Feb 26, 2017

मोदी जी वाले गधे वेल्ले हैं, वेल्ले

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री अखिलेश के बीच चले गधा विमर्श के बाद पूरा देश गधों को लेकर संवेदनशील दिखा। टीवी स्टूडियो से लेकर चुनाव मैदान तक में गधे जैसे उपेक्षित जीव को सम्मान मिल रहा है और उसके बरख्स खड़ा होना नेताओं को सौभाग्य का आभास दे रहा है... 




अजय प्रकाश 

मोदी जी द्वारा खुद को देश का सबसे भरोसमंद गधा घोषित करने के बाद असली गधों और उनके मालिकों को बहुत खुशी हुई है। पर उनका दो टूक कहना है ​कि जिस गुजराती गधे की तुलना में मोदी जी ने गधा होना स्वीकार किया है, वह किसी काम के ​नहीं होते, सिर्फ देखने में सुदंर होते हैं बाकि वेल्ले होते हैं। 

गाजियाबाद के हिंडन नाले को पार करने के बाद कांशीराम आवास योजना के तहत चारमंजिला कॉलोनियां दिखती हैं। इन कॉलोनियों को बनाने की योजना की स्वीकृति उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने दी थी। मकसद था कि गरीबों को शहरी इलाकों में रहने के सस्ते घर मिल सकें। 

इन घरों को बनाने में गधों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। हरियाणा के झज्जर से आए दारा के मुताबिक, 'गधे पांच मंजिल तक आसानी से चढ़ जाते हैं। इंसानों पर काम पर लगाए जाने के मुकाबले यह बहुत सस्ते भी पड़ते हैं। पर मुश्किल यह है कि हमें 1 महीने काम मिलता है और 4 महीने बैठ कर खाना पड़ता है।' 

उनसे हम पूछते हैं कि आपको पता है कि मोदी जी ने खुद को देश का सबसे जिम्मेदार गधा कहा है। यह भी कहा है कि मैं गधों की तरह बिना थके आपके लिए खटता रहता हूं। 

बात सुन दारा हंसते हुए कहते हैं, 'हम गरीब लोग हैं, इतनी बड़ी बातें कहां से जान पाएंगे। अपना तो बस यही काम है, लट्ठ लेकर इन गधों को चुगाना।' पर दारा मानते हैं गधे के सबसे बड़ी बात है कि वह थकता नहीं है। उसे आप 24 घंटे खटा लो और सिर्फ आधे घंटे धूल में लोटने को दे दो तो वह फिर अगले 24 घंटे के लिए तैयार हो जायेगा। यहां तक कि उसे कुछ खाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। 

बन रहे मकानों के बीच दारा टीन शेड लगाकर रह रहते हैं। इनके साथ हरियाणा के ही ​भिवानी जिले के रामपाल प्रजापति भी रहते हैं। उनके पास भी 10 गधे हैं। वह हमें गधों के लगने वाले मेलों के बारे में बताते हैं। वे लोग झज्जर, बागपत आदि क्षेत्रों में लगने वाले गधा मेलों से गधे खरीदते हैं। उनकी प्राथमिकता में छोटे गधे होते हैं जो आसानी से सीढ़ियों पर चढ़ सकें। इस​ तरह उन्हें गधे सबसे सस्ते पड़ते हैं। मजबूत गधे दूर से सामान ढोने आदि के काम आते हैं।

रामपाल की बात सुन हमारे साथ गए सामाजिक कार्यकर्ता नन्हेलाल रामपाल को दुबारा बताते हैं कि गधों की चर्चा प्रधानमंत्री मोदी ने की है और खुद को गधा कहा है। इस पर रामपाल जोर से हंसते हैं और कहते हैं चलो इसी बहाने गधे चर्चा में आये। लेकिन रामपाल जानना चाहते हैं कि आखिर इतने बड़े आदमी को गधों के सहारे की क्या जरूरत पड़ी और उन्होंने किन गधों की बात की, सभी गधे काम के नहीं होते। 

हमारी टीम के साथी जनार्दन चौधरी उन्हें उस पूरे वाकये को बताते हैं कि कैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुजरात के गधों पर व्यंग्य किया, जिसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को गधा कहा और बताया कि मैं जनता का गधा हूँ और बिना थके 24 घंटे देश के लिए खटता रहता हूँ। 

यह जानकर गधों के दोनों मालिक बेहद खुश होते हैं। 

पर रामपाल प्रजापति बताते हैं कि जिन गधों से मोदी जी अपनी तुलना कर रहे हैं, वह गुजरात के बीड़ यानी जंगल के गधे हैं और वह किसी काम के नहीं होते हैं। मेरे बेटे ने बताया था कि आजकल अमिताभ बच्चन गधों का प्रचार कर रहे हैं। वे वेल्ले होते हैं, वेल्ले। जैसे नीलगायें होती हैं, एकदम वैसे ही। वह सिर्फ दिखने में ही सुदंर दिखते हैं, काम लो तो या फिर वह मर जाएंगे या भाग जाएंगे। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वह अपनी तुलना हमारे गधों से करें जो सच में​ बिना थके काम करते रहते हैं। 

इसके बाद गधों के मालिक गधों की चर्चा के बजाय खुद के बारे में बताने लगते हैं। वे कहते हैं, हम गरीब लोग अपने गधों के साथ गधा बनने के लिए हैं ही, पर आप प्रधानमंत्री से कहियेगा कि वह गधा बनने की जगह प्रधानमंत्री ही बने रहें और हमारे और गधों की​ जिंदगी को बेहतर करने के लिए कुछ करें।  

ग़ाज़ियाबाद की सिद्धार्थ विहार योजना को बसाने में गधों बड़ी भूमिका निभाई है। दारा के अनुुसार गधे इंसानों की तरह बड़े सलीके से 5वीं मंजिल तक ईंट, सीमेंट, बालू और बजरी पहुंचाते हैं। एक दिन में 10 गधे और 2 आदमी मिलकर सिर्फ 2 हजार ईंट चढ़ा पाते हैं, जिसके बदले उन्हें 2 हजार मिलता है। 2 हजार में से गधों के खाने-खर्चे के लिए 5 से 6 सौ रुपया आता है और शेष 14-15 सौ में 2 लोगों में बंटवारा होता है। 

सिराज : लद्धु घोड़े और गधे का अंतर बताते हुए
दारा के मुताबिक पिछले 4 महीनों से उन्हें मजदूरी नहीं मिली है। इनका कहना है, ठेकेदार टाल देता है कि अधिकारी पेमेंट नहीं कर रहे, अधिकारी कहते हैं सरकार पेमेंट नहीं कर रही। इसलिए आप मोदी जी को हमारी तरफ से राम-राम बोलिएगा और हमारी पेमेंट करा दें, बड़ी कृपा होगी। 

वहां से आगे बढ़ने पर हमारी मुलाकात सिराज से होती है। वह दो खच्चरों को चरा रहा है। मगर बातचीत में पता चलता है कि हमारा अनुमान गलत है और वे खच्चर नहीं हैं। 

सिराज कहता है, हम लद्धु घोड़े पालते हैं। गदहे नहीं पालते। हाँ, हम गदही जरूर पाल लेते हैं। गदहों के साथ समस्या यह है कि उन्हें अगर गदही दिख गयी फिर वह उसके पीछे-पीछे चल देते हैं। फिर उन्हें ढूंढ़ते रहो। 

लद्धु घोड़ों के बारे में सिराज बताता है, ये घोड़ों की नस्ल होती है, जबकि गधे और खच्चर एक नस्ल के हैं। गधों की कीमत इन घोड़ों के मुकाबले आधी होती है। दूसरा हम धोबियों-प्रजापतियों में कहावत भी है, घोड़े अपने लिए कमाते हैं और गधे दूसरों के लिए।  

इस अंतर को समझाते हुए सिराज कहता है, गधा किसी भी गदही को देखते ही उसके पीछे भागेगा, उस पर चढ़ेगा। उससे गदही गाभिन होगी पर गदहा तो अपना दम खो देगा। पर लद्धु घोड़ा ऐसा नहीं करता। वह इनकी तरह बेसब्र नहीं होता।

'गधा एक खोज' के बाद यह सोचना हमारे लिए बाकि रह गया था कि मोदी जी को संभवत: गधों के बारे में वह ज्ञान नहीं रहा होगा जो 18 वर्षीय सिराज को इतनी कम उम्र में है। अगर होता फिर वह अपनी तुलना वासनाजन्य बेसब्री के शिकार गधों से करने की जल्दबाजी बिल्कुल न करते।

चूंकि मामला प्रधानमंत्री से जुड़ा था, इसलिए हम इस बात पर और आश्वस्त होने के लिए फिर दोनों गधा मालिकों से मिले। तब उन्होंने भी सिराज की बात पर मोहर लगाते हुए कहा, 'गधों में ये समस्या तो है, गदहियों को देखने के बाद काबू में नहीं आते।' 

Feb 20, 2017

नादानियां बचपन की...

साईयारा फिल्मस के बैनर तले बन रही बॉलीवुड फिल्म "नादानियां बचपन की" की शूटिंग भरतपुर स्थित सोनेरा गांव में पूरी की गयी। यह फिल्म स्वच्छ भारत अभियान को केंद्र में रखकर निर्मित की गयी है।

फिल्म निर्माता संजय तिवारी और निर्देशक सूरज पाण्डे के मुताबिक फिल्म पूरी तरह से स्वच्छ भारत अभियान मिशन पर आधारित है। इस फिल्म की एक खासियत यह भी है कि इसमें सभी नये कलाकारों को मौका दिया गया है। इसी का नतीजा है कि सभी कलाकारों ने फिल्म में बहुत ज्यादा मेहनत की है।। इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है क़ि फिल्म की शूटिंग केवल दस दिनों में समाप्त कर एक नया रिकार्ड कायम किया गया।

फिल्म के निर्देशक सूरज पाण्डे दिल्ली के पहले ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने दिल्ली में रहकर अपनी पूरी मेहनत, लगन व ईमानदारी के साथ फिल्म बनाकर एक और नया रिकार्ड बनाया। निर्देशक सूरज पाण्डे ने 22 साल की कम उम्र में ही फिल्म निर्देशन कर  फिल्म इंडस्ट्री में दिल्ली की छवि को न केवल सुधारा है बल्कि दिल्ली व देश के अन्य नए उभरते कलाकारों के लिए भी आशा की किरण बनकर उभरे हैं।

फिल्म में सकारात्मक भूमिकाओं को निभाने वाले उत्कर्ष गुप्ता और अक्शु राजपूत हैं, वहीं भूपेन्द्र सिंह यानी रोकेट भईया सपोर्टिंग भूमिका में हैं, जो कि फिल्म में बच्चों की नादानियों से लेकर उनके बड़े होने तक उनका साथ निभाते हैं| कैलाश ठाकुर ने फिल्म में कामेडी का समा बांधा है| नेगेटिव किरदारों में साजिद, सैम गर्ग और वासु शर्मा ने जान डालने का काम किया है। साजिद ने नेगेटिव भूमिका निभाने के साथ-साथ DOP व चीफ असिस्टेन्ट डायरेक्टर और एक्शन डायरेक्टर का भी काम बेहतरीन तरीके से कर मल्टी टैलेन्टेड होने का सबूत दिया है।

प्रोडक्शन मैनेजर टराई इवेंट एण्ड ईस्टरटेनमेंट राज ईरानी ने किया, जिन्होंने एक किरदार भी निभाया है। फिल्म के प्रोडक्शन कंट्रोलर की कमान भूपेन्द्र सिंह ने संभाली और फिल्म के लाईन प्रोड्यूसर भूरा फोजदार  हैं। को. प्रोड्यूसर हिमांशु चौधरी हैं|

फिल्म की शूटिंग पूरी करने में सोनेरा गाँव के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता है। ग्रामीणों की सहयोगी भूमिका के चलते ही यह फिल्म इतने कम समय में पूरी हो पायी।

फिल्म निर्माता संजय तिवारी ने डायरेक्टर सूरज पाण्डे की मेहनत , लगन व ईमानदारी को देख कर उन्हें 3 अन्य फिल्में बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है जिनमें से एक फिल्म की शूटिंग मार्च अंत तक शुरू हो जाएगी |

"नादानियां बचपन की" फिल्म 9 जून 2017 को रिलीज होगी।

Feb 17, 2017

चुनावों की महफिल में जाति ही हीरोइन है, बाकि सब साइड रोल में

70 साल में लोकतंत्र ने सबसे ज्यादा आकर्षण जाति में पैदा किया है फिर आकर्षित कोई और मुद्दा कैसे करेगा...

अजय प्रकाश

यूपी के महाराजगंज से गोरखपुर आयी पैसेंजर से उतरे कई लोगों से मेरी बात हुई। ज्यादातर लोग कैंडिडेट के हारने-जीतने का विश्लेषण जातिगत आधार पर कर रहे थे। उसमें सवर्ण-अवर्ण-मुस्लिम सभी थे।

धीरे-धीरे भीड़ बढ़ गयी। खुद को भीड़ से घिरता देख मैं सीढ़ियों पर चढ़ गया और पूछा, ''आज़ादी के 70 साल बाद भी वोट देने के लिए जाति ही क्यों उत्साहित और आकर्षित करती है।''

महाराजगंज के नौतनवां से आये छबीलाल राजभर ने बुलंद आवाज में कहा, ''70 साल में लोकतंत्र ने सबसे ज्यादा आकर्षण जाति में पैदा किया है फिर आकर्षित कोई और मुद्दा कैसे करेगा। हीरोइन तो ​हीरोइन होती है! चुनाव में जाति ही हीरोइन है, बाकि सब साइड रोल में हैं।'' 

छबीलाल गोरखपुर के रेती चौराहे पर एक साड़ी के दुकान में सेल्समैन का काम करते हैं। वह रोज कैंपियरगंज से गोरखपुर पैंसेजर से ही आते—जाते हैं। उनकी बात सुन कुछ युवा और दूसरे लोग सहमति जताते हैं।

इसी भीड़ से एक कुली की आवाज बाहर आती है और वह यह बोलते हुए निकल जाता है कि ''सर, यहां कुली जैसा छोटा काम भी जाति के बिना नहीं मिलता है, बड़े कामों   में तो हईए है।'' 

कुली बात सुन गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी और समाजशास्त्र से बीए कर रहे तीसरे साल के छात्र राकेश गौतम कुछ यों जाहिर करते हैं, ''कोई माने या न माने यहां जाति ही सबकुछ की निर्धारक है। इंसाफ पाना हो, नौकरी जुगाड़नी हो, अपराध कर जेल से छूटना हो, अस्पताल में मरीज भर्ती कराना हो, थाने में मुकदमा दायर कराना हो या फिर लेखपाल से जमीन की सही नापी करानी हो, सब जगह सबसे भरोसे के साथ जाति ही खड़ी होती है। विकास, सरकार, प्रशासन सिर्फ जुमले हैं, जो हर पांच साल बाद एक बार चुनाव में रिवाज की तरह दुहरा दिए जाते हैं।''

राकेश गौतम दलित जाति से हैं और वे खुद जातिवाद को खत्म करने के पक्ष में हैं। पर वह कहते हैं, चाहने और होने में बहुत फर्क है। यह समाज ही ऐसा है जहां बगैर जाति संरक्षण के आपको जीने नहीं दिया जाएगा। वह बताते हैं, ''गंभीर रूप से मेरी बीमार मां तबतक गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती नहीं की गयीं जबतक 'पासवान' नेता का फोन नहीं आ गया। और पासवान नेता ने इसलिए फोन किया, क्योंकि वह भी दलित हैं, मेरा गांव उनका समर्थक है और उनके इशारे पर वोट देता है।''

राकेश की बात सुन गोरखपुर के एक नजदीकी कस्बे पिपराइच से आने वाले शिक्षक रोहित त्रिपाठी कहते हैं, ''दलितों और पिछड़ी जातियों ने देश में जातिवाद से दुर्गंधित कर दिया है। यह विकास, शिक्षा, प्रशासन को नहीं देखते, सिर्फ जाति देखते हैं। दलितों को इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन खड़ा है, कैसा प्रत्याशी है,बस उन्हें हाथी का बटन याद है।'' 

रोहित​ त्रिपाठी की बात सुन एक आदमी ने भोजपुरी में पूछा, ''बाबू अपने के का कईल जाला।'' भोजपुरी में यह सम्मानजनक संबोधन कहा जाता है।

रोहित ने बताया कि वह गोरखपुर के रामगढ़ तालाब की ओर बने एक प्राइवेट डिग्री कॉलेज में शिक्षक हैं और वह काफी पढ़े—लिखे हैं। उन्होंने एमफिल और पीएचडी दोनों किया है। जैसे ही त्रिपाठी ने कॉलेज का नाम बताया, पूछने वाले आदमी ने कॉलेज की पूरी हिस्ट्री बता डाली। 

कॉलेज हिस्ट्री से पता चला कि रोहित जो कि खुद ब्राह्मण हैं, जहां पढ़ाते हैं वह एक ब्राह्मण माफिया का कॉलेज है और चपरासी से लेकर शिक्षक तक ज्यादातर ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों में भी त्रिपाठी—तिवारी ब्राम्हणों की तादाद ज्यादा है, क्योंकि माफिया—नेता इसी टाइटिल का है।

इस तथ्य पर रोहित त्रिपाठी थोड़े विचलित होते हैं पर बड़े ताव से कहते हैं, ''वह तो रिश्तेदारी और गांव वाली बात है इसलिए वहां त्रिपाठी ज्यादा हैं।'' 

भोजपुरी में सवाल करने वाले आदमी ने कहा, ''बबुआ तोहरे जातिवाद रिश्तेदारी और हमारा जातिवाद दुर्गंध। है न। पर ई रहते जातिवाद कभी न खत्म होगा। चुनाव की हीरोइन तभी बदलेगी जब आप वाला जातिवाद भी जातिवाद कहलाएगा, अभी तो वह विकास, प्रशासन और सरकार के नाम से जाना जाता है।' 

Feb 16, 2017

कन्हैया कुमार की राह तकते यूपी के कॉमरेड

वामपंथी गर्भगृह में पिछले फरवरी में जो युवा तुर्क कन्हैया कुमार पैदा हुए थे, वे अपना 'राजनीतिक बचपना' इन दिनों कहां गुजार रहे हैं,  कोई बताएगा? दरअसल यूपी वाले उनको याद कर रहे हैं ...

इस बार मुझे यूपी में उनके बंधु—बांधव मिले थे। बताए कि सीपीएम, सीपीआई, सीपीआईएमएल और अन्य वामपंथी मिलाकर 50 से अधिक सीटों पर पर लड़ रहे हैं? पर कहीं अपेक्षित भीड़ नहीं जुट पा रही, वे लोग 403 में से किसी एक विधानसभा में भी दूसरे—तीसरे स्थान पर नहीं हैं। उम्मीदवारों और उनके समर्थकों के मुताबिक चुनावों में जिस तरह पैसे का जोर बढ़ा है उसके कारण मामूली माहौल भी नहीं बन पा रहा. उतना भी नहीं जिससे क्षेत्र के जनता हमें याद रख सके कि वामपंथी चुनाव लड़ रहे हैं. 
 
पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिले वामपंथी समर्थकों को  लग रहा है कि उन्हें इस बार 2017 के विधानसभा में जो वोट मिलेगा, वह  2012 विधानसभा से भी नीचे चला जायेगा। उनका कहना है कि दिल्ली, पटना, इलाहाबाद और देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले छात्र संगठनों के नौजवान भी नहीं पहुंच रहे, नाटक वाली टीम भी नहीं आई, जिनको देखने के लिए ही सही थोड़ी भीड़ पहले जुट जाया करती है. 

उम्मीदवारों और उनके समर्थकों का कहना है, अब तो एक ही आसरा है कन्हैया कुमार। जेएनयू वाला कन्हैया कुमार। अगर वह किसी उम्मीदवार के प्रचार में आ जाए तो भीड़ जुट जाए और हमलोगों की भी चर्चा अखबारों, टीवी में हो जाए, माहौल बन जाए। हमलोग कार्यकर्ताओं के चाय—पानी का पैसा नहीं जुट पा रहा फिर अखबार—मीडिया वालों को पैसा देकर कहां से खबर छपवाएं। इसलिए आप हमारा यह संदेश कन्हैया कुमार को पहुंचा दीजिएगा कि वह एक—दो यूपी जनसभाएं कर दें। 
 
मैंने पूछा, 'लेकिन कन्हैया कुमार तो पार्टी महासचिव नहीं हैं,  कोई नामित नेता भी नहीं है. आपलोग लिबरेशन, सीपीआई और सीपीएम के महासचिवों दीपंकर भट्टाचार्य, सुधाकर रेड्डी और सीताराम येचुरी को क्यों नहीं बुलाते, वे लोग भी भीड़ जुटा सकते हैं. क्या ये लोग आपलोगों के इस चुनाव में प्रचारक नहीं हैं?'  
 
मेरे इस सवाल पर कोई मुकम्मल जवाब नहीं आया, अलबत्ता किसी ने दबे  स्वर में कहा, ' बुलाने का किराया-भाड़ा भी बेकार जायेगा। वैसे ई सुधाकर रेड्डी कौन पार्टी के हैं'

आखिर में एक कार्यकर्ता ने कहा, 'सुने हैं कि कॉमरेड कन्हैया कुमार अपनी पीएचडी पूरी कर रहे हैं। उनसे एक बात कह दीजिएगा कि पार्टी पीएचडी से नहीं वोट से चलती है, जनसमर्थन जनता के बीच जाने से मिलता है, चाय की प्याली में तूफान पैदा करने से नहीं।'
 
गौरतलब है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार पिछले दिनों तब चर्चा में आए थे जब उनकी किताब 'बिहार से तिहाड़ तक' आई थी और खबर थी कि किताब से उन्हें लाखों की रॉयल्टी मिली है। 

Feb 15, 2017

नोटबंदी के बाद 12 लाख करोड़ वापस ले गए एनआरआई

जनज्वार। मोदी जी लगातार विदेश यात्राओं पर रहे और देशवासियों से कहते रहे कि हम सूट—बूट पहनकर कांग्रेसियों की तरह मौज मारने नहीं, बल्कि विदेशों में भारत के लिए इनवेस्टमेंट का माहौल बनाने जाते हैं। पर यहां हालत उल्टी हुई और सिर्फ 50 दिन की नोटबंदी में एनआरआई 12 लाख करोड़ रुपया लेकर वापए चले गए। 

बैंकरों के आंकड़े के मुताबिक नोटबंदी के बाद से विदेशों में बसे एनआरआई ने निवेश से तो हाथ पीछे खींच ही लिए, वहीं अक्टूबर—नवम्बर में 11.43 अरब डालर यानी तकरीबन 12 लाख करोड़ रुपए का कुल डिपॉजिट भुना लिया। नोटबंदी के बाद एनआरआई का भारतीय अर्थव्यवस्था पर से भरोसा कम हुआ है। एनआरआई ने फोरेन करेंसी नान रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर—बी को भुनाया है, जो कि एक बड़ा आंकड़ा है। अब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है और रुपए की तुलना में डालर अब और मजबूत होगा। 

नोटबंदी के बाद तो आम जनता परेशानी झेल ही रही है, अब डॉलर के और ज्यादा मजबूत होने की स्थिति में देश में महंगाई बेतरतीब बढ़ेगी। 

नए साल को छोड़ दें तो प्रधानमंत्री मोदी देश से ज्यादा विदेश में रहने के कारण सुर्खियां और जगहंसाई बटोरते रहे हैं। सरकार भी कहती रही है कि मोदी जी विदेश भ्रमण पिकनिक के ​लिए नहीं, ​बल्कि देश को पिछड़े के स्टेटस से विकसित की श्रेणी में लाने के लिए जाते रहे हैं।

पिछले वर्ष सरकार द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक विश्व के कई देशों जापान, चीन, इंग्लैंड, कोरिया, यूएई, फ्रांस और जर्मनी ने मोदी जी के भ्रमण से प्रभावित होकर अगले पांच वर्षों में अरबों के निवेश करने का आश्वासन दिया था। सरकार ने मीडिया के माध्यम से देश को बताया कि इन देशों ने 22200 करोड़ डॉलर का पांच साल में निवेश का आश्वासन दिया है। पर नोटबंदी बाद सरकार यह बताने की हालत में नहीं है कि विदेशों से अब तक कितना इंवेस्टमेंट हुआ है। 

पर आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो निवेश का आश्वासन अब पूरा होता नहीं दिखता है। दुनिया भर में निवेश को प्रात्साहित करने के मानक तय करने वाली वैश्विक आर्थिक संस्था आईएमएफ ने नोटबंदी के बाद भारत को खराब निवेश का देश करार दिया है। 

भारत में निवेश को लेकर बने खराब माहौल के मद्देनजर आईएमएफ ने गिरती रेटिंग की है और आईएमएफ का कहना है कि भारत में निवेश के माहौल सामान्य होने में कमसे कम तीन साल और लग जाएंगे। यानी 2020 से पहले भारत की विकास दर 6.6 से उपर जाने में ​मुश्किल होगी। जबकि नोटबंदी से पहले भारत की विकास दर 7.6 थी जो नोटबंदी के बाद घटकर 6.6 रह गयी है।  

Feb 14, 2017

शहीदों को लेकर भ्रामक प्रचार बंद करो!

भगत सिंह और साथियों के मुकदमे के दस्तावेज मौजूद हैं जो कई किताबों में भी आ चुके हैं। लेकिन झूठ फैलाने वाली ब्रिगेड का दस्तावेजों से लेना-देना भी क्या है....

धीरेश सैनी

भगत सिंह को फांसी की सजा के नाम पर झूठे मैसेज वायरल करने वालों का देश और देश के शहीदों से कैसा रिश्ता है, समझना मुश्किल नहीं है। भगत सिंह और साथियों की फांसी पर जहां द्रविड विचारक रामासामी पेरियार ने अपने तमिल रिसाले में संपादकीय लिखकर इस शहादत के प्रति सम्मान व्यक्त किया था, वहीं आरएसएस शहादत के औचित्य पर सवाल खड़े कर रहा था। 

जब भगत सिंह जैसे विचारक-क्रांतिकारी देश की जनता को एकजुट होकर अंग्रेजों, साम्राज्यवाद और हर तरह की गैरबराबरी से लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे, संघ अपने साम्प्रदायिक अभियान के जरिये अंग्रेजों की मदद ही कर रहा था। ऐसे में शहीदों के नाम पर झूठ फैलाए जाने पर कोई हैरत भी नहीं है। वैलंटाइन डे के विरोध के नाम पर कई साल पहले मैसेज जारी किए गए थे कि इस दिन भगत सिंह को फांसी हुई थी, इसलिए शहीदों को सम्मान देते हुए वैलंटाइन डे का बहिष्कार किया जाए। चूंकि भगत सिंह की शहादत की तारीख 23 मार्च 1931 बेहद मशहूर है, इसलिए पिछले कुछ सालों से यह मैसेज वायरल किया जाने लगा कि 14 फरवरी को भगत सिंह, राजगुरू औऱ सुखदेव को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। यह भी कोरा झूठ है। 

सच यह है कि स्पेशल ट्रिब्यूनल ने फैसला 14 फरवरी को नहीं, बल्कि 7 अक्तूबर 1930 को सुनाया था जिसके तहत भगत सिंह, शिवराम राजगुरु उर्फ `एम` और सुखदेव को सजा-ए-मौत तथा किशोरी लाल, महावीर सिंह, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, गया प्रसाद उर्फ निगम, जयदेव और कँवलनाथ तिवारी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। कुंदन लाल को सात साल सश्रम कारावास और प्रेमदत्त को पांच साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। तीन अभियुक्तों देशराज, अजय कुमार घोष और जतिन्द्र नाथ सान्याल को रिहा कर दिया गया था।

पांच अभियुक्त जयगोपाल, फणीन्द्र नाथ घोष, मनमोहन बनर्जी, हंसराज वोहरा और ललित कुमार मुखर्जी को इकबालिया गवाह हो जाने के कारण कैद मुक्त करने का फैसला सुनाया गया था। इकबालिया गवाह रामशरण दास और ब्रह्मदत्त के लिए अलग आदेश जारी किए जाने की घोषणा की गई थी।

भगत सिंह और साथियों के मुकदमे के दस्तावेज मौजूद हैं जो कई किताबों में भी आ चुके हैं। लेकिन झूठ फैलाने वाली ब्रिगेड का दस्तावेजों से लेना-देना भी क्या है?

(धीरेश सैनी की फेसबुक वॉल से)

Feb 13, 2017

मोदी सरकार ने प्रचार में खर्च किए 11 अरब

ग्रेटर नोएडा के आरटीआई एक्टिविस्‍ट रामवीर तंवर को सूचना कानून अधिकार के तहत आयोग ने बताया कि केंद्र सरकार ने मात्र सवा दो साल में प्रचार पर 11 अरब रुपए खर्च कर दिए।

गौरतलब है कि 29 अगस्त 2016 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सूचना के अधिकार के जरिए आरटीआई एक्टिविस्‍ट रामवीर तंवर ने पूछा था कि केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार बनाने से लेकर अगस्‍त 2016 तक विज्ञापन पर कितना सरकारी पैसा खर्च किया है। तब उन्हें आयोग ने सिलसिलेवार तरीके से अलग—अलग मद के खर्च का ब्योरा दिया था। ध्यान रहे कि यह आंकड़ा 7 महीने पहले का है, जिसे औसतन भी देखा जाए तो अब 15 अरब से उपर जा चुका होगा।

देखिए, गरीबों और किसानों की सरकार का दंभ भरने वाली भाजपा ने किस माध्यम में प्रचार के लिए कितने करोड़ रूपये खर्च किए...

एसएमएस – 2014-  9.07 करोड़, 2015- 5.15 करोड़, अगस्त 2016- 3.86 करोड़

इंटरनेट - 2014-6. 61 करोड़, 2015-14.13 करोड़, अगस्त 2016-1.99 करोड़

ब्राॅडकास्ट -2014-64. 39 करोड़, 2015-94.54 करोड़ , अगस्त 2016-40.63 करोड़

कम्‍युनिटी रेडियो-2014 -88.40 लाख, 2015-2.27 करोड़, अगस्त 2016-81.45 लाख

डिजिटल सिनेमा -2014 -77 करोड़, 2015-1.06 अरब, अगस्त 2016-6.23 करोड़

टेलीकास्ट-  2014-2.36 अरब, 2015-2.45 अरब, अगस्त 2016-38.71 करोड़

प्राॅडक्शन -2014-8.20 करोड़, 2015-13.90 करोड़, अगस्त 2016-1.29 करोड़

साल के अनुसार सालाना खर्च

    2014- एक जून 2014 से 31 मार्च 2015 तक करीब 448 करोड़ रुपए खर्च
    2015- 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 तक 542 करोड़ रुपए खर्च
    2016- 1 अप्रैल 2016 से 31 अगस्‍त 2016 तक 120 करोड़ रुपए खर्च

यूपी में चुनावी खर्चे का हिसाब और ईमानदारी की बिसात

​कुल सीटें 403.

हर सीट पर औसत प्रत्याशियों की संख्या 17 से 20.

इनमें से जीतने के लिए लड़ते हैं कम से कम 5.

जीतने के लिए लड़ने वाले प्रत्याशियों में प्रति प्रत्याशी औसत खर्च 2 करोड़ यानी 10 करोड़ लगाकर लड़ते हैं 5 प्रत्याशी.

शेष 10 से 15 प्रत्याशी निपट लेते हैं 5 करोड़ में.

यानी कुल मिलाकर एक विधानसभा में सभी प्रत्याशियों ने मिलकर खर्च किया 15 करोड़. 15 करोड़ को 403 सीटों से गुणा करते हैं तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का खर्च सिर्फ प्रत्याशियों के लिए 6045 करोड़ बैठता है. पर विधानसभा पहुंचा एक और मंत्री बना औसत 60 में से एक. विधानसभा त्रिशंकु हो गयी, तो फिर मातम ही सहारा। राष्ट्रपति शासन लग गया तो चौतरफा नुकसान. यानी रिस्क बहुत बड़ा और लाभ के खेल में सिर्फ कोई एक शामिल.

तीन बार विधायक और दो बार मंत्री रह चुके नेता ने जब चुनावी खर्चे का हिसाब सिलसिलेवार सुना दिया तो आखिर मुझसे पूछा, ''क्या यह खर्चा किसी को ईमानदार रहने देगा. अगर आप कह रहे हैं कि हम लूट का प्रतिनिधित्व करते हैं तो क्या कोई एक विधायक 5 साल में 15 करोड़ लूट पाता है? नहीं न। फिर फायदे में कौन रहा नेता या नेता को बनाने वाले.'' 

मंत्री आगे बोले, ''भारत में नेता बनाया जाता है, कोई नेता बनता नहीं है. आसपास के लोग आपको लाभ लायक समझते हैं, वही नेता बनाते हैं नहीं तो बहारकर फेंक देते हैं. राहुल गांधी नेता​गिरी नहीं करना चाहते, उनको शउर भी नहीं पर लट्ठ लेकर उनसे नेतागिरी करवाई जा रही है, क्योंकि करवाने वाले जानते हैं वह लाभ लायक हैं. रही बात ईमानदारी से चुनाव लड़ने की तो पूरे प्रदेश में सामान्य सीट पर कोई एक प्रत्याशी बताइए जो करोड़पति न हो और मुकाबले में हो। सिर्फ एक सीट पर.'' 

मंत्री आखिर में बोले, ''चुनाव में ईमानदारी की बात करना भी एक बाजार है. बेईमानी से वसूली का बाजार। क्या नाम बताउं, मेरे एक मित्र हैं. उनसे मैंने राजनीति का पाठ पढ़ा. वह भी चुनाव लड़े, पर कभी जीते नहीं. एक बार संयोग से मैं और वो दोनों एक ही विधानसभा से खड़े हुए. हम दोनों उस बार हार गए, पर एक राज की बात कहूं, मैंने अपना वोट उन्हीं को दिया था।''