Aug 25, 2016

देश पर दाग है यह शख्स

आप इस शख्स को ध्यान से देखिए। कैसे यह विकसित होते भारत को बदनाम कर रहा है। मरी हुई बीवी को कंधे पर लाद के ले जा रहा है। वह भी 10 किलोमीटर। इसे गौर से पहचान लीजिए। यह उसी कालाहांडी का है जहां भूख से मरने वालों ने देश की समृद्धि पर दाग लगाई थी, हमारी सभ्यता को दागदार किया था। हो सके तो इसे देश निकाला देने के लिए अभियान चलाइए। और यकीन कीजिए यह मोदी या नवीन पटनायक की तरह चार घंटे नहीं सोता होगा। न ही अंबानी, अडानी या टाटा की तरह हाड़तोड़ मेहनत करता होगा। मेहनत करने वाले कहीं ऐसे मरते हैं। यह दुर्गति तो मुफ्त में रोटियां तोड़ने वालों की ही होती है। अन्यथा इसकी पत्नी सरकारी अस्पताल में भगवान भरोसे क्यों मरती। अगर मर भी जाति तो सरकार की हजारों एंबुलेंस क्या इसे घर तक छोड़ के नहीं आतीं। जरूर इसने मदद नहीं मांगी होगी। किसी नेता से फोन भी नहीं कराया होगा। पक्का बदमिजाज होगा। मरे हमें क्या!

वोट बैंक नहीं होता सवर्ण

दलित वोट बैंक, पिछड़ा वोट बैंक, मुस्लिम वोट बैंक।
लेकिन आपने कभी सवर्ण वोट बैंक का नाम सुना है।
नहीं न!
सवर्ण समझदार वोटर होते हैं। ये वोट बैंक नहीं है। हो भी नहीं सकते। यह पढ़े—लिखे और खानदानी होते हैं। यह जाति, पैसे, क्षेत्र और विचारधारा के आधार पर वोट नहीं देते। सिर्फ विकास, शांति, सुरक्षा, सुविधा, रोजगार देने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं। सही और अच्छे प्रत्याशी चुनते हैं।
लेकिन दलित, पिछड़े और मुसलमान वोट देने में पैसा, जाति, क्षेत्र, गोत्र, संप्रदाय, विचाारधारा देखते हैं। वह पिछड़ेपन, दंगा, हिंसा, असुरक्षा, असुविधा, महंगाई, बीमारी और बलात्कार फैलाने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं।
अब आप पूछेंगे, ये कौन कहता है?
भारतीय मीडिया कहता है जी। उन दफ्तरों में बैठे पत्रकार कहते हैं जी। जिसको भरोसा न हो वह हिंदी पत्रकारों की एक खुली डिबेट रखे पता चल जाएगा कि हमारी पत्रकारिता और पत्रकार किस खेत की मूली है।

Jul 14, 2016

क्या आप इस खबर को देश की खबर बनाएंगे


देश की सबसे बड़ी इलेक्ट्रानिक कंपनियों में शुमार 'एलजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' की नोएडा यूनिट में 11 तारीख से करीब 620 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कर्मचारियों ने हड़ताल प्रबंधन की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ की है। 

लेकिन एक लाइन भी किसी मीडिया में कोई खबर नहीं है। हड़ताल में शामिल दर्जनों माएं, बहनें कई दिनों से अपने घर नहीं लौटी हैं, इनमें कई छोटे बच्चों की मांए भी हैं। एलजी कर्मचारी मनोज कुमार से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने स्थानीय मीडिया को बुलाया भी पर किसी ने कोई एक पंक्ति की खबर नहीं लिखी। 

कर्मचारी और प्रबंधन के बीच टहराहट बहुत मामूली मांगों को लेकर है। कर्मचारियों की मांग है कि उनकी शिफ्ट 8 घंटे की जाए जो कि अभी 12 से 13 घंटे की है। साथ ही कर्मचारी चाहते हैं कि डीए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाए।

कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया।

प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद, जम्मू, मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले।

पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं, इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।

Jul 12, 2016

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं

गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं है। तीन दिन हो गए लेकिन जाकिर के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नहीं हो पाई। जाहिर है अबतक एफआइआर लायक भी अपराध साबित नहीं हो पाया। पर माहौल ऐसा बना दिया कि जाकिर मिल जाए या उसकी शक्लो—सूरत वाला कोई और भी मिल जाए तो लोग उसे मौके पर मार डालेंगे। सरेराह, सरेबाजार चौराहे पर फैसला सुना देंगे।

सोचिए, राजनीति की यह कैसी खतरनाक रवायत शुरू हो रही है। अबतक यह प्रैक्टिस आतंकवाद मामले में पकड़े गए लोगों को लेकर थी। धमाके हुए नहीं कि बिना सोचे—समझे जो मिले उसे उठा लो, आतंकी बना दो और जब झूठ बेपर्द हो जाए तो 10—20 साल बाद उस शख्स की जिंदगी जहन्नुम बनाकर बाइज्जत रिहा कर दो। बाद में अदालतें या खुद जांच एजेंसियां थोड़ी सख्त हुईं तो इस पर हल्की से रोक लग पाई है पर बीजेपी ने इसका दायरा बढ़ा दिया है।

कांग्रेस के काल में धमाकों में या विद्रोहियों को बिना सबूत अपराधी करार दिया जाता था पर अब बोलने वालों के खिलाफ भी वही बर्ताव होने लगा है। बीजेपी ने दो साल में इसे सरकार चलाने की परंपरा के तौर पर स्थापित किया है। लव जेहाद, घर वापसी से शुरू हुआ सफर अब नाइक तक पहुंचा है।

आप याद कीजिए तीन—चार महीने पहले जेएनयू में क्या हुआ? उससे पहले दादरी कांड में क्या हुआ। मतलब टेप आया नहीं, भाषण क्या हुआ पता नहीं, मांस की जांच हुई नहीं पर घर—घर में छात्रों के देशद्रोही होने के ​सर्टिफिकेट पहुंचा दिए गए और जन—जन जान गया​ कि अखलाक के घर में गाय का मांस ही था।

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में इस कदर दुष्प्रचार कर नफरत फैलाई गयी कि वह आसानी से आज भी खुला नहीं घूमते, उनपर कोई सांप्रदायिक सनकी कभी भी हमला कर सकता है। बावजूद कि सभी रिपोर्ट्स में उनका कोई कसूर  किसी भी तरह से साबित नहीं हो पाया है।

सवाल है कि पुलिस, जांच, अदालत या सरकार से पहले ये कौन सी नई ताकत है जो आपकी जुबान को अपने दिमाग का गुलाम बनाकर सांप्रदायिकों की एक ऐसी भीड़ खड़ी कर रही है जहां बहस—मुबाहिसा का कोई चांस ही नहीं है। आरोप लगता है और अपराधी करार दिया जाता है। तानाशाही विरोधी शब्दों लेकिन, किंतु, परंतु का स्पेस ही खत्म हुआ जा रहा है।

भाजपा के इस खास तरीके को समझना होगा। उसे लगता है कि वैचारिक स्तर पर हो या सांस्थानिक रूप से देश पर कब्जा करने का यही तरीका है— भले ही देश, देश ही न रह जाए,  दंगाईयों और रक्त पिपासुओं की सनकी भीड़ ही क्यों न बन जाए। भाजपा और मोदी सरकार की इन जनविरोधी आदतों को ताकतपूर्वक रोकना होगा, अन्यथा देश की तबाही में ये हमें गवाह बनाके छोड़ेंगे। 

Jul 11, 2016

तुम मेरी वाली लिखो

दो—तीन दिन पहले मेरे बेटे ने पूछा, 'क्या कर रहे हो पापा?
मैंने कहा, कुछ लिख रहा हूं।
'क्या लिख रहे हो'
एक स्टोरी।
'कौन सी'
है एक, उसे ही।
'तो तुम मेरी वाली लिखो। मेरी वाली तुम लिखते ही नहीं।'
अपनी कहानी खुद लिखनी होती है मेरे बच्चे।
'पर मैं अभी छोटा हूं और केजी में हूं। कैसे लिखुंगा। तुम्हें मालुम तो है?'
तो तुम जाओ पेंटिंग करो।
'मुझे नहीं करनी। मेरी कहानी लिखो। मम्मा भी नहीं लिखती।'
तुमने मम्मा को बताया?
'हां, पर वह सुनती ही नहीं। बस हंस देती है।'
अच्छा मुझे सुनाओ अपनी कहानी।
'शेर—चूहे वाली है'
ओह! वही वाली जिसमें चूहा जाल काट कर शेर को बचाता है। उसे क्या लिखना, सब जानते हैं। तुम्हारी किताब में भी है।
'अरे नहीं। दूसरी है। इसमें चूहा शेर को मार देता है।'
चूहा, शेर को मार देता है। गज्जब! वह कैसे?
'शेर, चूहे को खाता है इसलिए मर जाता है'
शेर, चूहा खाता है। हा...हा। ऐसा क्यों, मेरे बच्चे!!!
'क्योंकि शेर को चूहे पर बहुत तेज गुुस्सा आता है।'
ओह! पर शेर को चूहे पर गुस्सा क्यों आता है? वो भी इतना कि वह चूहे को खा ही जाए।
'शेर को चूहे पर गुस्सा इसलिए आता है कि जब भी शेर शिकार करने जाता है, उससे पहले ही चूहा वहां पहुंचकर सब जानवरों को बता देता है कि शेर तुम्हें खाने के लिए आ रहा है और जानवर भाग जाते हैं।'
हा...हा। अबे, ऐसी कहानी तुमने कब बनायी। मैंने तो सुनी नहीं ये वाली।
'यही तो है मेरी वाली।'
अच्छा ये बताओ, शेर मर क्यों जाता है चूहा खाकर?
'इसलिए मर जाता है क्योंकि चूहा तो कुछ भी काट सकता है न। शेर जैसे ही चूहे को खाता है, चूहा शेर का गला काटकर बाहर निकल आता है और शेर मर जाता है। सुन ली न कहानी...चलो अब लिखो।'