May 17, 2017

स्वतंत्रता सेनानी की जमीन पर कलक्टर ने कराया कब्ज़ा

जिस स्थल पर बजाज इलेक्ट्रिकल जबरन टावर लगाना चाह रही है, वह भूमि मेरे दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी रामखेलावन शास्त्री  की है और उस स्थल पर उनकी अंतिम इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए एक शोध संस्थान प्रस्तावित है.....

जनज्वार, पटना। चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में बापू गांधी के साथ वर्धा प्रवास करने वाले प्रसिद्ध गाँधीवादी एवं स्वतंत्रता सेनानी रामखेलावन शास्त्री की मंझौल स्थित विरासत पर बेगूसराय के जिलाधिकारी ने जबरन कब्जा जमा लिया है। 

दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की विरासत पर जबरन लगा टावर
7 मई को 100 से ज्यादा पुलिस बल की ताकत से उन्होंने इस कार्रवाई को अंजाम दिया और स्वतंत्रता सेनानी के उत्तराधिकारियों के विरोध के बावजूद वहां पर जबरन 1 लाख 32 हजार का ट्रांसमीशन टावर खड़ा करवाया।

दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी के पौत्र पुष्पराज के मुताबिक जिस स्थल पर जिलाधिकारी ने बंदूक की ताकत से जबरन कब्ज़ा किया, वह बापू गांधी के सहकर्मी रहे जनपद के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी की भूमि थी और उनकी विरासत को कायम रखने के लिए उस स्थल पर "रामखेलावन शास्त्री स्मृति गरीबी एवं समाज अध्ययन शोध संस्थान" प्रस्तावित था। पुष्पराज चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक हैं और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहते हैं।

इस मामले में जिला प्रशासन को 21 मार्च 2017 को उन्होंने लिखित आवेदन देकर सूचित किया था कि जिस स्थल पर बजाज इलेक्ट्रिकल जबरन टावर लगाना चाह रही है, वह भूमि मेरे दिवंगत दादा स्वतंत्रता सेनानी की है और उस स्थल पर उनकी अंतिम इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए एक शोध संस्थान प्रस्तावित है।

वहीं ट्रांसमीशन टावर के निर्माण में लगी बजाज इलेक्ट्रिकल के विरूद्ध शिकायतों की लंबी फेहरिस्त है। इसी मार्च और अप्रैल माह में बजाज इलेक्ट्रिकल के द्वारा किसानों की जमीन पर जबरन अतिक्रमण के मामले में जिला लोक शिकायत प्राधिकरण ने कंपनी से जुर्माना कर कुछ किसानों को 1 लाख 20 हजार का मुआवजा दिलवाया था। 

पुष्पराज कहते हैं, जिला प्रशासन ने सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में गांधी के एक सहकर्मी स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के साथ जिस तरह अपराधियों की तरह के बर्ताव किया है, यह अकल्पनीय था। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री ने रामखेलावन शास्त्री की मृत्यु से पूर्व स्वतः संज्ञान लेते हुए राजकीय सम्मान के साथ उनकी चिकित्सा का निर्देश स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों को दिया था औऱ 2008 के मार्च माह में स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी पटना से मंझौल पहुँचे थे। 

रामखेलावन शास्त्री बापू-गाँधी के साथ वर्धा प्रवास करने वाले बिहार के अंतिम स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने नैतिकता के आधार पर स्वतंत्रता सेनानी पेंशन को अस्वीकार किया था। वर्धा प्रवास से लौटकर उन्होंने तत्कालीन मुंगेर जिला में "टीक जनेऊ आंदोलन" का सूत्रपात किया था और हजारों लोगों ने उस आंदोलन के प्रभाव में अपने टीक -जनेऊ हटाए थे। उन्हें कुछ वर्षों तक धार्मिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा था। 

मंझौल में दलितों को शिक्षित करने, स्त्रियों को शिक्षित करने और मुसहर समाज को जमीदारों के कोप से बचाने की उनकी ऐतिहासिक भूमिका अविस्मरणीय है। मंझौल के सभी शिक्षण संस्थानों की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके समाज सुधार आंदोलन से खफा जमींदारों ने उन्हें "टीककट्टा मुसलमन्ना" घोषित किया था।आजादी से पूर्व अस्पृश्यता निवारण के राष्ट्रीय कांग्रेस के अभियान के तहत शास्त्री जी को हरिजन सेवक संघ और मुसहर सेवक संघ की जिम्मेवारी दी गयी थी।

गौरतलब है कि जिलाधिकारी बेगूसराय को 21 मार्च 2017 को दिए गए आवेदन की प्रति की एक प्रतिलिपि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी दी गई थी, मगर मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया गया।

अभियुक्त शिवराज को होना था लेकिन फंस रहे दिग्विजय सिंह

एमपी अजब है, एमपी गजब है। घोटाला और कोई करता है और फंसता कोई और नजर आता है। मध्य प्रदेश के भाजपाई पिछले ​कुछ दिनों से ऐसे पेश आ रहे हैं मानो व्यापमं घोटाला भाजपा सरकार में नहीं कांग्रेस सरकार में हुआ है और उसके जिम्मेदार 'बेचारे' दिग्विजय सिंह हैं...
जावेद अनीस

मई का महीना मुख्यमंत्री शिवराज के लिए राहत भरी खबर लाया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चौहान के सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप लगाते आ रहे हैं, लेकिन इस मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि सबूत के तौर पर जिस सीडी और पेन ड्राइव को पेश किया गया था वे फर्जी पाए गये हैं। 


सीबीआई का कहना है कि इसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा  छेड़छाड़ की गयी है, जिसके बाद भाजपा इसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को क्लीनचिट दिए जाने के तौर पर पेश कर रही है। सीबीआई के हलफनामे के बाद सूबे में सियासत गर्माई हुई है और व्यापम घोटाले ने एक बार फिर नया मोड़ लेता जा रहा है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि क्लीनचिट देने का काम अदालत का है सीबीआई का नहीं।


सूत्रों के मुताबिक व्यापमं घोटाले को लेकर सीबीआई की जांच का ट्रेक बदल सकता है, इससे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह की मुश्किल में पड़ सकते हैं क्योंकि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है वह इस मामले में दिग्विजय सिंह और दूसरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है. 

व्यापमं घोटाले में भाजपा पहली बार इतनी आक्रमक नजर आ रही है। मप्र सरकार के तीन वरिष्ठ  मंत्रियों द्वारा बाकायदा सीबीआई को ज्ञापन सौंपकर दिग्विजिय सिंह और दो व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गयी है। कांग्रेस की तरफ से इस मुद्दे पर  पलटवार भी किया गया है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा है कि व्यापम के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कभी क्लीन नहीं हो सकते, क्योंकि इस दौरान वही मुख्यमंत्री रहे हैं। जब इस दौरान की सभी उपलब्धियां उनके खाते में हैं, तो व्यापम घोटाले की कालिख से वे कैसे बच सकते हैं? 

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खुद विधानसभा में 1000 प्रकरणों में गड़बड़ी होना स्वीकार चुके हैं, जिसमें 2500 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तार किया गया, वहीं चार सौ से ज्यादा अब भी फरार हैं। इस  मामले से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है,आज भी सैकडों लोग जेल में नही हैं। अजय सिंह ने मांग की है कि  अगर सीबीआई वाकई में सच्चाई सामने लाना चाहती है तो उसे मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी और जेल से छूटे पूर्व मंत्रियों का नार्को टेस्ट कराना चाहिए। ज्योतिरादत्यि सिंधिया ने भी उनका बचाव करते हुए कहा है कि, व्यापमं एक बहुत बड़ा घोटाला है सीबीआई ने अपने हलफनामे में शिवराज सिंह को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है।

इससे पूर्व इस साल मार्च के आखिरी दिनों में विधानसभा में कैग की रिपोर्ट सामने आयी थी जिसमें व्यापमं को लेकर शिवराज सिंह की सरकार पर कई गंभीर सवाल उठाये गये थे। इस रिपोर्ट में 2004 से 2014 के बीच के दस सालों की व्यापमं की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बताया गया था कि कैसे इसकी पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी थी और बहुत ही सुनियोजित तरीके से नियमों को ताक पर रख दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं का काम केवल प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराना था, लेकिन वर्ष 2004 के बाद वो भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने लगा, इसके लिये व्यापमं के पास ना तो कोई विशेषज्ञता थी और ना ही इसके लिए म.प्र. लोकसेवा आयोग या किसी अन्य एजेंसी से परामर्श लिया गया। यहाँ तक कि इसकी जानकारी तकनीकी शिक्षा विभाग को भी नहीं दी गई और इस तरह से राज्य कर्मचारी चयन आयोग की अनदेखी करके राज्य सरकार ने व्यापमं को सभी सरकारी नियुक्तियों का काम दे दिया और राज्य सेवा में से इसमें शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गयी। 

रिपोर्ट के अनुसार व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद भी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में परीक्षा लेने के लिए कोई नियामक ढांचा नहीं था। रिपोर्ट में जो सबसे खतरनाक बात बतायी गयी है वो यह है कि प्रदेश सरकार ने कैग को व्यापमं से सम्बंधित दस्तावेजों की जांच की मंजूरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि व्यापमं सरकारी संस्था नहीं है, जबकि व्यापमं पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में काम करने वाली संस्था थी।

‘कैग’ की रिपोर्ट ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया था विपक्ष के नेता अजय सिंह ने शिवराज सिंह का इस्तीफ़ा मांगते हुए कहा था कि, अब यह सवाल नहीं है कि मुख्यमंत्री व्यापमं घोटाले में दोषी हैं या नहीं, लेकिन यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह घोटाला उनके 13 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ है, उनके एक मंत्री सहित भाजपा के पदाधिकारी जेल जा चुके हैं और उनके बड़े नेताओं से लेकर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सब जाँच के घेरे में हैं। इसलिए अब उन्हें मुख्यमंत्री चौहान के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। 

दूसरी तरफ  भाजपा ने उलटे 'कैग' जैसी संवैधानिक संस्था पर निशाना साधा था और कैग द्वारा मीडिया को जानकारी दिए जाने को ‘सनसनी फैलाने वाला कदम बताते हुए उस पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का आरोप लगाया था। 

व्यापमं घोटाले ने मध्य प्रदेश को देश ही नहीं, पूरी दुनिया में बदनाम किया है। यह भारत के सबसे बड़े और अमानवीय घोटालों में से एक है, जिसने सूबे के लाखों युवाओं के अरमानों और कैरियर के साथ खिलवाड़ करने का काम किया है। इस घोटाले की चपेट में आये ज्यादातर युवा गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिससे उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में स्थायित्व ला सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

बहुत ही सुनियोजित तरिके से चलाये गये इस गोरखधंधे में मंत्री से लेकर आला अफसर तक शामिल पाए गये। इसके छीटें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक भी गए। व्यापमं घोटाले की परतें खुलने के बाद इस घोटाले से जुड़े लोगों की असामयिक मौतों का सिलसिला सा चल पड़ा। लेकिन इन सबका शिवराज सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। शुरुआत में तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस घोटाले की जांच एसआईटी से ही कराने पर अड़े रहे, लेकिन एक के बाद एक मौतों और राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय मीडिया ने जब इस मुद्दे की परतें खोलनी शुरू की तो उन्हें सीबीआई जाँच की अनुशंसा के लिए मजबूर होना पड़ा।

मामला सीबीआई के हाथों में जाने के बाद व्यापमं का मुद्दा शांत पड़ने लगा था, मीडिया द्वारा भी इसकी रिपोर्टिंग लगभग छोड़ दी गयी। उधर एक के बाद एक चुनाव/ उपचुनाव जीतकर शिवराज सिंह चौहान अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे थे। मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा यह दावा किया जाने लगा था कि व्यापमं घोटाले का शिवराज की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ है। कुल मिलकर मामला लगभग ठंडा पड़ चुका था, विपक्ष थक चुका था और सरकार से लेकर संगठन तक सभी राहत मना रहे थे।

इसे केवल एक घोटाले के रूप में नहीं, बल्कि राज्य समर्थित नकल उद्योग के रूप में देखा जात है, जिसने हजारों नौजवानों का कैरियर खराब कर दिया। व्यापमं घोटाले का खुलासा 2013 में तब हुआ, जब पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे। बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसके अंतर्गत फर्जीवाड़ा करके सरकारी नौकरियों रेवड़ियों की तरह बांटी गयीं हैं। 

मामला उजागर होने के बाद व्यापमं मामले से जुड़े 50 से ज्यादा अभियुक्तों और गवाहों की रहस्यमय ढंग से मौत हो चुकी है जो इसकी भयावहता को दर्शाता है। इस मामले में 21 सौ से ज्यादा को गिरफ्तारियाँ हुई हैं, लेकिन जो गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें ज्यादातर या तो छात्र शामिल हैं या उनके अभिभावक या बिचौलिये। बड़ी मछलियाँ तो बची ही रह गयी हैं। हालांकि 2014 में मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जरूर गिरफ्तार हुए थे जिन पर व्यापमं के मुखिया के तौर पर इस पूरे खेल में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था, लेकिन दिसम्बर 2015 में वे रिहा भी हो गये थे. पहले पुलिस फिर विशेष जांच दल और अब सीबीआई द्वारा इस मामले की जांच की जा रही है, लेकिन अभी तक इस महाघोटाले के पीछे के असली ताकतों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है. 

2017 व्यापम के लिए बहुत नाटकीय साबित हो रहा है। पहले तो कैग रिपोर्ट में सीधे तौर पर शिवराज सरकार की मंशा पर सवाल उठाये गये थे, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई का हलफनामा आया है जिसमें आरोप लगाने वाले ही घेरे में नजर आ रहे हैं, ऐसा लगता है पूरा मामला गोल पहिये पर सवार हो चुका है। जाहिर है इस महाघोटाले के पीड़ितों के लिए इंसाफ के दिन अभी दूर हैं।   
edtorjanjwar@gmail.com

May 13, 2017

4 हजार सैनिक, 18 घंटे का सर्च आॅपरेशन पर नहीं मिला एक भी आतंकवादी

1989 के बाद पहली बार चला ऐसा आॅपरेशन, लोग खौफ के साये में
खतरनाक बात यह है कि बंदूकों के मुकाबले पत्थर फेंक रही 12 से 18 वर्ष के कश्मीरी युवाओं की इस नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा विद्यार्थी हैं और भाड़े के पत्थरबाज अब पुरानी कहानी बन चुकी है... 

जम्मू—कश्मीर से आई.डी. खजूरिया की रिपोर्ट 

जम्मू के अखनूर में तैनात लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की 10 मई को कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। फैयाज की 10 मई को उस समय हत्या कर दी गयी थी जब वह एक शादी में शामिल होने अपने शोपियां गए थे। लेफ्टिनेंट फैयाज कुलगाम के रहने वाले थे।

लेफ्टिनेंट की हत्या के बाद से फिर एक बार जवाबी कार्रवाई और आतंकियों को मटियामेट कर देने की कसमें भारतीय सरकारी मशीनरियां खाने लगी हैं। अगर आप कश्मीर की थोड़ी जानकारी रखते हैं और आतंकी घटनाओं और पीड़ित कश्मीरी अवाम के प्रदर्शनों से वाकिफ हैं तो जवाबी कार्रवाई की कसमें बहुत मामूली किस्म का चुटकुला जान पड़ेंगी जिसको सुनकर न हंसना आता है न रोना। 


जैसे कि अब और नहीं, ईंट से ईंट बजा देंगे, पाकिस्तान के दस सिर लाएंगे, एक—एक आतंकियों का सफाया होकर रहेगा, आदि—इत्यादि।

पर किसी भी सरकारी मशीनरी को इस बात की चिंता नहीं है कि जम्मू—कश्मीर में पिछले 27 वर्षों से चल रही लाशों की खेती कब बंद होगी, कब जनाजे उठने थमेंगे और कब वहां के नागरिक अमन और चैन की जिंदगी से बावस्ता हो पाएंगे? 

क्या इस सवाल के बारे में सोचे बिना सरकार जवानों की हत्या और प्रतिहत्या का सिलसिला रोक पाएगी? कैसे वह देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को गलत राजनीतिक रणनीति और सांप्रदायिक संतुष्टता के दोजख से बचाएगी? पहली फिक्र अवाम की किए बगैर कोई हल निकल पाएगा? 

मेरा मानना है, नहीं। पर सरकार ऐसा नहीं सोच पाती। सेना प्रमुख बिपिन रावत बयान देते हैं कि हथियार आतंकियों से निपट लेंगे। मानो हथियार आकाश में चलेंगे और आतंकवाद पर कोई हवाई निशाना होगा। बिपिन रावत की उसी जिद का नतीजा था कि शोपियां के 25 गांवों में 4 मई को 4 हजार सेना के जवानों ने सर्च आॅ​परेशन किया। इसके अलावा हेलीकॉप्टर भी गांव के ऊपर दिन भर मंडराते रहे। 

दिनभर चले 4 हजार सैनिकों के आॅपेरशन में पूरे दिन और देर रात तक घर के लोग बाहर सड़कों पर पड़े रहे। उनके अनाजों, कपड़ों और सामानों को सेना ने तहस—नहस कर दिया। आप इसे सर्च आॅपरेशन की सामान्य प्रक्रिया भी कह सकते हैं? पर कश्मीर की आवाम नहीं कह सकती। 

बाजारू मीडिया में इस सर्च आॅपेरशन के बारे में ऐसे प्रचारित किया गया मानो किसी दुश्मन देश पर हमला हुआ हो। मीडिया विजय गीत गाती रही पर एक पंक्ति का सच आपको नहीं बताया। 

आइए हम यहां बता देते हैं... 

मीडिया ने यह नहीं बताया कि जिस सर्च आॅ​परेशन ने 1990 के बाद जैसे हालात मानने को कश्मीरी जनता को बाध्य कर दिया है, उस 4000 सैनिकों वाले आॅ​परेशन में एक आतंकी नहीं मिला। हजारों सैनिकों की फौज फाटा, कुत्तों का रेला और हेलीकॉप्टर मिलकर एक आतंकवादी नहीं पकड़ सके पर महीनों और वर्षों में खरीदे—बनाए सामानों और घरों को सेना ने जरूर तोड़—फोड़ कर दिया, अनाज और भोजन सामग्री को लगभग बर्बाद कर दिया।

इसकी भरपाई देश को किस रूप में करनी पड़ती है? जनता के असहयोग के रूप में। उदाहरण आपके सामने है। एक कश्मीरी नौजवान मर जाए तो सड़कों पर कश्मीर उमड़ पड़ता है, लेकिन उसी कश्मीर का एक सैनिक, वह भी मुसमलान उमर फैयाज मारा गया तो नजदीकी रिश्तेदारों, कुछ ग्रामीणों और मीडिया वालों को छोड़ आम लोग नहीं आए? 

न आना अपने आप में संदेश है, विग्रह है, सत्याग्रह है और साथ ही सबसे बढ़कर असहयोग है। इस जन असहयोग से सेना की बंदूक कैसे निपट पाएगी। अक्टूबर 2016 में बुरहान बानी के मारे जाने से पहले तक इतने व्यापक विरोध प्रदर्शन होने बंद हो गए थे। पर सरकार नहीं चेती। उसने शांति और वार्ता की सभी संभावनाओं को एक तरफ से नकार दिया। 

उसी नकार का घातक परिणाम हमारे सामने आ रहा है। कश्मीर के प्रदर्शनकारियों में सबसे बड़ी तादाद 12—13 साल से लेकर 17—18 वर्ष के बच्चों की है, जिनके अंदर यह भावना नए सिरे से भर रही है कि भारत हमारा देश नहीं है। ये सेना हमारी नहीं है। पुलिस और फौज भारत के लिए काम करती है और हमारे निर्दोष लोगों को मारती है। ये युवाओं की ऐसी नई पीढ़ी है जिसको मौत से कोई डर नहीं, गोलियों का कोई भय नहीं। 

आप ठंडे दिल से सोचिए कि इन भावनाओं को निकालने और भारत के प्रति प्रेम व भरोसा पनपाने के काम बंदूकें आएंगी या वार्ताएं और शांति का पथ। 

​पर सरकार को शांतिपथ पर बढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकारों की एकतरफा सैद्धांतिक समझ और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने आज जम्मू—कश्मीर को बर्बादी के कगार पर लाकर रख दिया है। यहां लाखों कब्रें बन चुकी हैं। पिछले 27 सालों में हजारों गुमशुदा नौजवानों की तलाश, हजारों बेवा औरतों की दर्द भरी कहानियॉं जन्नत-ए-कश्मीर के लिए मौलिक सवाल बन चुका है। 

अमूमन देखा गया है कि हमारे राजनेता हमेशा की तरह सिद्धांत को व्यवहार में उतारने की बात करते रहे, मगर बातचीत के बजाय दबाव व वोटों की राजनीति पर कश्मीर की बली चढाई जाती रही। चुनाव जीतने वाले कहते रहे कि एक सिर के बजाये 10 सिर लाने होंगे। बातचीत आतंकी से नहीं होनी चाहिए। सत्ता में बैठे हुए लोग डरते रहे और बंदूक की तादाद बढ़ाते रहे। 

मगर इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं  दिया  कि  काले कानूनों व सुरक्षा बलों का दबाव एक नई नस्ल बना चुका है, जिसको मौत से कोई डर नहीं है। पिछले साल जुलाई माह से लगातार नौजवान कुर्बानियां देते जा रहे हैं और भारतीय सेनाओं के जवान भी शहीद हो रहे हैं।

बॉर्डर पर रोज़ गोलीबारी से आम जनता त्रस्त है और उनके जानमाल का नुकसान हो रही है, फसलें तबाह हो रही हैं। दूसरी तरफ कश्मीरी जनता का रुख देखकर लगता है कि इन सब कार्रवाइयों से वह उनका हौसला पस्त होने वाला नहीं है, न ही वे इस दबाव की नीति के आगे घुटने टेकेंगे।
editorjanjwar@gmail.com

मौत का खौफ और गोलियों का डर नहीं कश्मीर की नई पीढ़ी में

खतरनाक बात यह है कि बंदूकों के मुकाबले पत्थर फेंक रही 12 से 18 वर्ष के कश्मीरी युवाओं की इस नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा विद्यार्थी हैं और भाड़े के पत्थरबाज अब पुरानी कहानी बन चुकी है... 

जम्मू—कश्मीर से आई.डी. खजूरिया की रिपोर्ट 

जम्मू के अखनूर में तैनात लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की 10 मई को कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। फैयाज की 10 मई को उस समय हत्या कर दी गयी थी जब वह एक शादी में शामिल होने अपने शोपियां गए थे। लेफ्टिनेंट फैयाज कुलगाम के रहने वाले थे।

लेफ्टिनेंट की हत्या के बाद से फिर एक बार जवाबी कार्रवाई और आतंकियों को मटियामेट कर देने की कसमें भारतीय सरकारी मशीनरियां खाने लगी हैं। अगर आप कश्मीर की थोड़ी जानकारी रखते हैं और आतंकी घटनाओं और पीड़ित कश्मीरी अवाम के प्रदर्शनों से वाकिफ हैं तो जवाबी कार्रवाई की कसमें बहुत मामूली किस्म का चुटकुला जान पड़ेंगी जिसको सुनकर न हंसना आता है न रोना। 


जैसे कि अब और नहीं, ईंट से ईंट बजा देंगे, पाकिस्तान के दस सिर लाएंगे, एक—एक आतंकियों का सफाया होकर रहेगा, आदि—इत्यादि।

पर किसी भी सरकारी मशीनरी को इस बात की चिंता नहीं है कि जम्मू—कश्मीर में पिछले 27 वर्षों से चल रही लाशों की खेती कब बंद होगी, कब जनाजे उठने थमेंगे और कब वहां के नागरिक अमन और चैन की जिंदगी से बावस्ता हो पाएंगे? 

क्या इस सवाल के बारे में सोचे बिना सरकार जवानों की हत्या और प्रतिहत्या का सिलसिला रोक पाएगी? कैसे वह देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को गलत राजनीतिक रणनीति और सांप्रदायिक संतुष्टता की दोजख से बचाएगी? पहली फिक्र अवाम की किए बगैर कोई हल निकल पाएगा? 

मेरा मानना है, नहीं। पर सरकार ऐसा नहीं सोच पाती। सेना प्रमुख बिपिन रावत बयान देते हैं कि हथियार आतंकियों से निपट लेंगे। मानो हथियार आकाश में चलेंगे और आतंकवाद पर कोई हवाई निशाना होगा। बिपिन रावत की उसी जिद का नतीजा था कि शोपियां के 25 गांवों में 4 मई को 4 हजार सेना के जवानों ने सर्च आॅ​परेशन किया। इसके अलावा हेलीकॉप्टर भी गांव के उपर दिनभर मंडराते रहे। 

दिनभर चले 4 हजार सैनिकों के आॅपेरशन में पूरे दिन और देर रात तक घर के लोग बाहर सड़कों पर पड़े रहे। उनके अनाजों, कपड़ों और सामानों को सेना ने तहस—नहस कर दिया। आप इसे सर्च आॅपरेशन की सामान्य प्रक्रिया भी कह सकते हैं? पर कश्मीर की आवाम नहीं कह सकती। 

बाजारू मीडिया में इस सर्च आॅपेरशन के बारे में ऐसे छापा गया मानो किसी दुश्मन देश पर हमला हुआ हो। मीडिया विजय गीत गाती रही पर एक पंक्ति का सच आपको नहीं बताया। 

आइए हम यहां बता देते हैं... 

मीडिया ने यह नहीं बताया कि जिस सर्च आॅ​परेशन ने 1990 के बाद जैसे हालात मानने को कश्मीरी जनता को बाध्य कर दिया है, उस 4000 सैनिकों वाले आॅ​परेशन में एक आतंकी नहीं मिला। हजारों सैनिकों की फौज फाटा, कुत्तों का रेला और हेलकॉप्टर मिलकर एक आतंकवादी नहीं पकड़ सके पर महीनों और वर्षों में खरीदे—बनाए सामानों और घरों को सेना ने जरूर तोड़—फोड़ कर दिया, अनाज और भोजन सामग्री लगभग बर्बाद कर दिया।
इसकी भरपाई देश को किस रूप में करनी पड़ती है? जनता के असहयोग के रूप में। उदाहरण आपके सामने है। एक कश्मीरी नौजवान मर जाए तो सड़कों पर कश्मीर उमड़ पड़ता है लेकिन उसी कश्मीर का एक सैनिक, वह भी मुसमलान उमर फैयाज मारा गया तो नजदीकी रिश्तेदारों, कुछ ग्रामीणों और मीडिया वालों को छोड़ आम लोग नहीं आए? 

न आना अपने आप में संदेश है, विग्रह है, सत्याग्रह है और साथ ही सबसे बढ़कर असहयोग है। इस जन असहयोग से सेना की बंदूक कैसे निपट पाएगी। अक्टूबर 2016 में बुरहान बानी के मारे जाने से पहले तक इतने व्यापक विरोध प्रदर्शन होने बंद हो गए थे। पर सरकार नहीं चेती। उसने शांति और वार्ता की सभी संभावनाओं को एक तरफ से नकार दिया। 

उसी नकार का घातक परिणाम हमारे सामने आ रहा है। कश्मीर के प्रदर्शनकारियों में सबसे बड़ी तादाद 12—13 साल से लेकर 17—18 वर्ष के बच्चों की है जिनके अंदर यह भावना नए सिरे से भर रही है कि भारत हमारा देश नहीं है। ये सेना हमारी नहीं है। पुलिस और फौज भारत के लिए काम करती है और हमारे निर्दोष लोगों को मारती है। ये युवाओं की ऐसी नई पीढ़ी है जिसको मौत से कोई डर नहीं, गोलियों का कोई भय नहीं। 

आप ठंडे दिल से सोचिए कि इन भावनाओं को निकालने और भारत के प्रति प्रेम व भरोसा पनपाने के काम बंदूकें आएंगी या वार्ताएं और शांति का पथ। 

​पर सरकार को शांतिपथ पर बढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकारों के एकतरफा सैद्धांतिक समझ और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने आज जम्मू—कश्मीर को बर्बादी के कगार पर लाकर रख दिया है। यहां लाखों कब्रें बन चुकी हैं। पिछले 27 सालों में हजारों गुमशुदा नौजवानों की तलाश, हजारों बेवा औरतों की दर्द भरी कहानियॉं जन्नत-ए-कश्मीर के लिए मौलिक सवाल बन चुका है। 

अमूमन देखा गया है कि हमारे राजनेता हमेशा की तरह सिद्धांत को व्यवहार में उतारने की बात करते रहे, मगर बातचीत के बजाय दबाव व वोटों की राजनीति पर कश्मीर की बली चढाई जाती रही। चुनाव जीतने वाले कहते रहे कि एक सिर के बजाये 10 सिर लाने होंगे। बातचीत आतंकी से नहीं होनी चाहिए। सत्ता में बैठे हुए लोग डरते रहे और बंदूक की तादाद बढ़ाते रहे। 

मगर इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं  दिया  कि  काले कानूनों व सुरक्षा बलों का दबाव एक नई नस्ल बना चुका है, जिसको मौत से कोई डर नहीं है। पिछले साल जुलाई माह से लगातार नौजवान कुर्बानियां देते जा रहे हैं और भारतीय सेनाओं के जवान भी शहीद हो रहे हैं।

बॉर्डर पर रोज़ गोलीबारी से आम जनता त्रस्त है और उनके जानमाल का नुकसान हो रही है, फसलें तबाह हो रही हैं। दूसरी तरफ कश्मीरी जनता का रुख देखकर लगता है कि इन सब कार्रवाइयों से वह उनका हौसला पस्त होने वाला नहीं है, न ही वे इस दबाव की नीति के आगे घुटने टेकेंगे।

May 10, 2017

जुड़वा दिमाग जैसे हैं मोदी और ट्रंप

पूर्व आइपीएस विकास नारायण राय इन दिनों अमेरिका में हैं। वे लगातार भारतीय समाज, सुरक्षा और राजनीति पर लिखते रहते हैं। अबकी उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की अचंभित करने वाली समानताओं, मसखरेपन, इतिहास ज्ञान और समाजदृष्टि पर बहुत ही तथ्यात्मक और दिलचस्प टिप्पणी की है,  पढ़िए पूरा लेख विस्तार से...

अमेरिका से जनज्वार के लिए  विकास नारायण राय 

 
रूरी नहीं जो राष्ट्र नेता इतिहास बनाने निकलते हैं, उन्हें इतिहास की समझ भी हो| ऐसे में उनके हाथों घोर अनर्थ होने या भारी भ्रान्ति फ़ैलने की संभावना बनी रहती है| नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, याह्या खान, सद्दाम हुसैन जैसों के आत्मघाती उदाहरण साक्षात हैं|

मोदी और ट्रम्प फिलहाल उन्हीं पद चिन्हों पर न भी चलते दिख रहे हों पर उनकी इतिहास शून्यता गंभीर राजनीतिक आशंकाओं को हवा दे रही है और साथ ही उन्हें मखौल का पात्र भी बना रही है| लगता है, जैसे राजनीतिक शिखर छूने की जल्दी में ये दोनों महानुभाव इतिहास बनाने नहीं स्वयं इतिहास बनने के कगार पर हों|

मोदी और ट्रम्प को एक खाने में रखने वालों को भी आज शायद ही उनके समर्थकों की एक जैसी हताशा भरी नियति से हैरानी हो| फ़िलहाल दोनों के भक्त उनके चुनाव प्रचार के दौर का थूका हुआ चाटने को मजबूर नजर आते हैं| ट्रम्प में रूस की सामरिक दिलचस्पी की छाया उनके राष्ट्रपति अभियान पर लगातार बनी रही थी, और अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते पहलुओं की छानबीन अमेरिकी सेनेट की न्यायिक समिति कर रही है|

स प्रकरण का आपराधिक पक्ष एफबीआई की जाँच का विषय है| चुनाव के दौरान रूस में अपनी व्यावसायिक स्थिति को लेकर ट्रम्प ने जो झूठे-सच्चे पैंतरे बदले, उन्हें सही ठहरा पाना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है| यहाँ तक कि ट्रम्प ने, अमेरिकी इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति की जांच कर रही एफबीआई के डायरेक्टर को ही बरखास्त कर दिया|

मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्धोन्माद खड़ा करने में ‘छप्पन इंच के सीने’ से लेकर ‘एक के बदले सौ सर’ जैसी अव्यावहारिक डींगें जम कर हांकी थीं| तीन वर्षों के उनके इतिहास-दृष्टि रहित शासन में काश्मीर की उत्तरोत्तर बिगड़ती स्थित ने उनके समर्थकों की बोलती बंद कर दी है|

वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अपने ‘नरेंद्रबली’ की पिलपिलाती छवि को कैसे फ़िल्मी ‘महाबली’ के रूप में दुरुस्त करें| मोदी का रास्ता सीमित होते-होते एकमात्र पाकिस्तान से युद्ध के विकल्प की ओर बढ़ रहा है| दो परमाणु शक्तियों के बीच यह एक मिलीभगत का युद्ध ही होगा, जिसके लिए अमेरिका का रजामंद होना जरूरी है| लगता नहीं कि ट्रम्प के अमेरिका के पास इसके लिए अभी समय है|

क्या वे अपने कार्य भार में इतिहास बोध के महत्व को कभी समझ पायेंगे- मोदी और ट्रम्प? डेढ़ दशक भी नहीं हुये, मोदी की साख इतनी कम होती थी कि उनको प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के हेलिकॉप्टर में घुसने नहीं दिया जाता था| आज वे स्वयं धाकड़ प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं|

ट्रम्प को भी शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में उतरे| न सिर्फ वे भारी बहुमत से उम्मीदवार बने बल्कि उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति पद भी हथिया लिया|

दोनों, ट्रम्प और मोदी, अपनी-अपनी तरह से अनुभव के धनी कहे जायेंगे और ट्रम्प के शब्दों में ‘डील’ करने में माहिर भी| तब भी, उनकी अभूतपूर्व राजनीतिक सफलताओं के बावजूद, उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता पर बढ़ते प्रश्न चिन्ह की मुख्य वजह रही है उनकी कार्यशैली से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का नदारद होना|

ट्रम्प को अपने नव-नियुक्त एनएसए जनरल फ्लिन को उनके रूस से संबंधों के सार्वजनिक होने पर बरखास्त करना पड़ा| जबकि मोदी की हालिया चुनावी सफलताओं पर इवीएम जालसाजी के आरोप चिपकने लगे हैं| ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिका में मुस्लिम प्रवेश पर रोक वहां की अदालतों में एक दिन भी नहीं ठहर सकी| भारत में नियमित मुस्लिम वर्जना मोदी की विकास यात्रा में असहनीय बोझ हो चली है| जाहिर है, ऐतिहासिकता से मुंह मोड़ कर राष्ट्रीय नेतृत्व देने के अपने खतरे हैं|
  
किसी को बताने की जरूरत नहीं कि ‘पप्पू’ कहने पर भारतीय राजनीति का कौन सा चेहरा याद आता है| अमेरिकी राजनीति में लगता है ट्रम्प भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे है| और मोदी? याद कीजिये, बिहार चुनाव में मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान से लगे तक्षशिला को बिहार का हिस्सा घोषित कर डाला था| यहाँ तक कि विज्ञान कांग्रेस में, गणेश के धड़ से हाथी का सर जोड़ने की दन्त कथा को उन्होंने प्राचीन भारत में अति विकसित सर्जरी के ‘इतिहास’ से जोड़ दिया| खासी किरकिरी के बाद अब वे अपना इतिहास बोध सुरक्षित स्तरों पर ही व्यक्त करते हैं|

सलन, ‘साठ साल बनाम साठ महीनों’ जैसी प्रचार चर्चाओं में| या विदेशी दौरों में शेखी मारकर कि उनसे कितने दशक पहले तक कोई भारतीय प्रधानमन्त्री उस देश में नहीं पहुंचा| मानना पड़ेगा, इन सब के लिए भारतीय मीडिया की मेहरबानी कैसे हासिल करनी है, मोदी बखूबी समझते हैं| ट्रम्प ने अमेरिका में ‘फेक मीडिया’ शब्द ईजाद किया जबकि मोदी ने उसे भारत में कार्यान्वित भी कर दिखाया|

काश! उन्हें भारत-पाक के बीच बार-बार असफल रही क्रिकेट डिप्लोमेसी या वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को व्यर्थ करने वाली पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल पैंतरेबाजी में निहित ऐतिहासिक सन्देश की समझ भी होती| तो वे नवाज शरीफ के जन्म दिन पर लाहौर बिना बुलाये धमकने जैसे सतही कूटनीति में भारत-पाक तनावों का हल ढूंढने के बजाय, कश्मीर में कोई सार्थक राजनीतिक-सामरिक पहल कर रहे मिलते|

काश! नक्सल आयाम के आर्थिक-सामाजिक पहलू का इतिहास भी मोदी के सामरिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा हो सकता! तब वे इस समस्या का महज सैनिक हल हासिल करने की एक आयामी जिद में देश का समय और ऊर्जा न गँवा रहे होते| इतिहास बोध से संपन्न मोदी ने, उत्तर-पूर्व में शांति लाने के कांग्रेसी मॉडल की असफलता को ही दोहराते रहने के बजाय, दशकों तक अशांत रहे त्रिपुरा राज्य की, कम्युनिस्ट शासन में हासिल, ऐतिहासिक स्थिरता से सबक लिया होता|

तिहास किसी को माफ़ नहीं करता| देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू तो स्वयं किसी प्रबुद्ध इतिहासकार से कम न थे| उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, जो उन्होंने 1942-46 में ‘भारत छोड़ो’ के दौरान अहमदनगर किले में बंदी रहते हुये लिखी थी, को इतिहास क्रम में भारत की उदार संस्कृति और दर्शन से परिचय की खान कहा जा सकता है|

ह नेहरू के इतिहास बोध का ही करिश्मा था कि उन्होंने विश्व युद्धों से जर्जर दो ध्रुवीय विश्व में भारत के नेतृत्व में एक तीसरे तटस्थ ध्रुव की नींव रखी, और दो सदी की औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले गरीब देश को आधुनिकता के प्रकाश से आलोकित रखा| पर चीन के महाशक्ति मंसूबों की ऐतिहासिक समझ की चूक ने उनसे भारी सामरिक भूल कराई, जिसकी कीमत देश को 1962 के युद्ध में मनोबल तोड़ने वाली पराजय के रूप में चुकानी पड़ी| 
     
मेरिका में 1961 के क्यूबा मिसाइल संकट को टालने का श्रेय आसानी से राष्ट्रपति केनेडी की इतिहास मर्मज्ञता को दिया जाता रहा है| वही अमेरिका आज अपने पैंतालीसवें राष्ट्रपति ट्रम्प को इतिहास का अनिच्छुक पाठ पढ़ते देखना चाहता है| हुआ यूँ कि ‘डील’ में माहिर ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में खुद की तुलना अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन से कर डाली| यहाँ तक भी गनीमत थी क्योंकि इतने भर से उनका जाना-पहचाना बड़बोलापन ही झलकता|

शर्ते, उसी झोंक में आगे वे यह न जोड़ देते कि एंड्रू जैक्सन होते तो अमेरिका का गृह युद्ध न हुआ होता, उसका समाधान निकाल लिया जाता| अमेरिका के इस सातवें राष्ट्रपति (1829-37) का निधन दास प्रथा को लेकर हुए गृह युद्ध से सोलह वर्ष पूर्व हो गया था और इतिहास में उन जैसे दास मालिक को गृह युद्ध से कभी जोड़ा भी नहीं गया|

जैक्सन को 1812 में न्यू ओरलेंस के युद्ध में ब्रिटिश फ़ौज को हराने वाली सेना का नेतृत्व करने पर राष्ट्रीय नायक की ख्याति मिली थी| 1824 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक जीवन में धनाढ्य वर्ग के विपरीत सामान्य लोगों के लिए काम किया| उनके कार्यकाल में अमेरिकी आदिवासियों का नियत बस्तियों में दारुण विस्थापन उनके नाम पर एक काला धब्बा माना जाता है|

ट्रम्प ने जैक्सन को एक दृढ़ व्यक्ति और बड़े दिलवाला कहा| 1830 के दशक में साउथ कैरोलिना अमेरिका से अलग होना चाहता था और तब जैक्सन ने उसे युद्ध की धमकी देकर यह इरादा छोड़ने पर बाध्य किया| उस समय समीकरण था एक राज्य बनाम शेष राष्ट्र का| दो दशक बाद, दक्षिण के ग्यारह राज्य एक साथ अलग होने को बजिद थे| उनके साथ युद्ध का मतलब गृह युद्ध ही था|

तिहासकार एकमत हैं कि जिस युद्ध को अब्राहम लिंकन जैसा दूरदर्शी राष्ट्रपति नहीं रोक सका, उसे जैक्सन की सैन्यवादी रणनीति कैसे भी नहीं रोक सकती थी| हाँ, इतिहास शून्य ट्रम्प को जरूर लगता है कि जैक्सन से तुलना कर वे स्वयं को एक दृढ़ और बड़े दिलवाला राष्ट्रपति कहलवा लेंगे, और आम व्हाइट अमेरिकी का हितैषी भी|
  
मोदी के एंड्रू जैक्सन सरदार पटेल हैं, ट्रम्प की तर्ज पर बिना उनके ऐतिहासिक अवदान को समझे ही| पटेल रियासतों के भारत में विलय के लिए जाते हैं, जबकि मोदी के राजनीतिक नेतृत्व में, देश के आधा दर्जन प्रांतों में सशस्त्र अराजकता बद से बदतर होती गयी है| पटेल ने लोकतांत्रिक संविधान और नौकरशाही के इस्पाती ढांचे को मजबूत किया, मोदी ने संविधान में पलीता लगाने और नौकरशाही को पिछलग्गू बनाने का काम किया है|

से में मोदी की इस समझ को क्या कहें कि पटेल की विश्व में सबसे ऊंची लौह मूर्ति लगाकर वे स्वयं को सरदार कहलवा लेंगे| देश का मुख्य राजनीतिक कार्यकारी इतिहास की समझ से शून्य हो तो उस देश को कब अपमान के दौर से गुजरना पड़ जाये, कहना मुश्किल है| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गंभीर कमी को वह ‘जोश’ से पूरी करता है और नाजुक भूलें करता है|

मने मोदी को, नोटबंदी से काला धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार ख़त्म करने का दावा करते देखा| हमने ट्रम्प को, मेक्सिको सीमा पर दीवार से अमेरिकियों के आर्थिक संकट के हल का सपना बेचते देखा| क्या हम उनमें इतिहास बुद्धि की कामना कर सकते हैं!  

May 8, 2017

केजरीवाल यानी...मैं, मैं और बस मैं

उन शर्तों की आंखों देखी जो केजरीवाल की राजनीति के असल सिद्धांत बने 

केजरीवाल ने दो टूक सबको बता दिया था —  मुझे ऐसी राजनीति नहीं करनी, जहां पार्टी बनाने के बाद 10-15 साल सत्ता के लिए संघर्ष करना पड़े। सत्ता के लिए लम्बा इंतजार और स्ट्रगल, मेरे बस का नहीं, इससे बढ़िया मैं राजनीति छोड़ दूं और अपना एनजीओ चलाऊँ...

तरुण शर्मा की रिपोर्ट 


बात 2011 के बसंत के ​दिनों की है जब मैं स्वामी अग्निवेश का निजी सहयोगी हुआ करता था। दिल्ली के 7 जंतर मंतर का दफ्तर जो अन्ना आंदोलन के साथ—साथ न जाने कितने राष्ट्रीय आन्दोलनों का कैंप ऑफिस रहा। अन्ना आंदोलन का पहला फेज अभी—अभी खत्म हुआ था। केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान नहीं किया था, पर माहौल में आंदोलन को राजनीतिक पहचान देने और व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की चर्चा चारो ओर थी। 

स्वामी अग्निवेश का दफ्तर और उसका बरामदा हमेशा ऐसे आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए धरने के बाद थोड़ा—बहुत सुस्ताने और बहस—मुबाहिशों का केंद्र रहा है जहां एनजीओ, सामाजिक आंदोलनों और वैकल्पिक राजनीति के चाहने वाले कार्यकर्ता और छोटे, बड़े नेता अक्सर डेरा डाले रहते थे।  

अन्ना आंदोलन जिसने राष्ट्रीय स्तर पर तमाम सामाजिक संगठनों, युवाओं और जन आंदोलन के अलग—अलग संघर्षशील नेताओं को एक मंच पर लामबंद किया था। अन्ना के रालेगण सिद्धि वापिस चले जाने के बाद नई राजनीतिक पार्टी के लिए इसके नेताओं में आपसी बातचीत, सलाह मशविरा शुरू हो गया। जिसमें मोटे तौर पर ये बात सामने आई कि बिना किसी नेता के चेहरे को सामने किए पूरे भारत में  जन आंदोलन  के अगुवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाना चाहिए और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के आधार पर एक नेता के बजाए स्थानीय नेतृत्व के जरिए एक सामूहिक राष्ट्रीय नेतृत्व खड़ा किया जाए। 

जाहिर तौर पर इस प्रक्रिया से पार्टी बनाने में थोड़ा वक़्त लगता। पर इन सबके बीच अन्ना आंदोलन का एक ऐसा नेता था जो यह तय कर चुका था उसे हर हाल में एक ऐसी राजनीतिक पार्टी बनानी है जिसमें सिर्फ और सिर्फ वे नेता हों और पूरी पार्टी में उनके कद का कोई और नेता न हो। 

इसी को ध्यान में रखते हुए अरविंद केजरीवाल ने बड़ी चालाकी से अपने एक सत्याग्रह और अनशन का अंत अपनी खुद की एक राजनीतिक पार्टी बनाने के ऐलान के साथ किया। मैंने जंतर— मंतर पर उस समय इनकी पार्टी में शामिल होने के इच्छुक इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कई नेताओं को आपस में बात करते हुए सुना,देखा और गवाह रहा है कि कैसे केजरीवाल सिर्फ अपने करीबी लोगों को पार्टी के नेतृत्व में चाहते हैं और जब तक वे पार्टी का मनमाफिक ऊपरी संगठन और उसके ऊपर अपनी पकड़ नहीं बना लेते किसी भी अन्य बड़े नेता को पार्टी में शामिल नहीं होने देंगे। 

मैं, मैं और बस मैं... मेरे अलावा पार्टी में कोई और नेता ना उभरे, पार्टी बनाने के समय से लेकर अब तक केजरीवाल अपना आधा दिमाग और ऊर्जा इसी पर खर्च करते हैं। खुद को लेकर इतना बड़ा मोह और उससे उपजा डर यही केजरीवाल की सबसे बड़ी कमजोरी है, जिसके चलते उन्होंने पार्टी में एक के बाद बड़ी गलतियां की हैं। 

आम आदमी पार्टी हरियाणा के एक पूर्व नेता जिनके पास हरियाणा की एक बड़ी जिम्मेवारी थी, ने खुद बताया था कि जब योगेन्द्र यादव ने आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन दिया और पार्टी में शामिल होने की घोषणा की, उसी समय केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव बड़ा नेता न बन पाएं उनके खिलाफ साजिशें शुरू कर दीं। योगेंद्र यादव पार्टी में आने के तुरंत बाद समान मानसिकता के ईमानदार और संघर्षशील लोगों को पार्टी से जोड़ने के लिए पूरे भारत का दौरा करना चाहते थे, जिसकी इजाजत केजरीवाल ने नहीं दी। 

योगेंद्र यादव हरियाणा में काम कर रहे थे, तब पार्टी की हरियाणा चुनाव लड़ने की योजना थी। बाकायदा एक रणनीति के तहत हरियाणा में केजरीवाल ने अपने एक करीबी नवीन जयहिंद को योगेंद्र यादव को निपटाने के लिए लगा दिया। जिन्होंने हर शहर में कांग्रेस और दूसरी पार्टियों से सिर्फ टिकट के चाहने वाले नेताओं को पार्टी में शामिल किया और उनके जरिए एक बहस भी हरियाणा में चलाई कि हरियाणा का मुख्यमंत्री कौन हो, नवीन जयहिंद या योगेंद्र यादव। 

मेरे हरियाणा के उन्हीं मित्र ने बताया कि जब उन्होंने हरियाणा की मीटिंग में योगेंद्र यादव से पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से नाराजगी जताते हुए सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता करने की बात कही तो जवाब में योगेंद्र यादव ने कहा क्या करें केजरीवाल ने सीधे उनको जवाब दे दिया है कि मेरे को पहली ही बार चुनाव जीतकर सरकार बनानी है, उसके लिए जो भी जरूरी होगा मैं करूँगा। 

केजरीवाल ने पार्टी के सभी आदर्शवादियों, ईमानदारी व सुचिता की राजनीति के आग्रहियों को पार्टी बनाने के कुछ महीनों के भीतर ही साफ कर दिया था कि मुझे ऐसी राजनीति नहीं करनी, जहां पार्टी बनाने के बाद 10 -15 साल सत्ता के लिए संघर्ष करना पड़े। इतना लम्बा इंतजार और स्ट्रगल, मेरे बस का नहीं। इससे बढ़िया है कि मैं राजनीति ही छोड़ दूं और अपना एनजीओ चलाऊं। फिर आप अकेले करते रहना खाली सिद्धांतों की राजनीति।   

दो राष्ट्र हैं हिंदू और दलित

दलितों में इतना परिवर्तन नहीं आया है कि वे सवर्णों की तरह खूंखार हो गए हों और वे होंगे भी नहीं क्योंकि उनके पुरखे—कबीर, रविदास और डा. आंबेडकर ने उन्हें भेड़िया बनने की शिक्षा नहीं दी है...



सहारनपुर के शब्बीरपुर घटना पर कँवल भारती की टिप्पणी 

इस विषय पर मैं काफी लिख चुका हूँ. मैं अपने मत की पुष्टि में अभी की सहारनपुर की घटना लेता हूँ, जहाँ शब्बीरपुर गाँव में ठाकुरों ने 15 दलितों पर लोहे की राड और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला किया है, उन्होंने 22 घरों पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी, जिससे उनके पशु, टीवी, मोटरसाइकिलें, बर्तन, बिस्तर, फर्नीचर सब जल कर राख हो गये. 

उन्होंने पूरी जाटव बस्ती में दहशत मचाई, जाति-सूचक गलियां दीं, रविदास मंदिर में तोड़फोड़ व लूटमार की, और गांव में स्थापित रविदास  की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया. कहा जाता है कि गांव में ठाकुर राणाप्रताप की झांकी निकाल रहे थे, दलितों ने लाउडस्पीकर बंद करने को कहा, और बंद न करने पर उन्होंने जुलुस पर पथराव कर दिया. 

इससे भगदड़ मच गयी, एक ठाकुर की दम घुटने से मौत हो गयी, जिसका बदला लेने के लिए फोन करके आसपास के ठाकुरों को बुलाया गया. और सबने खूंखार तरीके से दलित बस्ती को घेर लिया. इस घटना ने देवली, साधुपुर, कफलटा, कुम्हेर, बाथे और खैरलांजी नरसंहार की याद ताजा कर दी है, जिनमें खूंखार सवर्णों ने दलितों के खून से होली खेली थी. 

इन सभी घटनाओं की तरह इस कांड की भी एकपक्षीय जाँच होगी, और सभी अभियुक्त दोषमुक्त हो जायेंगे. पर कुछ बेगुनाह दलित जेल जरूर चले जायेंगे. प्रदेश में हिन्दूवादी ठाकुरों की सरकार है. 

दलित कवि मलखान सिंह की एक कविता के अनुसार, ठाकुरों का राजा हाथी पर सवार होकर गाँव में आएगा, और दलितों को कुछ रियायतें बाँटकर चला जायेगा. यह भी हो सकता है कि राजा इसकी जरूरत भी न समझे. खैर, इस घटना को अंजाम देने में किसी भी दलित की कोई भूमिका नहीं है. इस सारे खूनी नाटक की पटकथा ठाकुरों के द्वारा ही लिखी गयी थी. 

पिछले कुछ सालों में  दलितों में इतना परिवर्तन तो आया है, कि वे अब जातीय अपमान का शाब्दिक जवाब देने लगे हैं, और कुछ पढ़लिख गए हैं. किन्तु, उनमें इतना परिवर्तन अभी नहीं आया है कि वे सवर्णों की तरह खूंखार हो गए हैं. लोगों के घरों में आग लगाने लगे हैं, घरों में घुसकर लोगों को गोलियों से भूनने लगे हैं, या गर्भवती महिला का पेट चीरकर शिशु को हवा में उछालकर गोली से उड़ाने लगे हैं. 

जिस दिन दलित इतने खूंखार हो जायेंगे, तब शायद देश एक भीषण जातिसंघर्ष में बदल जाएगा, और शायद सवर्णों के छक्के भी छूट जाएँ. लेकिन दलित इतने खूंखार बनेंगे नहीं, क्योंकि उनके पुरखे—कबीर, रविदास, और डा. आंबेडकर ने उन्हें भेड़िया बनने की शिक्षा नहीं दी है. वे लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोग हैं, और भूखे-नंगे रहकर और फुटपाथों पर सोकर भी उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाये. इसलिए इस आरोप पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता कि उन्होंने ठाकुरों से लाउडस्पीकर बंद कराने की हिम्मत की होगी, और उनके जुलुस पर पत्थर फेंके होंगे. 

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उस गांव के जाटव अपनी जीविका के लिए उन ठाकुरों पर ही आश्रित हैं. वे उनके खेतों में काम करते हैं. वे उन पर पत्थर कैसे फेंक सकते थे? जरूर, इसके पीछे ठाकुरों और दलितों के बीच कोई अन्य आर्थिक कारण होगा. हो सकता है कि खैरलांजी की तरह यहाँ भी कुछ दलित आर्थिक रहन—सहन में ठाकुरों की बराबरी करने लगे हों, और उन्हें जमीन पर लाने के लिए ही उनके घरों को जलाकर राख करके उन्हें सबक सिखाया गया हो.

'शूद्रों—अतिशूद्रों की फूट का फायदा हमेशा ब्राह्मणवादियों ने उठाया है'

शूद्र अतिशूद्र एकदूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने साझा दुश्मन ब्राह्मणवाद से नहीं लड़ रहे हैं. इन जातियों को आपस में लड़ाने के लिए ही जातीय अस्मिता और जातीय पहचान का इस्तेमाल किया गया है....

अशोक भारती नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी राइट्स (NACDOR) के संस्थापक हैं और इस संस्था के माध्यम से भारत के 23 राज्यों में दलित आदिवासी अधिकार की लड़ाई लड़ते रहे हैं. आइईएस अधिकारी रह चुके भारती ने लंबे समय तक जमीनी काम करते हुए स्वयंसेवी संस्थाओं का एक देशव्यापी गठजोड़ निर्मित किया है. देशभर में दलित आदिवासी आंदोलनों से ये जुड़े रहे हैं और दलित आदिवासी अधिकार और विकास के मुद्दों पर राईट बेस्ड अप्रोच के साथ काम करते आये हैं. वर्तमान में दलित बहुजन राजनीति के लिए एक नया विकल्प बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं और हाल ही में इन्होने जन सम्मान पार्टी की स्थापना की है. 

अशोक भारती से संजय जोठे की बातचीत

इधर उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की हार पर आपने अभी तक विस्तार से बात नहीं रखी, आपकी नजर में इस हार का क्या कारण है?
देखिये राजनीतिक हार या जीत के गहरे मायने होते हैं और कम से कम आज की दलित राजनीति की हार और उत्तर प्रदेश में बसपा के सफाए के बहुत गहरे मायने हैं. ये केवल एक चुनावी हार नहीं है, बल्कि ये एक विचारधारा की और एक रणनीति की हार है. बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर खुद अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ एक तरह की राजनीति बनाई गयी है, वो कुछ समय के लिए तो चल गयी लेकिन उसका फेल होना तय था. वही हुआ है.

आपने एक शब्द इस्तेमाल किया “अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ राजनीति” क्या आप इसकी विस्तार से व्याख्या करना चाहेंगे?
हाँ, हाँ, क्यों नहीं... इस बात को अब दलितों और बहुजनों के घर घर तक पहुँचाना होगा. मैं जरूर इसे विस्तार से रखना चाहूँगा. देखिये, बात दरअसल ये है कि अगर दलितों में आपस में जातियों की अलग अलग पहचान को उभारा जाएगा और उन्हें अपनी अपनी जातियों पर गर्व करते हुए दूसरी जातियों से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास किया जाएगा तो ये सभी जातियां अपने अपने में मगन होने लगेंगी और जातियों के बीच में आपस में कोई पुल नहीं बन सकेगा. यही सबसे बड़ी भूल है. कांशीराम जी के बताये अनुसार हमने एक बार नहीं बल्कि कई बार जातियों को अपने अपने छोटे दायरों में महान बनने का पाठ पढाया, उसका फायदा ये हुआ कि हमारे समय में जातियों के भीतर ही अपनी जाति से जुड़ा हुआ अपमान और हिकारत का भाव खत्म हुआ. न सिर्फ दलित और अनुसूचित जातियों ने अपनी जातीय पहचान में गर्व लेना शुरू किया बल्कि उन्हें दूसरों से भी कुछ सम्मान मिलने लगा. ये कांशीरामजी की बड़ी सफलता रही है. इसी ने जातियों को एक राजनीतिक मोबिलाइजेशन के लिए उपलब्ध बनाया और इसी का परिणाम हम बसपा की राजनीतिक सफलताओं में देखते हैं. 

लेकिन ये सफलता अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ कैसे है? आप इस पर क्या दृष्टिकोण रखते हैं?
देखिये, मेरा दृष्टिकोण एकदम साफ़ है जो मैं कई बार जाहिर भी कर चुका हूँ. बाबा साहेब आंबेडकर के लिए जाति विनाश न केवल लक्ष्य है, बल्कि वही उनकी राजनीति का मार्ग भी है. इसे थोड़ा समझना होगा हमें. अंबेडकर जाति के खात्मे के लिए राजनीति में जा रहे हैं और इसके लिए जो रणनीति बनाते हैं उसमे जातियों को एक दूसरे से दूर ले जाना उनके लिए रास्ता नहीं है बल्कि वे जातियों को एक दूसरे के निकट लाना चाहते हैं. न केवल डिप्रेस्ड क्लासेस या अनुसूचित जातियों को बल्कि वे पिछड़ों, किसानों मजदूरों को भी एकसाथ लाना चाहते थे. लेकिन दिक्कत बीच में ये हुई कि उनके समय में दलितों अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ों की राजनीतिक चेतना अभी ठीक से विकसित नहीं हुई थी इसीलिये उनमें एक जाति के रूप में अपने ही अंदर एक आत्मसम्मान का भाव जगाने के लिए कुछ समय की जरूरत थी. 

ये समय अंबेडकर के बाद उन्हें कांशीराम जी ने दिया. इस समय का ठीक इस्तेमाल करते हुए कांशीराम जी ने इन जातियों में एक ख़ास किस्म का आत्मसम्मान भरना शुरू किया और इसी के नतीजे में जातीय अस्मिता की राजनीति परवान चढी और उसने बड़ी सफलता भी हासिल की. लेकिन मैं फिर जोर देना चाहूँगा कि ये रणनीति दूरगामी अर्थो में अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ ही थी. इसका कारण ये है कि इसने जातियों के बंद दायरों के भीतर जातीय अस्मिता तो जगा दी लेकिन जातीय अस्मिता के जगते ही इसने उन सारी अलग अलग जातियों के बीच में श्रेष्ठ अश्रेष्ठ की पुरानी बहस को नए कलेवर में दुबारा खड़ा कर दिया. जो चर्मकार मित्र हैं वे चर्मकार होने में गर्व अनुभव करने लगे जाट या वाल्मीकि मित्र हैं वे अपने जाट और वाल्मीकि होने में गर्व अनुभव करने लगे. यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन इससे आगे बढ़ते हुए इनमे आपस में कोई मधुर संबंध नहीं बन सके और इसका फायदा ब्राह्मणवादी विचारधारा ने उठाया. इन उभरती अस्मिताओं को आपस में लड़ाया गया. आरक्षण के मुद्दे पर, मंदिर मस्जिद या हिन्दू मुसलमान के मुद्दे पर या लडका लड़की की छेड़छाड़ जैसे मामूली मुद्दों पर भी इन दलितों और ओबीसी को आपस में लड़ाया गया. ये लड़ाई कांशीराम की रणनीति की असफलता है. 

अगर शूद्रों और दलित जातियों में आत्मसम्मान आता है तो क्या उनका आपस में लड़ना अनिवार्य है? जैसा कि पिछले कुछ दशकों में हुआ? क्या इसे रोका नहीं जा सकता?
रोका जा सकता है बंधु, वही तो हमें समझना है अब. अब तक की राजनीतिक जय पराजय से जो सन्देश निकल रहा है उसे इमानदारी से देखने की जरूरत है. 

स जातीय अस्मिता के टकराव को कैसे रोका जा सकता है? 
ये सिद्धांत में बहुत आसान है, हालाँकि अमल में ये कठिन है, फिर भी मैं आपको बताना चाहूंगा कि जातीय अस्मिता ने जिस तरह का आत्मसम्मान एक जाति के भीतर पैदा किया है वह स्वागत योग्य तो है लेकिन उसका वहीं तक ठहरे रहना खतरनाक है. वाल्मीकि या जाटव या जाट या यादव अपनी जातीय अस्मिता में सम्मान का अनुभव अवश्य करे, लेकिन वहीं न रुक जाए. इस जातीय अस्मिता को अन्य जातियों की अस्मिता और सम्मान से जोड़कर भी देखे. सीधे सीधे कहें तो बात ये है कि चूँकि यादव, जाटव, जाट, कोरी आदि भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था में शूद्र और अतिशूद्र माने गए हैं इनका काम मेहनत का और किसानी या शिल्प का काम रहा है. जब ये अपने अपने जातियों के दायरे में अपने श्रम और अपने काम में गर्व का अनुभव कर सकते हैं तो अपने दूसरे भाइयों के काम का भी सम्मान कर ही सकते हैं. इसमें परेशानी कहाँ है? 

एक यादव या जाट जब पशु पालता है या खेती करता है तो उसी खेती के लिए लोहार, कारपेंटर से या चर्मकार से भी औजार खरीदता है ये सब एक साझे मिशन के साथी हैं. यादव या जाट अपनी खेती के लिए की गयी मेहनत में अपने लोहार, चर्मकार या कारपेंटर भाई का भी सम्मान क्यों नहीं कर सकता? मेरी नजर में बिलकुल कर सकता है. हम इन सब जातियों को एक दूसरे का सम्मान करना सिखा सकते हैं. इस तरह जातीय दायरों में सम्मान की बात को जातीय दायरों से बाहर निकालकर एक दूसरे के सम्मान से जोड़ दिया जाए तो अंबेडकर के सपनों की राजनीति शुरू हो जायेगी और एक प्रबुद्ध और समृद्ध भारत का सपना साकार होने लगेगा.

आप बार बार जातीय अस्मिता और सम्मान पर जोर दे रहे हैं क्या आप पेरियार से प्रभावित हैं?
हाँ भी और नहीं भी. हाँ इस अर्थ में कि वे बाबा साहेब की तरह ही हमारे लिए आदरणीय हैं, उनकी रणनीतियों से जो शिक्षा मिली है हम उन्हें आगे बढाना चाहते हैं. नहीं इस अर्थ में कि उनके आत्मसम्मान आन्दोलन में और मेरी सम्मान की प्रस्तावना में एक बुनियादी अंतर है. पेरियार एक व्यक्ति के आत्मसम्मान की वकालत कर रहे हैं जो उस समय बहुत जरुरी था. उस समय की हालत ऐसी थी कि हमारे शूद्र अतिशूद्र अर्थात ओबीसी, दलित, आदिवासी भाई एकदम गरीबी और गुलामी में बंधे थे, ऐसे में एक व्यक्ति के आत्मसम्मान का प्रश्न ही संभव था. उस समय पेरियार अगर जातीय अस्मिताओं को भुलाकर अंतरजातीय सम्मान आन्दोलन चलाते तो इस बात को कोई नहीं समझता.

मेरा ये मानना है कि आज के दौर में उत्तर और दक्षिण दोनों की दलित राजनीति की सफलता ने और इस बीच हुए आर्थिक उदारीकरण और औद्योगिक, शैक्षणिक विकास ने दलितों, शूद्रों, आदिवासियों में व्यक्ति और जाति के स्तर पर काफी आत्मसम्मान भर दिया है. अब इस बिंदु के बाद दो ही दिशाएँ बाकी रह जाती हैं, या तो ये आत्मसम्मान से भरी जातियों और व्यक्ति आपस में लड़कर ख़त्म हो जाएँ या फिर अपने अपने आत्मसम्मान को साथ लिए हुए ये परस्पर सम्मान का भाव सीखकर एकदूसरे को ऊपर उठने में मदद करें. अब मेरा जोर दुसरे बिंदु पर है. इसीलिये मैं आत्मसम्मान की बजाय परस्पर सम्मान या सम्मान की राजनीति के पक्ष में हूँ. आप गौर से देखेंगे तो इसमें अंबेडकर और पेरियार की शिक्षाओं का सार मौजूद है.


इस तरह की सम्मान की राजनीति शूद्रों, अतिशूद्रों आदिवासियों को आपस में कैसे जोड़ सकती है?
यही तो मुद्दा है भाई. इसे ही समझना है, बाकी सब फिर अपने आप हो जाएगा. इसे इस तरह समझिये. अभी तक जाट, यादव, जाटव, कोरी आदि के नाम पर शूद्रों, अतिशूद्रों को आपस में लड़ाया गया है. इसमें फायदा सिर्फ ब्राह्मणवादी ताकतों को हुआ है जो जीत के बाद न शूद्रों अर्थात ओबीसी के किसी काम आती है न अतिशूद्रों अर्थात दलितों के किसी काम आती है. अब मजेदार बात ये है कि इन शूद्रों और अतिशूद्रों की हालत लगभग एक जैसी है. इनकी शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा इत्यादि के मानकों पर जो हालत है उसमे बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. सच्चर कमिटी की रिपोर्ट देखिये तो आपको पता चलेगा कि ओबीसी की हालत मुसलमानों और दलितों से कोई बहुत बेहतर नहीं है. लेकिन इसके बावजूद शूद्र अतिशूद्र एकदूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने साझा दुश्मन ब्राह्मणवाद से नहीं लड़ रहे हैं. इन जातियों को आपस में लड़ाने के लिए ही जातीय अस्मिता और जातीय पहचान का इस्तेमाल किया गया है. अगर एक जाट को अपने जाट होने में गर्व है और एक वाल्मीकि को वाल्मीकि होने में गर्व है तो एक ढंग से ये बात अच्छी है लेकिन इसका नतीजा ये भी होगा कि इन्हें आपस में लड़ाया जा सकता है. और वही हम देख रहे हैं. अगर जाट और वाल्मीकि एकदूसरे का सम्मान करते हुए भाइयों की तरह एकदूसरे की मदद कर सकें तो दोनों का सम्मान कम नहीं होगा बल्कि बढेगा. आपस में मुहब्बत और दोस्ती से एकदूसरे का सम्मान बढ़ता है, कम नहीं होता. इससे समाज में एक तरह की सुरक्षा और सुकून का माहौल बनता है. इस सुरक्षा और सुकून की हमारे शूद्र और अतिशूद्र भाइयों बहनों को बड़ी जरूरत है. और ये सुरक्षा तभी बनेगी जबकि ये जातियां जातीय अस्मिता से ऊपर उठकर अंतरजातीय सम्मान और सहकार करना सीखें.

तो जैसे पेरियार ने आत्मसम्मान आन्दोलन चलाया था वैसे ही आप जन सम्मान आन्दोलन चलाएंगे?
बिलकुल चलाएंगे, अब यही रास्ता है, इसीलिये हमने “जनसम्मान पार्टी” का गठन किया है और आम भारतीय नागरिक को सम्मान दिलवाने की राजनीति करना चाहते हैं. 

आज के हालात में जहां बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, हिंसा, भ्रष्टाचार आदि बड़े मुद्दे हैं वहां आप जन सम्मान को बड़ा मुद्दा कैसे बना रहे हैं?
देखिये ये बात सच है कि गरीबी बेरोजगारी भ्रष्टाचार आदि बड़े मुद्दे हैं. लेकिन ये मत भूलिए कि इन सबके बावजूद हमारा आम आदमी अब उतना लाचार, भूखा, कमजोर और दिशाहीन नहीं रह गया है जितना वह पचास या सौ साल पहले था. आज गरीबी है लेकिन भुखमरी नहीं है, आज बेरोजगारी है लेकिन बंधुआ मजदूरी नहीं है. कुछ हद तक हालात बदले हैं. ऐसे में एक आम भारतीय शुद्र मतलब ओबीसी और अतिशूद्र मतलब दलित के लिए रोजी रोटी और सुरक्षा के साथ साथ सम्मान भी बड़ा मुद्दा है. सम्मान के साथ शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, सामाजिक समरसता और सामान अवसर अपने आप शामिल हो जाते हैं. एक एक अक्र्के अगर हम इन छोटे छोटे मुद्दों की बात करेंगे को कोई हम न निकलेगा लेकिन सम्मान की बात आते ही ये सारे मुद्दे अपने आप इसमें शामिल हो जाते हैं. इसीलिये मैं जनसम्मान पार्टी की तरफ से जन के सम्मान की राजनीति करने के लिए भारत में निकला हूँ.

यहाँ आप जब दलितों शूद्रों और पिछड़ों को गरीब की तरह देखते हैं और उनके सम्मान के प्रश्न को एक साझा प्रश्न बनाते हैं तब क्या आप वर्ग चेतना के आईने में भी सम्मान को एक बड़े मुद्दे की तरह देख पाते हैं?
बिलकुल ही देख पाते हैं. इसे भी समझिये, असल में बाबा साहेब ने जो लक्ष्य हमारे लिए रखा है वह है जातिविहीन वर्ण विहीन और वर्ग विहीन समाज की स्थापना. इस नजरिये से चलें तो जिस तरह हमने जाति के विभाजन में सम्मान के प्रश्न को देखा उसी तरह हमें वर्ग के विभाजन में भी सम्मान के प्रश्न को देखना होगा. अब मूल मुद्दा ये है कि जाति या वर्ग दोनों से परे आम गरीब मजदूर या किसान को सम्मान कैसे दिलवाया जाए? यहाँ बाबा साहेब की बात पर गौर करना जरुरी होगा. उन्होंने कहा है कि रोटी तो कोई भी कमा लेता है, संपत्ति भी पैदा कर सकता है. लेकिन असल मुद्दा उसके सामाजिक सम्मान का है, समाज की मुख्यधारा की प्रक्रियाओं में उसकी स्वीकार्यता का है. 

आज अगर कोई दलित या अछूत उद्योगपति या बड़ा अधिकारी भी बन जाता है तो भी उसे अछूत या दलित ही कहा जाएगा. वहीं एक ब्राह्मण कितना भी गरीब या भिखारी क्यों न हो जाए समाज में उसका सम्मान एक ख़ास सीमा से नीचे नहीं गिरेगा. इसका मतलब ये हुआ कि जहां तक सम्मान का प्रश्न है व्यक्ति को वर्ग या वर्ण का सदस्य मानें या जाति का सदस्य मानें – तीनों जगहों पर उसके सम्मान का प्रश्न कमोबेश एक सा है. और यह एक गहरी बात है कि व्यक्ति के सामाजिक ही नहीं बल्कि पारिवारिक जीवन का सुख संतोष भी सम्मान पर ही निर्भर करता है. अगर हमारा आम भारतीय किसान मजदूर और गरीब अगर अपनी किसी भी पहचान के दायरे में अगर सम्मानित है तो उसकी गरीबी और जहालत से निकलने की कोशिश आज नहीं तो कल सफल हो ही जायेगी. लेकिन अगर उसके सामाजिक सम्मान को कम कर दिया गया या मिटा दिया गया तो वो अपनी स्थिति सुधारने के लिए न तो अपनी मेहनत से कुछ ख़ास कर पायेगा और न ही उसे समाज या समुदाय का सहयोग मिल सकेगा. सामाजिक सम्मान न होने का असर बहुत गहरा होता है. सम्मान से वंचित व्यक्ति और समुदाय ऐतिहासिक रूप से पिछड़ जाते हैं और संगठित प्रयास करने के लायक नही रह जाते. जाति व्यवस्था ने जो मनोवैज्ञानिक जड़ता थोपी है उसको सम्मान के इस दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए.

ये एकदम नया दृष्टिकोण है, आशा है जाति और वर्ग दोनों के प्रश्न को हम सम्मान और जाना सम्मान के नए उपकरण से हल कर सकेंगे?
हाँ, मुझे पूरी उम्मीद है कि जाति और वर्ग दोनों की संरचनाओं में दलितों अछूतों बहुजनों आदिवासियों और ओबीसी के जो प्रश्न हैं वे सम्मान के बिंदु पर आकर एक सूत्र में बांधे जा सकते हैं. और असल में वे बंधे हुए भी हैं. जरूरत है उन्हें उजागर करके उनके सामाजिक राजनीतिक निहितार्थों को ओपेरेशनलाइज करने की. इसी उद्देश्य से हमने जन सम्मान पार्टी का गठन किया है और हम इसी मुद्दे को बहुजन एकीकरण का आधार बनाने के लिए निकले हैं.