Apr 14, 2016

6 लाख गावों के देश में क्या एक गांव हैं जहां दलितों के साथ छुआछूत नहीं होती

देश के आखिरी आदमी के नेता आंबेडकर की इतनी ऊँची बोली पहली बार लगी है। जिसे देखो वही आंबेडकर को अपनी ओर घसीट रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि राजनीतिक पार्टियों का यह ह्रदय परिवर्तन उनको बाजार में नीलाम करने लिए है या फिर मंशा कुछ और है। 

ऐसे में मैं इस आशंका से उबरने के लिए एक जानकारी चाहता हूँ कि क्या आप 6 लाख गावों के इस देश में छह गांव भी ऐसा सवर्णों का जानते हैं जहाँ दलितों के साथ भेदभाव और छुआछूत नहीं होती। छह छोड़िये एक ही बता दीजिये। अगर नहीं तो आंबेडकर को अपने-अपने पाले में घसीटना छोड़कर पहले एक ऐसा गांव बनाइये और भरोसा रखिये वहां आंबेडकर खुद चलकर आ जायेंगे, आपको ईंट पर खड़ा होकर खुद को आंबेडकरवादी होने की बांग नहीं देनी पड़ेगी। 

तीन दिन पहले दिल्ली के कॉफी हाउस में मिले एक मित्र आंबेडकर जयंती से जुड़ा एक किस्सा सुनाने लगे। बताया कि तीन—चार साल पहले इलाहाबाद में आंबेडकर जयंती पर एक कार्यक्रम था। कार्यक्रम खत्म हो गया तो हमलोग कार्यक्रम के आयोजक के घर चाय—पानी और समीक्षा बैठक के लिए पहुंचे। हमलोग कमरे में अंदर बैठे थे और आयोजक का ड्राईवर बाहर ओसारे में था। 

पर उसे हम कमरे से साफ देख सकते थे। हमने देखा कि आयोजक का नौकर जैसे ही चाय लेकर ड्राईवर के पास आया, ड्राईवर तत्काल खड़ा हुआ, ड्राईवर ने दिवार के बीच बने झरोखों में हाथ डाला, एक कप निकाली, नौकर को रूकने को बोला, दौड़कर नल पर पहुंचा, कप धोई, चाय लिया, चाय पी और फिर कप धोकर वापस झरोखों में रख दिया।

किस्सा सुनाने वाले मित्र थोड़ा रूककर बोले, 'यह कमरे के बाहर का सीन था और अंदर आयोजक लगातार हमलोगों को आंबेडकर दृष्टि अपनाने पर जोर दे रहे थे।'

Apr 13, 2016

अधिक पैसा मिला तो आधा किलो दाल ​खरीदूंगा

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश के रामपुर से बरेली जाने के रास्ते में शीशगढ़ बाजार में हमारी मुलाकात राजेश लोध से एक किराने के दुकान पर हुई। वह बाजार के बगल के एक भट्टे पर काम करते हैं। परिचय के बाद उन्होंने अपने परिवार की हालत कही और बताया कि रोज वह सौ—सवा सौ रुपए कमा लेते हैं। पर ईंट लादने—उतारने में कई बार चोट लग जाती है या किसी दिन बहुत हरारत होती है तो काम पर नहीं जा पाते। 
राजेश लोध के मुताबिक, 'मैं आठ बरस की उम्र से काम कर रहा हूं। पहले भट्टे पर मिट्टी देने का काम करता था, फिर पाथने का काम किया और अब ईंट लादने का करता हूं। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि हम इस किराने की दूकान के कर्जदार नहीं रहे हों।'
दूकानदार, 'अरे तुम हमें क्यों बदनाम कर रहे हो!'
राजेश, 'बदनाम नहीं कर रहा अपनी हालत बता रहा हूं। मेरी इतनी कभी कमाई नहीं हुई कि पेट से आगे बढ़ पाएं।'
मैं, 'मगर सरकार की मनरेगा स्कीम आप जैसे गरीबों के लिए ही है। वहां क्यों नहीं कर लेते काम।'
राजेश लोध, 'मतलब नरेगा। अब बंद है। मैंने बहुत दिनों से नाम नहीं सुना उसका। पर वहां भी काम किया और पेमेंट के लिए तरस गया। नरेगा के खाते में पैसा हफ्ते भर में भी नहीं आता। पता नहीं कितने महीने लग जाते हैं पैसा आने में। तबतक कैसे जिएं। इसका भी उपाय बताना चाहिए। हमलोग रोज पेमेंट वाले हैं। नहीं मिलेगा तो स्वर्ग सिधार जाएंगे। अकेले होता फिर कोई बात नहीं थी पर तीन बच्चों और बीवी के साथ ऐसा करना पाप ही होगा। आखिर उनका आसरा मैं ही हूं न।'
मैं, 'अच्छा मान लीजिए आपकी कमाई अभी से अच्छी होने लगे फिर आप जीवन का कौन सा पहला बकाया काम पूरा करेंगे। कौन सी इच्छा पूरी करेंगे।'
राजेश लोध, 'इस सेठ के यहां से आधा किलो सफेद उड़द की दाल खरीदेंगे। बीबी से बोलेंगे अच्छे से तड़का लगाकर बनाओ और उस दिन भरपेट दाल खाएंगे। उसी भी खिलाएंगें, बच्चे तो खाएंगे ही।'
मैं, 'क्या आप अभी दाल नहीं खरीदते।'
राजेश लोध, 'ऐसा भी नहीं है। खरीद लेते हैं महीने में एकाध—बार। पर सौ—डेढ़ सौ ग्राम। आधा किलो की बात ही कुछ और होगी। वैसे तो पांच आदमी के परिवार में पाव भर दाल भी बहुत है पर आधा किलो में छक कर खाएंगे और तान कर सोएंगें।'
मैं, 'आपने कबसे दाल नहीं खाई है।'
राजेश लोध, 'पिछले साल जेठ में मेरे भाई के साले की शादी थी। बरेली—मीरगंज पड़ता है न, वहीं पे। उसी के यहां दो—तीन दिन तक रोज खाया था। अपने घर में लाते हैं मगर इतना लाते नहीं कि सबका हो सके। आप मेरे घर चलिए और देखिए बच्चे दाल को कैसे साफ करते हैं। जबतक खतम नहीं होती तबतक क्या मजाल तीनों में से कोई मुंड उठा ले।'
इतना कहने के बाद राजेश पैर को मिट्टी पर रगड़ने लगते हैं और मेरी ओर इशारा कर कहते हैं, 'इस प्सासी मिट्टी को देखिए। इस पर आसमान के चार बूंद पानी गिरा देने से इसकी तपिश कम होगी क्या, अलबत्ता भभका ही छोड़ेगी। साहब... कभी—कभार मेरी मेहरी बच्चों के खाने के बाद बर्तन में लगी दाल को आगे बढ़ा देती है। उससे यह तो है कि मुझे दाल का स्वाद याद है पर पता नहीं मेरी मेहरी को याद है भी या नहीं। साले की शादी के बाद उसने कभी बर्तन भी नहीं पोछा रोटी से।'
मैं, 'उसी में से मेहरी को भी कह देते पोछने के लिए। मिलजुल के पोछ लेते।'
राजेश लोध, 'हा...हा। उसमें कुछ होता भी है जो उसको पोछने के लिए दूंगा। मैं उसकी खुशी के लिए पोंछ लेता हूं। मेरे इतना कर देने भर से उसको बड़ा संतोष मिलता है। नहीं तो रोटी मुझे लार से ही गटकनी पड़ती है।'

Feb 24, 2016

जेएनयू छात्रों के बलात्कार का आह्वान करने वाला नहीं है दैनिक जागरण का पत्रकार

समाज में विचाारधाराओं का आपसी पूर्वग्रह इतना बड़ा होता जा रहा है कि हम किसी खबर के सच और झूठ का फैसला तथ्यों के आइने में नहीं बल्कि विचारधाराओं की अंध​भक्ति में कर रहे हैं। इस मामले में संघी या वामपंथी कई बार एक जैसे नजर आते हैं। वे तथ्यों को जांचे बिना अपने वैचारिक मान्यताओं को सच बनाकर पेश करने लगते हैं।

आज सुबह से कई वेबसाइट्स पर दैनिक जागरण से जुड़े किसी डिप्टी न्यूज एडिटर डॉक्टर अनिल दीक्षित का पोस्ट यह कहते हुए शेयर हो रहा है कि उसने जेएनयू से गिरफ्तार उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ जेल में बलात्कार के लिए कैदियों को उकसाने वाला पोस्ट लिखा है। तमाम ​वामपंथी पक्षधर, मुस्लिम इस खबर को चटर—पटर बनाकर तरह—तरह से पेश कर रहे हैं। शेयर करने वालों में कई साइट्स, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल हैं।

लेकिन इस मामले में सबसे पहले क्या होना चाहिए था। क्या दैनिक जागरण से एक बार नहीं पूछा जाना चाहिए था कि क्या उनका यह पत्रकार है और उस पर संस्थान ने क्या कार्रवाई किया। या अगर सीधे नहीं पूछ सकते थे तो एक बार किसी पत्रकार से ही जान लेते। पर हममें से किसी ने यह नहीं किया। बस मान्यता के आधार पर समझ बना ली कि जागरण का पत्रकार होगा तो संघी ही होगा और ऐसा ही लिख सकता हैै।

जागरण से मिली जानकारी के मुताबिक इस नाम का कोई डिप्टी न्यूज एडिटर उनके संस्थान में नहीं है। और ​अनिल दीक्षित ने भी प्रोफाइल में 'फॉर्मर डिप्टी न्यूज एडिटर' लिखा है। प्रोफाइल के मुताबिक अनिल दीक्षित पेशे से वकील होने का दावा करते हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही कि यह गलती वामपंथियों के बड़े धड़े से कैसी हुई। क्या वह धीरे—धीरे ​दक्षिणपंथी मुर्खतवाद के शिकार होते जा रहे हैं और उन्हें भी लगता है कि विचारधारा की मजबूती के लिए फर्जी जानकारियों और पूर्वग्रहग्रस्त तथ्यों का सहारा लिया जाना चाहिए।

या फिर वह एक एनडीटीवी को अपना मानकर बाकी मीडिया को अपना दुश्मन समझ बैठे हैं। 

यहां इस जवाब का कोई मतलब नहीं है कि पहले उसकी प्रोफाइल में दैनिक जागरण ही लिखा था। कल को कोर्इ् अपनी प्रोफाइल पर कुछ भी लिख दे तो आप उसके लिए किसी संस्थान को जिम्मेदार कैसे मान लेंगे और बिना जांचे - परखे  गुट बनाके उसको बदनाम करने में जुट  जाएंगे।

Feb 17, 2016

‘व्यभिचारी का बिस्तर’ बनने से बाज़ आये दिल्ली पुलिस

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह जनवादी लेखक संघ

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, इन दोनों से जुड़े मामलों में आरएसएस-भाजपा और उसके इशारे पर काम करती दिल्ली पुलिस का रवैया बेहद चिंताजनक है. हिन्दुत्ववादी ताक़तें संविधान को ताक़ पर रखकर राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए हर तरह की असहमति को कुचल देने पर आमादा हैं. 

दिल्ली पुलिस के लिए गोया क़ानून की किताब का कोई मतलब नहीं रह गया है और वह सीधे-सीधे अपने राजनीतिक आक़ाओं से दिशा-निर्देश ले रही है. जेएनयू से जिस तरह छात्र-संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ़्तार किया गया, जिस तरह पटियाला हाउस कोर्ट में वकील की वर्दी पहने आरएसएस के गुंडों ने पत्रकारों और विद्यार्थियों के साथ मारपीट करके उन्हें बुरी तरह घायल किया और पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रही, जिस तरह पुलिस कमिश्नर ने उस भयावह घटना को ‘मामूली झड़प’ बताकर किनारे करने की कोशिश की, एफ़आइआर दर्ज करने में ना-नुकर की गयी और अंततः सभी चेहरों की पहचान होने के बावजूद ‘अज्ञात व्यक्तियों’ के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज की गयी—ये सब इस बात का शर्मनाक सबूत हैं कि कानून के रक्षक ही उसके भक्षक की भूमिका में उतर आये हैं. 

पटियाला हाउस कोर्ट की घटना को मामूली झड़प साबित करने के लिए केन्द्रीय गृह-राज्यमंत्री किरण रिजिजू का यह कहना कि ‘वहाँ कोई मर्डर तो नहीं हुआ था ना’, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. उधर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अफज़ल गुरु की याद में हुए आयोजन में जो नारे लगे, उसके आरोप में आयोजन से जुड़े होने के नाम पर दिल्ली विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया से सम्बद्ध कई बुद्धिजीवियों-पत्रकारों को पुलिस लगातार परेशान करती रही. 

उन्हें संसद भवन थाने में बुलाकर पूछताछ के नाम पर आधी-आधी रात तक बिठाए रखने का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा और अभी भी जारी है. इनमें प्रो. अली जावेद, प्रो. निर्मलान्शु मुखर्जी और सेवानिवृत्त प्रो. विजय सिंह के अलावा श्री राहुल जलाली और नसीम अहमद क़ाज़मी भी शामिल हैं.

एक ओर बहुत कमज़ोर आधारों पर विद्यार्थियों तथा बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की सख्त कार्रवाई और दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी ताक़तों की साजिशों तथा उनके द्वारा कानून के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन-अनादर के प्रति दिल्ली पुलिस का बेहद नरम रवैया—यह दिखाता है कि जिन पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दारोमदार है, वे ही उसकी धज्जियां उड़ाने का साधन बन रहे हैं. मुक्तिबोध की पंक्तियाँ याद करें तो यह किसी व्यभिचारी का बिस्तर बन जाने जैसा है. 

आरएसएस-भाजपा और उससे जुड़े अनगिनत छोटे-बड़े संगठन हास्यास्पद तरीक़े से, झूठ और फ़रेब का सहारा लेकर देशद्रोह का आरोप मढ़ते हैं और पुलिस उस दिशा में सक्रिय हो जाती है जिधर उनकी उंगली उठी होती है. यह पूरा पैटर्न इतना ख़तरनाक है कि किसी भी और चीज़ को देशद्रोह की श्रेणी में रखने से पहले इसे ही देशद्रोह कहना उचित लगता है. यह देश की जनता के ख़िलाफ़ है, देश के संविधान और कानून के ख़िलाफ़ है, विवेक और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ है, बहुलता और विविधता में एकता के उन मूल्यों के ख़िलाफ़ है जिन पर भारतीय गणतंत्र की नींव रखी गयी है.

केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और इन दोनों को अपने फौलादी नियंत्रण में चलाती आरएसएस-भाजपा की कारगुजारियों की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. जनवादी लेखक संघ यह मांग करता है कि विद्यार्थियों, पत्रकारों पर हमला करनेवाले—जिनमें भाजपा विधायक ओ पी शर्मा भी शामिल हैं—अविलम्ब गिरफ्तार किये जाएँ, कन्हैया कुमार को रिहा किया जाए, जनेवि में पुलिस की अवांछित दखल पर रोक लगे, और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के आयोजन के नाम पर महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का पुलिसिया उत्पीड़न बंद किया जाए.

Feb 16, 2016

'कन्हैया की मां कहती हैं, मेरी आत्मा बेटे के साथ जेल में बंद है'

गोरे अंग्रेजों ने भगत सिंह को देशद्रोही कहा, काले अंग्रेज कन्हैया को कह रहे- कन्हैया के पिता 

कन्हैया के गांव बीहट से लौटकर पुष्पराज की रिपोर्ट

भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्चविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को देश के लिए खतरा मान रहे हैं। एक तथाकथित देशद्रोही की पृष्ठभूमि को जानने के लिए मैं बेगूसराय के बीहट गांव में खड़ा हूँ।

बेगूसराय मीडिया डाॅट काॅम के संपादक प्रवीण कुमार इस समय मेरे मार्गदर्शक हैं। प्रवीण हमें बताते हैं कि यह बीहट का मसनदपुर मुहल्ला है। बिहार के पहले मुख्यमंत्री डाॅ. श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रालय में सबसे विश्वस्त मंत्री रहे रामचरित्र सिंह के पुत्र चन्द्रशेखर सिंह ने पिता से बगावत कर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा उठाया था। कामरेड चन्द्रशेखर को बिहार का लाल सितारा कहा गया। कन्हैया का घर काॅमरेड चन्द्रशेखर के घर के पास ही है। कन्हैया काॅमरेड चन्द्रशेखर के गोतिया यानी पड़ोसी हैं।
कन्हैया के माता-पिता                                                                       फोटो - पुष्पराज      
सप्ताह का सबसे चर्चित युवा
पिछले एक सप्ताह में दुनिया का सबसे चर्चित युवा बन चुके कन्हैया के घर पर स्थानीय मीडिया और समर्थकों का आना-जाना लगा है। बुजुर्ग काॅमरेड राजेन्द्र सिंह ने बताया कि आधे घंटे पहले पूर्व विधायक राजेन्द्र राजन कन्हैया के परिवारजन से मिलकर गये हैं। पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिंह कल आये थे। आज जदयू के जिलाध्यक्ष भूमिपाल राय घर आये थे। उन्होंने जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह से कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह से फोन से बात करायी है। वशिष्ट नारायण सिंह ने कहा कि ‘आप चिंता ना करें, कन्हैया के साथ पूरा देष है।’

ईंट की दीवार और खपड़ैल की छत वाले चमत्कार विहीन घर को सब गौर से देख रहे हैं। सर गणेशदत्त महाविद्यालय, बेगूसराय में रसायन शास्त्र के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक प्रो. परमानंद सिंह जानना चाहते हैं कि पुलिस ने एफआईआर में कौन सी धारायें लगायी हैं। घर के लोगों को कुछ भी नहीं पता कि कन्हैया के विरूद्ध पुलिस और कानून क्या कर रही है? देश की मीडिया जो कुछ बता रही हैं, पड़ोसी देखकर-सुनकर बता रहे हैं।

अभी दुआरे 'दरवाजे' के सामने 25 से ज्यादा लोग बैठे हैं। कुर्सियां कम पड़ रही हैं तो लोग खड़े हैं। गांव और आस-पड़ोस के लोग टीवी पर नजर रख रहे हैं। लोगों जानना चाहते हैं कि कोर्ट क्या फैसला देती है। दिल्ली के पटियाला हाउस में कन्हैया के मामले में सुनवाई होनी है लेकिन भाजपा के विधायक ओपी शर्मा और संघ के स्वयंसेवकों ने पत्रकारों और जेएनयू के शिक्षक-छात्रों पर हमला कर दिया है।

मीडिया को नहीं दी एफआइआर की कॉपी
सब लोग दुखी हैं कि आज कन्हैया को अदालत से जमानत नहीं मिली। पटियाला हाउस में क्या हो गया। कितना सही है कितना झूठ? दिल्ली की मीडिया पर गांव के लोगों को भरोसा नहीं। मैंने एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक मनोरंजन भारती से फोन कर पटियाला हाउस में क्या हुआ इसकी जानकारी ली। मनोरंजन भारती ने जब कहा कि पुलिस राष्ट्रद्रोह के आरोप की पड़ताल कर रही है। पर पुलिस ने अबतक किसी एफआईआर की काॅपी मीडिया को नहीं दी है। संभव है कि अभी तक एफआईआर दर्ज ही नहीं हुआ। घर के लोग डरे हैं कि क्या एफआईआर पुलिस की बजाय गृृहमंत्री खुद ही तैयार करेंगे?
क्रांतिकारियों की जननी बीहट    
बीहट नगर परिषद् की आबादी 70 हजार से ज्यादा है। जब बेगूसराय जिला के सभी विधानसभा क्षेत्रों पर कम्युनिस्ट पार्टी का लाल पताका लहराता था तो बेगूसराय को राष्ट्रीय मीडिया ने ‘लेनिनग्राद’ और बीहट को ‘मिनी मास्को’ की संज्ञा दी थी। कांग्रेस पार्टी की केन्द्रीय सत्ता ने बेगूसराय से कम्युनिस्ट पार्टी के सफाये के लिए बेगूसराय के ही एक तस्कर को राजनीतिक संरक्षण देकर कम्युनिस्टों पर हमला शुरू करवाया था।

राज्यपोषित अंतर्राष्ट्रीय तस्कर के हमलों का जवाब देने के लिए कम्युनिस्टों ने हथियार बंद संघर्ष किया था। उस सशस्त्र संघर्ष में सबसे बड़ी शहादत बीहट के लेागों ने दी थी। बीहट के 30 से ज्यादा क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संघर्ष में शहीद हुए। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने कभी बीहट को ‘क्रांतिकारियों की विधवाओं का गांव’ भी कहा था। आज भी शहीदों के स्मारक अतीत की याद दिलाते हैं। तब बीहट को ‘बारदोली’ कहा गया था। लेनिनग्राद के मिनी मास्को-बारदोली का बेटा कन्हैया क्या देशद्रोही हो सकता है?
    
मजदूरी करते  रहे कन्हैया के पिता
कन्हैया के दादा मंगल सिंह काॅमरेड चन्द्रशेखर के बाल-सखा थे। मंगल सिंह बरौनी खाद कारखाना में फोरमेन थे। हम जिस ईंट-खरपैल घर में कन्हैया के परिवारजन से मिल रहे हैं उसे मंगल सिंह ने 6 दशक पहले बनाया था। इसी घर में जयशंकर सिंह दो भाईयों के संयुक्त परिवार के साथ निवास करते हैं। कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह जीरोमाइल में गिट्टी-बालू ढोने की मजदूरी करते थे तो कभी जीप की ड्राइवरी भी करते थे। भूमिहीन मजदूर जयशंकर सिंह ने गरीबी की वजह से हायर सेकेण्डरी से आगे की पढ़ाई नहीं की।

जयशंकर सिंह कठोर श्रम करने वाले एक मेहनतकश थे। मजदूर अगर ज्यादा पैसे कमाने के लिए 8 घंटे से ज्यादा श्रम करे तो अतिश्रम से मजदूर अपनी मानवीय शक्ति का दोहन ही करेगा। जयशंकर सिंह को 2009 में लकवा मार गया। लकवे के मरीज को बेहतरीन इलाज और बेहतरीन पोषण चाहिए। गरीबी और जेहालत में ऐसा मुमकिन नहीं था। जयशंकर सिंह अपने पांव से चल नहीं सकते हैं इसलिए अंधेरे भरे कमरे में ही इनसे मिलना अच्छा?

मैंने पूछा क्या लकवा की कोई दवा इस समय ले रहे हैं? नहीं, भरपेट भोजन और परहेज ही दवा है। हंसते हुए कहा-दवा के लिए नाजायज पैसे कहां से आयेंगे। मैं जीवन में पहली बार ऐसे इंसान से मिल रहा हूँ जो अपने लिए जरूरी दवा को नाजायज मान रहा है। संभव है कि दवा और सही पोषण से जयशंकर सिंह स्वस्थ हो जायें लेकिन दवा के लिए नाजायज पैसा कहां से आये? पत्नी मीणा देवी आंगनबाड़ी सेविका हैं तो 3 हजार रुपये मासिक हर माह घर आते हैं। एक बेटा, कन्हैया का बड़ा भाई मणिकांत असम के बोगाई गांव में एक कारखाने में 6 हजार रुपये मासिक की कमाई करता है।

हम कम्युनिस्ट हैं यही पाप हो गया 
पिता जयशंकर सिंह​ किशोर उम्र से कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर हैं। अभी भी कार्ड होल्डर हैं। माता मीणा देवी भी समर्पित काॅमरेड हैं। कन्हैया के पिता मुझसे पूछते हैं, हम कम्युनिस्ट खानदान से हैं क्या यही पाप हो गया? दूसरे लोग इन्हें मना करते हैं, नहीं ऐसी बात नहीं सोचिए। भगत सिंह को अंग्रेजों ने राष्ट्रद्रोही कहकर ही फांसी पर लटका दिया था। आज आजाद भारत की सरकार मेरे बेटे को राष्ट्रद्रोही कह रही है। हंसते हुए कहते हैं-मेरे बेटे ने जेएनयू पर एबीवीपी को कब्जा नहीं करने दिया तो अब एबीवीपी बदला सधा रही हैं। मैं अपनी कमाई से जीवन में एक ईंट नहीं जोड़ पाया पर आज गर्व है कि मैं भगत सिंह के रास्ते पर खड़े कन्हैया का पिता हूँ।

 कन्हैया के पिता को गर्व है कि हम खानदानी कम्युनिस्ट हैं। मेरा बेटा अगर कम्युनिस्ट नहीं होता तो उसे राष्ट्रद्रोही नहीं कहा जाता। दिल्ली से पुलिस कमिश्नर का फोन आया कि आपके बेटे को राष्ट्रद्रोह में जेल भेजा जा रहा है। मैंने कहा-‘आप गलत कर रहे हैं, मेरा बेटा किसी कीमत पर राष्ट्रद्रोही नहीं हो सकता है।’ मां मीणा देवी कहती हैं, मेरी आत्मा बेटे के साथ जेल में बंद है। हमारी इच्छा होती है कि हम उड़कर बेटे को देखने चले जायें लेकिन मेरी टांग पर ही बीमार पति की जिंदगी है। आजू-बाजू के लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिहार में विपक्ष के नेता चन्द्रशेखर को गांधी मैदान की हजारों की सभा में कांग्रेस के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय ने गुंडों से पीटवाकर अधमरा कर अस्पताल भेज दिया था। अगर चन्द्रषेखर कम्युनिस्ट पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गये होते तो वे बिहार के मुख्यमंत्री होते। कम्युनिस्ट राजनीति करोगे तो मार खाओगे, राष्ट्रद्रोही कहलाओगे। कन्हैया के घर पर जुटे कन्हैया को चाहनेवाले कहते हैं-बीहट का यह लाल सितारा लाल किले पर झंडा फहरायेगा।

यह भूमिहीन भूमिहार का परिवार है...
कन्हैया का घर : एक क्रन्तिकारी विरासत                                    फोटो - पुष्पराज
प्रिंस कुमार कन्हैया से 2 वर्ष छोटे हैं। पैसों का जुगाड़ न हो पाने की वजह से पिंस ने पत्राचार पाठ्यक्रम से एम काॅम की पढ़ाई की है। प्रिंस बताते हैं कि कन्हैया हर हाल में पढ़ना चाहता था इसलिए वह हर तरह की तकलीफ झेलता हुआ जेएनयू पहुंच गया। प्रिंस सरकारी नौकरियों की तलाश में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं पर ये सोचते हैं कि हमारे पूरे परिवार की पहली प्राथमिकता कन्हैया की पढ़ाई ही हैं। मैंने जानना चाहा कि परिवार में जमीन-जायदाद कुल कितनी है। प्रिंस ने बताया कि हमारे परिवार में कभी इतनी जमीन नहीं रही कि बेच सकें या पैदावार से चूल्हा चल सके।

कुछ बीघे जमीन थी, जो गड़हरा यार्ड और फर्टिलाइजर के लिए 1955-1960 में ही अधिग्रहित हो गयी। काॅमरेड राजेन्द्र सिंह कहते हैं-भूमिहीन-मजदूर भूमिहार को सवर्ण मानकर जिस तरह बर्ताव किया जाता है, उससे बेहतर है कि ऐसे दीनहीन भूमिहारों को दलित कहा जाये। गांव के लोग इसलिए भी एकजुट हैं कि बजरंग दल और विहिप ने धमकी दी है कि कन्हैया के घर के सामने कन्हैया का पुतला जलाया जायेगा। पुलिस की नाकेबंदी की वजह से कल वे बीहट नहीं घुस पाये तो जीरोमाइल पर कन्हैया का पुतला जलाकर लौट गये। लोगबाग दुखी हैं कि बीहट के रत्न का पुतला जलानेवाले कितने सिरफिरे हैं। एक काॅमरेड कहते हैं-मार्क्स ने कहा था-धर्म अफीम है। धर्म के आधार पर मुल्क को बांटने वाली नरेन्द्र मोदी की राज्यसत्ता क्या अफीम खाकर देष के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष को राष्ट्रद्रोही कह रही है।

हमारी ताकत मुख्यमंत्री
कन्हैया के घर से छूटते हुए पड़ोसी स्त्रियां टीवी देखकर कन्हैया के घर कर्णप्रिय संदेशा लेकर आयी हैं। मुझसे कन्हैया की माता मीणा देवी बताती है कि बिहार के मुख्यमंत्री मेरे साथ हैं तो मुझे ताकत मिली है। मुख्यमंत्री मेरे साथ हैं, यह गरीब के लिए खुषी और गर्व की बात है। मुझे पक्का भरोसा है कि अब मेरा बेटा जेल से बाहर आ जायेगा और राष्ट्रद्रोह के मुकदमे से मुक्त हो जायेगा। मैं उन सबको धन्यवाद देती हूँ, जो मेरे बेटे के साथ खड़े हैं।
मुल्क के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी आप गरीब के आंसू की कीमत नहीं जानते हैं। गरीब के आंसू पानी नहीं तेजाब होते हैं। आप एक भूमिहीन, लकवाग्रस्त, मजदूर-गरीब के बेटे को देशद्रोही कहते हैं। आप झूठ बोलते हैं तो आपकी जीभ नहीं कटती है, हम झूठ लिखेंगे तो हमारे हाथ कट जायेंगे।