तहत महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से निकाह करना होता है,शारीरिक संबंध बनाना होता है और फिर उससे तलाक मिल जाने पर उसका पहला पति उससे दुबारा शादी कर सकता है। बहुत से मामलों में दूसरे पति के तलाक नहीं देने पर मामला बिगड़ भी जाता है इसलिए इसके तोड़ में 'हुल्ला' प्रथा का प्रचलन हुआ है, जिसके तहत मौलवी उसी पुरुष से विवाह करवाते हैं जो निश्चित तौर पर तलाक दे देता है। 

इन दिनों 'हुल्ला' के तहत विवाह करने वाले पुरुष इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं, सोशल मीडिया पर उनके पेज हैं और ये उनकी कमाई का भी जरिया है। दरअसल, निकाह हलाला का प्रावधान इसलिए बनाया गया था ताकि कोई भी पुरुष सोच—समझकर तलाक दे, गुस्से में नहीं, लेकिन ये कबीलाई और पुरुष बर्चस्ववादी मानसिकता के तहत ही था जिसमें औरत और उसका जिस्म पुरुष की संपत्ति और उसकी इज्जत होता है। 

हलाला के तहत किसी की पत्नी का अन्य पुरुष से विवाह और शारीरिक संबंध उनके लिए एक सजा के तौर पर ही था। जाहिर है आधुनिक समाज के मानकों पर इस तरह की प्रथाएं बहुत त्रासद हैं, इन्हें जितनी जल्दी हो सके खत्म किया जाना चाहिए।   

इस मामले में केन्द्र सरकार की काउंसिल माधवी दीवान ने स्पष्ट किया है कि बहुविवाह का किसी विशेष धार्मिक मान्यता से कोई लेना देना नहीं है, यह एक सामाजिक चलन रहा है और सदियों पहले से ग्रीक, रोमन, हिंदू, यहुदियों, पारसी सभी धार्मिक समुदाय में प्रचलित था। तीन तलाक और हलाला प्रथा भी अपने समय का सामाजिक चलन थी और उस समय के सुविधा के अनुसार विकसित व प्रचलित हुई थी। इसलिए संविधान की धारा 25 या धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत इनके संरक्षण का तर्क नहीं दिया जा सकता, ये दोनों अलग बातें हैं।
   
हालांकि कहा जाता है कि इस्लाम में औरतों को बराबरी का दर्जा हासिल है और शादी से लेकर तलाक तक उनके हकों की पूरी तरह से हिफाजत की गई है। मसलन, औरत की रजामंदी के बगैर निकाह नहीं हो सकता, उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए मेहर का प्रावधान है और तलाक के जवाब में औरतों के पास खुला का विकल्प है जिसके तहत वो काजी के पास जाकर तुरंत अपनी शादी से मुक्त हो सकती हैं, खुला में इद्दत जैसी अवधि का भी पालन नहीं करना पड़ता है। 

इसके अलावा तलाक के बाद भी औरतों को लगभग तीन महीने की अवधि बगैर किसी अन्य पुरुष के संपर्क में आए बिताना होता है ताकि इस अवधि में उसके गर्भवती होने का पता चला तो संतान को उसका हक मिल सके। लेकिन जमीनी सच कुछ और है और पुरुषों के अनुकूल है उन्हें ‘तलाक-उल-सुन्नत’ और ‘तलाक-ए-बिदात’ का हक हासिल है। पहले प्रावधान के तहत तलाक के बाद तीन महीने इद्दत की अवधि होती है जिसमें पति पत्नी 40 दिन तक साथ ही रहते हैं, सुलह नहीं होने पर फिर तलाक दिया जाता है और फिर 40 दिन साथ रहने की अवधि होती है इसके बाद भी सुलह नहीं होती तो अंतिम तलाक मुकर्रर हो जाता है। जबकि ‘तलाक-ए-बिदात’ के तहत एक मुस्लिम पति अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ शब्द बोलकर तलाक दे सकता है, ज्यादातर मामलों में पुरुषों द्वारा इसी का फायदा उठाया जाता है। 

शायद यही वजह है कि शाहबानो से लेकर अब शायराबानो ने इंसाफ के लिए अदालत के दरवाजे पर दस्तक दी है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास नहीं। तीन तलाक कैसे मुस्लिम महिलाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ है, इसे हाल के कुछ मामलों से समझा जा सकता है। इसी महीने आगरा में एक महिला को दो बेटियों को जन्म देने के कारण फोन पर तलाक मिल गया और एक ताजा मामले में राष्ट्रीय स्तर की नेटबॉल खिलाड़ी शुमेला जावेद को उसके पति ने फोन पर केवल इसलिए तीन बार 'तलाक' कह दिया क्योंकि उन्होंने एक बच्ची को जन्मक दिया है।

अमरोहा में अपने माता पिता के साथ रह रही शुमेला ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच करने और कार्यवाही करने का अनुरोध किया है। इसी तरह के एक और मामले में  गाजियाबाद की दो बहनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फोन पर तलाक मिलने के बाद मदद की गुहार की है, सउदी अरब में काम करने वाले उनके पतियों ने भी उन्हें फोन पर ही तलाक दे दिया था। शाहजहांपुर की एक लड़की को पहले फेसबुक पोस्ट पर तीन बार तलाक लिखकर तलाक दिया गया, फिर बाद में बाद में एसएमस के जरिए। 

तलाक का ये तरीका न सिर्फ देश के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि लैंगिक बराबरी के आधुनिक मूल्यों के भी। पूरे विश्व के 25 से ज्यादा इस्लामी देशों में तलाक शरीया कानूनों के तहत मान्य नहीं है, बल्कि इसके लिए अलग से कानून बनाया गया है। भारत में कानूनी बहस के दायरे में यह मुद्दा पिछले साल फरवरी में तब आया जब जब तीन तलाक की एक पीड़िता शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 1985 में शाहबानो मामले ने तीन तलाक के मसले को राष्ट्रीय बहस के दायरे में लाया था, जब बासठ साल की उम्र में पांच बच्चों की मां शाहबानो को उनके वकील पति ने 1978 में तलाक दे दिया था। तीन साल बाद शाहबानो ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया, सुप्रीम कोर्ट ने  अप्रैल 1985 में उनके पति को अपनी 69 वर्षीय पत्नी को प्रति माह 179 रुपये 20 पैसे गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। 

तत्कालीन सरकार ने अगर वोटबैंक की राजनीति से हटकर मुस्लिम समाज पर दूरगामी असर करने वाला दूरदर्शी फैसला लिया होता, तो आज ये नौबत ही नहीं आती। सामाजिक और राजनीतिक दोनों लिहाज से वो दौर आज से ज्यादा अनुकूल था ऐसे फैसलों के लिए, लेकिन मुस्लिम समुदाय के यथास्थितिवादियों को अदालत का फैसला मंजूर नहीं था और युवा व आधुनिक विचारों वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी डर गए। उन्होंने आरिफ मोहम्म्द खान जैसे नेताओं की अनदेखी कर कांग्रेस के बाकी हिंदू मुसलमान नेताओं के साथ मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड की बात मानना ज्यादा अनुकूल समझा और 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित करके सु्प्रीम कोर्ट के 23 अप्रैल, 1985 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत परित्यक्त या तलाकशुदा महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, यह मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में कोई विरोधाभास नहीं है। 

जाहिर है यह कितनी बड़ी भूल या गलती थी आज तीस साल बाद इसका मूल्यांकन बेहतर किया जा सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज देश भर की हजारों मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में सरकार पर दबाव बना रही हैं, इस प्रथा को खत्म करने की मांग पर मुखर होकर बोल रही हैं और देशभर में हस्ताक्षर अभियान चला रही हैं।

दरअसल, धार्मिक स्वतंत्रता की पैरोकारी के बावजूद आधुनिक समाज के लिए नियम कानून आधुनिक समय के तकाजों के अनुसार ही होने चाहिए। मसलन, धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सती प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को चलते रहने नहीं दिया जा सकता था और अंतरजातीय, अंतरधार्मिक व प्रेमविवाह को अमान्य नहीं किया जा सकता था, इसलिए आजादी से पहले और बाद में भी आवश्यक संशोधन करके हिन्दू विवाह अधिनियम में कुप्रथाओं को हटाकर आधुनिक मूल्यों को शामिल किया गया, जिसमें कानूनी तलाक का प्रावधान भी शामिल है।

शादी के तौर तरीके, रीति रिवाजों किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के तहत होना ठीक है, लेकिन तलाक लेने या देने के लिए एक ही जैसा कानून होना चाहिए। साथ ही धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए।

Apr 24, 2017

अनाथालय ने किया एचआईवी पीड़ित बच्ची को मेनहोल साफ करने को मजबूर

गैर सरकारी संगठन एजीएपीई संचालित कर रहा था एड्स पीड़ितों के इस अनाथालय को

सीवर से गन्दगी बाहर निकालती एचआईवी पॉजिटिव बच्ची
एचआईवी पॉजीटिव लोगों के साथ हमारा समाज किस हद तक निर्मम हो सकता है, इसका जीता—जागता उदाहरण मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दिखा। समाज में तो उनके साथ भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं देखने को मिलती ही हैं, उनके संरक्षण के लिए बनी जगहों पर भी उनके साथ कम दुर्व्यहार नहीं किया जाता। वीडियो में दिखा कि हैदराबाद के एक अनाथालय के सुपरवाइजर और वॉर्डन ने एचआईवी पॉजीटिव बच्ची को किस तरह सीवर साफ करने के लिए मजबूर किया।

हिन्दुस्तान टाइम्स के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक इस घटना के सोशल मीडिया पर छा जाने के बाद हैदराबाद पुलिस ने अनाथालय के सुपरवाइजर और वार्डन को गिरफ्तार किया। वीडियो में दिखा कि एक एचआईवी पीड़ित बच्ची मेनहोल साफ करने के बाद किस तरह गंदगी से भरे एक डिब्बे के साथ अपने हाथ बाहर निकाल रही है। उससे जल्दी से गंदगी साफ करने का निर्देश दिया जा रहा है, साथ ही मेनहोल के पास उसकी मदद के लिए चार—पांच अन्य बच्चियां भी दस्ताने पहने दिखाई दे रही हैं। इस घटना के बाद आरोपों—प्रत्यारोपों का दौर—दौरा शुरू हो चुका है। बाल अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक पार्टियां गैर सरकारी संगठन एम्बेसडर आॅफ गुडविल फॉर एड्स पेसेंट एवरीवेयल (एजीएपीई),जिसके संरक्षण में गायत्रीनगर के पास यह अनाथालय चल रहा था, पर कठोर कार्रवाई की मांग करने लगे हैं। 


हमारे देश में ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाएं तब दिखाई दे रही हैं, जबकि देश में पहले से हाथ से गंदगी साफ न करने को लेकर कई कानून पारित कर दिए गए हैं और मैनुअल स्केन्विंगिंग को प्रतिबंधित किया गया है, जिससे कि ऐसी घटनाएं न दिखाई—सुनाई दें और न ही इस तरह कोई किसी को गंदगी साफ करने के लिए मजबूर कर सके। 

आंध्र प्रदेश बाल अधिकार संघ ने इस घटना के खिलाफ नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के साथ मिलकर एक याचिका दायर की है, जिसमें एक एचआईवी पॉजिटिव लड़की को मैनहोल साफ करने के लिए मजबूर करने के लिए अनाथालय के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है।

चाइल्ड राइट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पी आचुता राव के मुताबिक अनाथालय में मौजूद 235 अनाथ बच्चों, जो कि सभी एचआईवी पॉजिटिव हैं, और छात्रावास के अधिकारियों ने बच्चों को मज़दूरी, सफाई कार्यों के अलावा घर के अन्य काम करने के लिए मजबूर किया हुआ था।

Apr 22, 2017

15 पदक जीतने वाले राजबली की बैंक की धोखाधड़ी के चलते मौत

दलित खिलाड़ी राजबली का जमा किया अपना ही पैसा नहीं दिया बैंक ने, करनी थी उनको बेटी की शादी, डीएम के हस्तक्षेप का भी नहीं पड़ा था बैंक पर असर, मरने के बाद दे गया बैंक 60 हजार रुपए

राजबली के इन सम्मान पदकों को रखने के लिए एक बक्सा तक उपलब्ध नहीं करा पायी सरकार

खेलों में 15 पदक जीतकर देश का मान बढ़ाने वाले ओलम्पियन राजबली का दिल का दौरा पड़ने से 9 अप्रैल को निधन हो गया। निधन का कारण था अपने खून—पसीने की कमाई को बैंक से न निकाल पाना, जो बेटी की शादी के लिए बैंक में जमा करके रखे हुए थे।

दस स्वर्ण, पांच रजत और एक कांस्य पदक जीतकर पैरा ओलंपियन खेलों में देश का नाम रोशन करने वाले दलित राजबली के इस तरह निधन से सरकार की खिलाड़ियों के प्रति असंवेदनशीलता और बेरुखी भी साफ झलकती है। 

बेटियों के भविष्य के लिए उन्होंने किसी तरह अपना पेट काटकर सहकारी बैंक में 60 हजार रुपए जमा किए हुए थे। एक बेटी की शादी तय की हुई थी, उसी के लिए सहकारी बैंक में पैसा निकालने गए। मगर ऐन शादी के मौके पर जब सहकारी बैंक पैसे निकालने में रोड़े अटकाने लगा और वे अपना पैसा निकालने में कामयाब नहीं हो पाए तो उनकी तबीयत बिगड़ गयी और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गयी। मौत के बाद सहकारी बैंक अपना पल्ला झाड़ने के लिए जरूर उनके घर आकर पैसा दे गया।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के रुद्रपुर स्थित पिपरा कछार के मूल निवासी राजबली लंबे समय से बदहाली और गुमनामी की जिंदगी बसर करते हुए किसी तरह अपना जीवन—यापन कर रहे थे। कानपुर की एक मिल में नौकरी करते थे, मगर मिल की नौकरी भी चली गयी तो गांव में ही आकर बस गए। दलित राजबली की अपनी कोई संतान नहीं थी, दो लावारिश लड़कियों को गोद लेकर पाल रहे थे। उन्हीं बेटियों और पत्नी के साथ वह मेहनत—मजदूरी करके मुफलिसी में किसी तरह जीवन जी रहे थे। गांव में उनके पास मात्र 5 कट्ठा जमीन थी, जिससे सालभर खाने के अन्न तक पैदा नहीं हो पाता था।

पैरा ओलंपिक में इतने सारे गोल्ड जीतने वाले एक दलित खिलाड़ी का बदहाल जीवन और सरकारी तंत्र की बेरुखी से हुई मौत को देख साफ हो जाता है कि हमारा तंत्र देश का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ियों को अच्छा जीवन स्तर और रोजगार देना तो दूर, गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन स्तर जीने को मजबूर कर देता है। 

दोनों पैरों से विकलांग राजबली ने 1981 में जापान में आयोजित पैरा ओलंपियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। यहां उन्होंने तैराकी और गोला श्रेपण प्रतियोगिता में दो स्वर्ण जीते। सम्मान स्वरूप पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित किया था। 

सरकार की खिलाड़ियों के प्रति बेरुखी इस बात से भी झलकती है कि पैरा ओलम्पियन गेम्स में कभी स्टार रहे राजबली को वह उसके सम्मान पदकों को रखने के लिए एक बक्सा तक उपलब्ध नहीं करा पायी। उन्होंने प्लास्टिक के झोले में समेटकर देश का मान बढ़ाने वाले पदक सुरक्षित रखे हुए। समय—समय पर मात्र कोरे सम्मान के लिए उनका नाम याद किया जाता रहता था, मगर उनका जीवन स्तर गरीबी रेखा से कभी भी ऊपर नहीं उठ पाया।

Apr 21, 2017

प्रशांत भूषण लडेंगे तमिलनाडू के किसानों का मुकदमा

प्रधानमंत्री आवास के सामने नंगा प्रदर्शन कर चुके तमिलनाडू के सूखाग्रस्त किसानों का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण लडेंगे। ​दिल्ली के जंतर—मंतर पर 38 दिनों से धरना दे रहे किसानों से मुलाकात के बाद उन्होंने यह फैसला किया। 

 
स्वराज अभियान के अध्यक्ष प्रशांत भूषण पहले से देश के सूखाग्रस्त किसानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल किए हुए हैं। उनकी याचिका पर सर्वोच्च अदालत में लगातार सुनवाई चल रही है। अदालत कई दफा राज्यों को नोटिस कर चुकी है। किसानों को लेकर अदालत का रूख सकारात्मक है।

प्रशांत भूषण किसानों को यह मुकदमा बिना फीस लिए लड़ेंगे जैसा कि वह जनहित के कई मसलों पर करते आए हैं। 

तमिलनाडू के किसान सदी के सबसे भयंकर सूखे के दौर से गुजर रहे हैं। सूखे की मार और कर्ज़ के बोझ के तले दबे करीब 100 किसान जंतर—मंतर पर 38 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मरे हुए किसानों और उनके परिजनों की खोपड़ियां लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

पर किसानों की मांग पर मोदी सरकार कोई कान नहीं दे रही है। किसानों के मसले पर बहरापन का नाटक कर रही सरकार को सुनाने के लिए इन किसानों जमीन पर खाना खाया और प्रधानमंत्री आवास के सामने नंगा होकर भी प्रदर्शन किया पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई है।

किसानों के मुताबिक उनपर 50 हज़ार से पांच लाख तक का कर्ज़ है. उनका कहना है, 'दिखावे के लिए सरकार ने छोटे किसानों की मदद की लेकिन ज़्यादातर किसानों को कोई मदद नहीं मिली. हमारी मांग है कर्ज़ माफ़ हों और नए कर्ज़ दिए जाएं कि वो किसानी कर सकें।'

प्रशांत भूषण के अनुसार, 'सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद सरकार की इतनी हिम्मत नहीं कि वह करोड़पति कर्जदारों का नाम सार्वजनिक कर सके पर किसान नंगा होकर सरकार के दरवाजे पर प्रदर्शन करते हैं, प्रधानमंत्री उनका कोई जिक्र तक नहीं करते हैं।'

वह आगे कहते हैं, 'मैं तमिलनाडू के किसानों के मसले पर 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर ​कर चुका हूं। जहां देश में सभी सरकारें किसानों से आंख चुरा रहीं हैं, वहीं स्वराज इंडिया किसानों की हर लड़ाई में साथ है।' 

राष्ट्रवादी बनने के बीस असरदार तरीक़े

देश में जबसे राष्ट्रवाद की लहर आई है तबसे बहुतेरे मौकापरस्त नेता, अभिनेता, व्यापारी, शिक्षक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता स्वत:स्फूर्त तरीके से राष्ट्रवादी बनने की जुगत में जुट गए हैं। ऐसे में उनसे बहुत सी गलतियां हो जा रही हैं। उन्हें असली राष्ट्रवादी पकड़ कर नकली—नकली बोल बेइज्जत कर दे रहे हैं। 

इससे बचने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने 'राष्ट्रवादी बनने के बीस असरदार तरीके' खोज निकाले हैं। जनज्वार राष्ट्रवादी हित में इन नुस्खों को साझा कर रहा है। 


1-जोर जोर से नरेंद्र मोदी ज़िंदाबाद बोलें। बीच बीच में योगी ज़िंदाबाद और गांधी मुर्दाबाद बोलते रहें।

2-जो आपसे तर्क करे उसे कांग्रेसी और कम्युनिस्ट कहें।

3-सार्वजनिक रूप से टीका चंदन करें और ग्रुप में गांजा जलाकर पढ़े लिखों के साथ गांधी-नेहरू-अम्बेडकर का मजाक उड़ाते हुए धुआँ छोड़ें। आख़िर ये सब विदेशी जो थे।

4-कोई अगर कहे की "हमें अपने संविधान से प्रेम है" तो उसे सिक्युलर कहें ।

5-एसी में बैठकर बीसलेरी  पीते हुए अपने लिए ठेके और प्रोजेक्ट जुगाड़ें और वर्तमान सरकार की प्रशस्ति करते रहें।

6-हर समस्या के लिए आरक्षण को दोष दें....महंगे होटल के कमरे में बैठकर ब्राह्मण विमर्श करें...जाति आधारित आरक्षण समर्थकों को देशद्रोही करार दें।

7-योग,ध्यान, प्राणायाम के गुण गाएं लेकिन सुबह 9 बजे से पहले न उठें...रात को भारत की दारू पीकर ट्रम्प ज़िंदाबाद का नारा लगाएं और सुबह किसी यूनिवर्सिटी में वबाल का प्लान बनाएं। 

8-मालदा पर खूब चिल्लाएं और पहलू खान पर मनोज तिवारी का पवित्र संगीत सुनें.. बीच बीच में गोडसे को मानवतावादी बताकर नेहरू के शांति अभियान को मनुष्यता के लिए घातक बताएं।

9-भारत के क्रिकेट जीतने पर हल्ला मचायें और फिर स्वदेशी स्वदेशी चिल्लाएं।

10-सड़क पर पान थूककर स्वच्छ भारत अभियान को सफल बताएं और साथ में ये भी जोड़ें कि फैली हुई गंदगी और स्वच्छता  समस्या के जिम्मेदार नेहरू हैं ।

11-वर्तमान सरकार की रोज़ वंदना करें और बताएं कि सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ।

12-गोडसे को महात्मा माने और गांधी को दुष्ट आत्मा और हिटलर-मुसोलिनी को पुण्यात्मा जरूर मानें।

13-अभिव्यक्ति के अधिकार पर दिन रात चिंता व्यक्त करें..सेमीनार में व्याख्यान देते हुए सरकार को उदारवादी कहें और कहीं कोई सरकार के ख़िलाफ़ बात करे तो पत्थर फेंके, डंडे चलाएं।

14-गौ सेवा का दावा करें भले घर मे गाय पालने की हिम्मत न हो।

15- यत्र नार्यस्तु पूज्यंते का पाठ करें और जो स्त्री पब्लिक स्पेस में आपके ख़िलाफ़ बोले उसे मां बहन की गाली देते हुए बलात्कार की धमकी दें।

16-गीता,रामायण,महाभारत वेद कभी न पढ़ें...लेकिन इनसे फ़र्ज़ी श्लोक चेंप कर अपनी बात सही साबित करने की कोशिश करें। बक़रीद पर अहिंसक हो जाएं और हिन्दू बलि परम्परा पर आंख मूंद लें।

17-सुबह उठकर फेसबुक पर सरकार की जी भर के आरती करें और जो आपसे सहमत न हो उसे तुरन्त माँ बहन की गाली से अभिषेक करें।

18-किसी सामाजिक काम में हिस्सा न लें लेकिन दिन रात खुद को राष्ट्रभक्त साबित करें।

19-विचार करें या न करें कुछ पढ़ें या न पढ़ें लेकिन हर जगह खुद को सर्व ज्ञाता  पढ़ा लिखा और  सबसे सुलझा और समझदार साबित करते रहें...इसके लिए व्हतसेप से प्राप्त फ़र्ज़ी ज्ञान यहां वहां चेंपते रहें।

20- देश की बात करते रहें, विदेशी माल चरते रहें।

चुनाव सड़क, सफाई, स्वास्थ्य का पर मुद्दा आतंकवाद, राष्ट्रवाद, हिंदू—मुसलमान

 सोचने पर मजबूर कर देंगे दिल्ली एमसीडी चुनाव के मुद्दे 

जनज्वार। परंपरागत रूप से स्थानीय निकाय के चुनावों में नाली, पानी, सड़क, सफाई, स्वास्थ्य और सहुलियतें मुद्दा हुआ करती हैं। लोग पार्षदों को इस आधार पर वोट करते हैं कि उनको मच्छर, बदबू, प्रदूषण, अतिक्रमण, बीमारी, अशिक्षा और खराब सीवर सिस्टम से कौन पार्टी बचाएगी। 



पर अबकी दिल्ली एमसीडी चुनाव में ऐसा नहीं है।  

दिल्ली एमसीडी 'म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन आॅफ दिल्ली' चुनाव में तीन तलाक, हलाला, कश्मीर में आतंकवाद, वहां के प्रदर्शकारियों से सेना का बर्ताव, योगी का रोमियो स्क्वायड, गोहत्या पर गोरक्षकों की पहल, राष्ट्रवाद और देशद्रोह की बहस आदि मुद्दा बना हुआ है। 

जागरूक वोटरों का एक तबका सीरिया में बच्चों की हत्या, अमेरिका द्वारा अफ​गानिस्तान में  गिराया  गया 10 हजार किलो का बम और पाकिस्तान में कुलभूषण जाधव को दी गयी फांसी के फरमान पर भी बहस कर तय कर रहा है कि दिल्ली एमसीडी चुनावों में किस पार्टी को वोट दिया जाए।  

यही वजह है कि कोई पार्षद जनता के बुनियादी मुद्दों सड़क, पानी, सफाई, स्वास्थ्य आदि पर ज्यादा फोकस कर बात नहीं कर रहा है। अलबत्ता जो पार्टी और पार्षद जनता की बुनियादी जरूरतों पर ज्यादा केंद्रीत कर वोट मांग रहे हैं उनकी जनता के बीच कोई चर्चा नहीं है या है भी तो इस रूप में कि 'उनकी बात ठीक है पर वह टक्कर में नहीं हैं।' 

उदाहरण के तौर पर योगेंद्र यादव के नेतृत्व वाली 'स्वराज पार्टी' को लिया जा सकता है। स्वराज पार्टी अपने 211 पार्षद प्रतिनिधियों के माध्यम से लगातार जनता के ​बुनियादी मुद्दों पर फोकस किए हुए है। आप या कांग्रेस की तरह वह स्थानीय मुद्दों से जरा भी इधर—उधर नहीं हो रही। स्वराज पहली ऐसी पार्टी है जिसने पर्यावरण को दिल्ली की मूल सवालों में शामिल किया है। 

पर 'साफ दिल और साफ दिल्ली' के नारे साथ एमसीडी चुनाव में उतरी स्वराज पार्टी के बारे में पत्रकारों की आम राय है कि मुश्किल से इस पार्टी का खाता खुल पाएगा और ज्यादातर जगहों पर प्रतिनिधियों की जमानत जब्त होगी। सर्वे एजेंसियों का भी यही आकलन है। 

सवाल है कि दिल्ली जैसे प्रोफेशनल शहर का यह हृदय परिवर्तन हुआ कैसे? क्यों वोटरों को जीवन की बुनियादी सुविधाओं की सरकारों से मांग और उनका पूरा कराने का अधिकार रोमांचित—आंदोलित नहीं करता, क्यों उन्हें आंदोलन का सारा आनंद राष्ट्रवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुस्लिम विभाजन पर आने लगा है ?   

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ​पीयुष पंत की राय में, 'भाजपा के राष्ट्रवादी शोर—सराबे ने पिछले कुछ चुनावों से लोगों का माइंडसेट चेंज कर दिया है। एक के बाद एक भाजपा की जीत लोगों की इस समझ को मजबूत कर रही है कि बेकारी, गरीबी, अशिक्षा, महंगाई हमारी किस्मत है और मुद्दे जिनसे उन्हें निपटना है वह देशद्रोह, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुसलमान हैं।' 

चार एमसीडी चुनाव कवर कर चुके वरिष्ठ पत्रकार अनिरूद्ध शर्मा कहते हैं, 'भाजपा उत्तर प्रदेश में जिस राह जीती है वह उसी को यहां भी आजमा रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव राज्य के सवालों—समस्याओं से ज्यादा आतंकवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद, हिंदू—मुस्लिम और केंद्र की उपलब्धियों पर केंद्रीत रहा। एमसीडी चुनावों में कौन पार्टी बहुमत पाएगी इस पर कुछ कहने की बजाए मैं यह कहना चाहुंगा कि 'पब्लिक परसेप्शन' में भाजपा जीती हुई दिख रही है।' 

Apr 20, 2017

पूर्व मंत्री का नाम नकली और डिग्री फर्जी

देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य घोटाले 'एनएचआरएम' के आरोपी और बसपा सरकार में हनक वाले मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा, बाबू सिंह कुशवाहा नहीं हैं.

जनज्वार। बाबू सिंह कुशवाहा ने अपना असली नाम छुपाकर स्नातक की डिग्री फर्जी तरीके से ले ली है. स्नातक में दाखिले के लिए उन्होंने 12 वीं तक भी नहीं किया. बिना बारहवीं किये ही फर्जी मार्कशीट बनाते हुए उन्होंने स्नातक में दाखिला और फर्जी डिग्री ली. इसके बाद वह एमएलसी बन गये. इस धोखाधड़ी के चलते विजिलेंस झाँसी ने झाँसी के नवाबाद थाना में बाबू सिंह कुशवाहा उर्फ़ चरण सिंह कुशवाहा के खिलाफ 419, 420, 467, 468 व 471 आईपीसी धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया है.


बाबू सिंह कुशवाहा नई मुश्किल में फंस गये हैं. विजिलेंस ने जांच में पाया है कि बाबू सिंह कुशवाहा का असली नाम ही बाबू सिंह कुशवाहा नहीं है. उनके माँ-बाप ने उनका नाम चरण सिंह कुशवाहा रखा था. ये नाम प्राथमिक शिक्षा तक चलता रहा, लेकिन 12 वीं में नाम बदल गया.

बाबू सिंह कुशवाहा ने 12वीं किये बिना ही 12 वीं की फर्जी मार्कशीट बनवा ली. फर्जी मार्कशीट में उन्होंने अपना नाम चरण सिंह न लिखवाकर बाबू सिंह कुशवाहा कर लिया, ताकि पहचान न हो सके. इसके बाद उन्होंने झाँसी के बुंदेलखंड महाविद्यालय में इस फर्जी मार्कशीट के आधार पर स्नातक में दाखिला लिया. बीए ग्रेजुएशन में उन्होंने फर्स्ट व सेकंड ईयर में सब्जेक्ट भी अलग अलग रखे. उन्होंने फर्जी तरीके से ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के एमएलसी चुनाव लड़ा और एम्एलसी बन गये.

गौरतलब है कि बाबू सिंह कुशवाहा घोटाले में फंसने के बाद उनके बुरे दिन शुरू हुए. करीब चार साल बाद जेल में रहने के बाद वह 2016 में जेल से जमानत पर रिहा हुए. कुछ दिनों पहले ही बेटी की शादी में शामिल होने के लिए उनकी जमानत की मांग को खारिज कर दिया गया था.

बाबू सिंह कुशवाहा 15 मार्च से डासना जेल में बंद हैं. बताया जा रहा है कि उनकी बेटी की शादी लखनऊ में 29 अप्रैल को होनी है, लेकिन उन्हें अब तक जमानत नहीं मिली है. उन्होंने 6 मई तक की जमानत मांगी है.

महिला अधिकारी के बेडरूम में घुसा बीजेपी वर्कर, योगी के मंत्री बोले अतिउत्साह में था कार्यकर्ता

समाजवादी सरकार में जब बलात्कार की घटना होती थी, तो मुखिया मुलायम सिंह यादव कह दिया करते थे कि बच्चों से ऐसी गलती हो जाया ​करती है। योगी युग में भी बदजुबानी के बोल बदले नहीं हैं, अब उनके मंत्री कहते हैं कि कार्यकर्ताओं से एक्साइटमेंट में गलतियां हो जाया करती हैं....

मंत्री से शिकायत करतीं  बीडीओ
उत्तर प्रदेश के महोबा स्थित जैतपुर ब्लॉक की बीडीओ ने बीजेपी नेता पर बेडरूम में घुसकर बदसलूकी करने का आरोप लगाया है। बीडीओ महिमा विद्यार्थी ने बीजेपी के सेक्टर प्रभारी असमेन्द्र द्विवेदी द्वारा की गयी इस बदसलूकी की शिकायत राज्यमंत्री डॉ. महेंद्र सिंह से की, तो उन्होंने इसे अति उत्साह में आकर की गयी घटना बताकर टालने की कोशिश की।  

जैतपुर में तैनात बीडीओ महिमा विद्यार्थी ने 19 अप्रैल को आरोप लगाया कि जब व​ह आॅफिस के बाद अपने सरकारी आवास पर थीं, तो बीजेपी के सेक्टर प्रभारी असमेन्द्र द्विवेदी जबरन उनके बैडरूम में घुस आए और उनके साथ बदसलूकी करने लगे। महिमा विद्यार्थी के मुताबिक इससे पहले भी बीजेपी नेता मेरे आवास पर आकर मेरे साथ बदसलूकी कर चुका है। मैंने उनसे कई बार ऑफिस में ही मिलने की बात कही, लेकिन वो जबरदस्ती घर में आ जाते हैं और काम करवाने के नाम पर अभद्रता करते हैं।"

महिमा के मुताबिक उन्होंने इस बदसलूकी की शिकायत कुलपहाड़ कोतवाली में की, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई तो दूर, उनकी शिकायत दर्ज तक नहीं की। पुलिस ने मामला शांत करने की कोशिश की, लेकिन आरोपी के खिलाफ एक्शन नहीं लिया।

जब महिमा विद्यार्थी की शिकायत पुलिस ने दर्ज नहीं की तो 19 अप्रैल को वह जैतपुर ब्लॉक में आए राज्यमंत्री डॉ महेंद्र सिंह से मिलने पहुंचीं। उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ता की शिकायत भी की, लेकिन मंत्री के जवाब ने उन्हें और परेशान कर दिया। मंत्री जी ने कहा- बीजेपी कार्यकर्ता कोई अमर्यादित कार्य नहीं करते। कुछ कार्यकर्ता अति उत्साहित होकर ऐसा कर देते हैं।