Last Update : 07 12 2017 08:21:44 PM

ज्ञान के लिए नहीं मुनाफे के लिए बच्चों को रोगी बना रहे स्कूल

अधिक मुनाफा कमाने को स्कूल और प्रकाशन कंपनियों की सांठ-गांठ से स्कूल बैग भारी होते चले गए। एक ही विषय की 3 - 4 किताबें 3 - 4 कॉपियों ने बच्चों की कमर और गर्दन को खराब करना शुरू कर दिया है...
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संजय रावत की विशेष रिपोर्ट

अर्थराइटिस हड्डियों की एक ऐसी बीमारीं है जो एक बार हो गई तो फिर सुकून से बैठने, उठने और चलने फिरने भी नहीं देती । इस बीमारी के कारण तो ऑर्थोपेडिक ही बेहतर बताएंगे पर बच्चों में इस बीमारी के लिए 3 कारक काम कर रहे है । पहला स्कूल, दूसरा प्रकाशन कमनीयां और तीसरा खुद अभिभावक । डॉक्टर बताते हैं कि पहले 20 वर्ष आयुवर्ग से ऊपर के बच्चे ही हड्डी संबंधी रोगों के लिए अस्पताल जाते थे पर अब तो 10 वर्ष आयुवर्ग के बच्चे अस्पतालों के चक्कर लगा रहे है । वजह एक ही है, स्कूल के भारी भरकम बस्ते ।

अधिक मुनाफा कमाने को स्कूल और प्रकाशन कंपनियों की सांठ-गांठ से स्कूल बैग भारी होते चले गए। एक ही विषय की 3 - 4 किताबें 3 - 4 कॉपियों ने बच्चों की कमर और गर्दन को खराब करना शुरू कर दिया है। यानी कि जरूरत से 4 गुना बोझ बच्चों की पीठ और अभिभावकों की जेब पर बढ़ा है ।

स्कूलों को प्रकाशक लाखों रुपये देकर अपनी किताबें लगवा देते है। हल्द्वानी के एक स्कूल मालिक की मानें तो वे प्रकाशकों का हर वर्ष 16 लाख रुपया इसलिए ठुकरा देते हैं ताकि बच्चों और अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ ना पड़े। ऐसे में कल्पना कीजिये कि नाजायज पूंजी के लिए किस तरह नोनिहलों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है तमाम स्कूल ।

यहां अभिभावकों की उदासीनता भी इस संस्कृति को बढ़ावा देती है। अभिभावक पढ़ाई-पढ़ाई के नारे के साथ बच्चों का दम निकाले रहते है पर स्कूल प्रबंधन से ये भी नही पूछते कि आखिर एक ही विषय की इतनी किताब कॉपियों का क्या मतलब है। इस मामले पर डॉक्टर्स की राय भी जान लेनी चाहिए कि आखिर कितना बोझ नॉनिहलों की कमर और गर्दन के लिए उपयुक्त रहता है ।

कुछ विशेषज्ञों से हमने बात की 
डॉक्टर पुनीत अग्रवाल ने कहा कि ऐसी कोई गाइड लाइन शाशन की तरफ से नहीं है, पर मेडिकल साइंस के मुताबिक बच्चों को उनके खुद के भार का 10 से 15 प्रतिशत ही उठाना चाहिए । अधिकतम 20 प्रतिशत , इससे ज्यादा भार का मतलब है अर्थराइटिस को जबरदस्ती बुला लेना ।
यानी आपके बच्चे का वजन 30 किलोग्राम है तो उसका स्कूल बैग 6 किलोग्राम से ज्यादा का नहीं होना चाहिए । पर इस वजन के बच्चों के स्कूल बैग 10 किलोग्राम या उससे ज्यादा भी निकल रहे है ।

बेस चिकित्सालय हल्द्वानी की फिजियोथेरेपिस्ट शिल्पा तिवारी ने बताया कि बच्चों की हड्डियां मुलायम और लचीली होती है इसलिए बच्चों का उनके वजन का 10 प्रतिशत से ज्यादा भार उठाना ठीक नहीं । इसीलिए अब अस्पताल में 15 से 19 साल के बच्चे गर्दन और पीठ के समस्या लेकर आने लगे है ।

शहर के सीनियर ऑर्थोपेडिक डॉ. जे.एस. खुराना ने सहज तरीके से कहा कि कितना और कैसे पर बाद में बात करेंगे, मैं जानना चाहता हूं कि तकनीकी दौर में स्कूल बैग की प्रथा ही खत्म हो जानी चाहिए । क्या जरूरत है बच्चों को अब लद्दू घोड़ा बनाने की । किताबें इतनी ही जरूरी हैं तो स्कूल में सेल्फ होने चाहिए या लॉकर जैसी सुविधा दीजिये । बच्चों की हड्डियां दरअसल स्पंजी होती है अधिक भार से आकर बदल लेती हैं जो आजीवन कष्ट का कारण बनती हैं ।

बच्चों में आर्थ्राइटिस के लिए जिम्मेदार स्कूलों और प्रकाशन कंपनी के इस खेल में अभिभावकों की उदासीनता कोढ़ में खाज जैसी है । कॉपी किताबों पर स्कूलों के 20 से 25 प्रतिशत का लालच बच्चों के स्वस्थ से खिलवाड़ साबित हुआ है ।

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Posted On : 07 12 2017 08:21:44 PM

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