Last Update : 17 07 2017 11:20:32 AM

पहले गोरखाओं का इतिहास पढ़ो, फिर खोलो जुबान

भारतीय नस्लवादी मानसिकता के लोग और नेता गोरखाओं का चेहरा और बोली देख उन्हें भले ही चीन और नेपाल का करीबी होने जैसी मूर्खतापूर्ण बातें सोचें, लेकिन देशप्रेम की कसौटी पर शायद ही उनसे कोई खरा उतरे...

विष्णु शर्मा

भारत में हर अल्पसंख्यक समुदाय जो अपने अधिकार की बात करता है वह आज शक के घेरे में है। इस फेहरिस्त में अब एक नया नाम और जुड़ गया है: भाषाई रूप से अल्पसंख्यक गोरखा समुदाय का। पिछले दो सौ सालों से इस इस देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व और खाड़ी देशों में जा कर लड़ने वाले और आजाद भारत की सभी लड़ाइयों में वीरता के उच्च तमगे प्राप्त करने वाले गोरखा लोग आज जब अपने अधिकार को लेकर दार्जिलिंग में संघर्ष कर रहे हैं तो राज्य की त्रिणमूल कांग्रस सरकार उनसे बात कर समाधान तलाशने की जगह उन्हें 'चीन प्रायोजित आंदोलनकारी ब्रांड' करने में लगी है।

हाल में राज्य का गृह मंत्रालय लगातार गोरखालैंड में चीन की ‘घुसपैठ’ को लेकर चिंता व्यक्त कर रहा है और केन्द्र को इस चिंता से अवगत करने के लिए पत्र लिख रहा है। राज्य सरकार ऐसा माहौल बना की कोशिश में है जिससे आंदोलनकारियों के घोर दमन को राष्ट्रहित में बताकर इस अति संवेदनशील राष्ट्र की आत्मा को जगाया जा सके और दमन को जायज बताया जा सके।

पृथ्क राज्य की मांग को लेकर भारत में लगातार संघर्ष हुए है और गोरखालैंड की मांग कोई अनोखी मांग नहीं है। सन 2000 के बाद भारत में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखंड और तेलंगाना राज्यों का गठन हुआ। महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्य प्रदेश में गोंडवानालैंड एवं अन्य स्थानों में भी भाषाई और अन्य आधारों में राज्यों के गठन की माग उठती रहती है जो स्वाभाविक भी है।

छोटे राज्यों के निर्माण से सत्ता का स्वरूप अधिक समावेशी बनता है और जातीय और अन्य ऐतिहासिक कारणों से पीछे रह गए लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलता है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड इसके उदाहरण हैं। सत्ता में लंबे समय से जारी वर्चस्व का टूटना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत होता है। गोरखालैंड आंदोलन भी सामान्यतः इसी बुनियादी समझदारी की अभिव्यक्ति है।

आज जिस भारत के नक्शे को देख कर राष्ट्रवादी लोग भावुक हो जाते हैं उस नक्शे के निर्माण में भारत के गोरखाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इतिहास का अन्याय देखिए कि इस देश की स्मृतियों में उनकी इस भूमिका को भुला दिया और गोरखा को ‘बहादुर’ ‘साब जी’ जैसे अपमानित करने वाले जुमलों का पर्यायवाची बना दिया गया।

इस लेखक के हाथ में आकाशवाणी के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय मणी प्रसाद राई की एक महत्वपूर्ण कृति ‘वीर जातिको अमर कहानी’ है जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन में गोरखा समुदाय को लेखक ने अपने निजी प्रयासों और संसाधनों से दर्ज करने की कोशिश की है। 64 अध्यायों वाली इस पुस्तक में भारत के उन गोरखाओं के बारे में बताया गया है जिन्होने आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से योगदान किया।

पुस्तक में कप्तान रामसिंह ठाकुर के बारे में बताया गया है कि 15 अक्टूबर 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रामसिंह ठाकुर को गुरूदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर के ‘जन गण मन’ को हिन्दी में रूपांतरित कर संगीतबद्ध करने का आग्रह किया। 21 अक्टूबर 1943 को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार के गठन के समय शपथ ग्रहण से पूर्व राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने के समय रामसिंह की धुन में कौमी तराना बजाया गया। आजाद भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ में इसी धुन का प्रयोग किया गया है।

शायद यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि भारत के जिन भूभाग में आज गोरखा समुदाय का बाहुल्य है उनमें से अधिकांश भूभाग 1815-16 तक गोरखा साम्राज्य का हिस्सा था। धर्मशाला, देहरादून-मसूरी, शिमला और पूर्वोत्तर में दार्जिलिंग और अन्य भाग गोरखा साम्राज्य का हिस्सा थे जो एंगलो-नेपाल युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में मिला लिए गए।

इस युद्ध में गोरखाओं की बहादुरी के कायल हुए अंग्रेजों ने हारे हुए गोरखाओं को अपनी सेना में सम्मानित स्थान दिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता युद्ध के बाद सेना में उन्हें सिक्ख और अन्य जातियों की तरह जो इस आंदोलन में उनकी वफादार बनी रहीं अधिक सम्मान दिया जाने लगा।

इसलिए गोरखाओं को बाहर से आ कर इस क्षेत्र में बसे लोगों की तरह देखना इतिहास का मजाक उड़ाना है। यह सच है कि नेपाल के नेपालियों में भारत के प्रति अविश्वास है। हाल के दिनों में यह अविश्वास और अधिक बढ़ा है जिसके कुछ वाजिब कारण भी हैं। उस देश की राजनीति में भारत की दखलअंदाजी ने वहां के भारत के विरोधी राष्ट्रवाद को मजबूत किया है लेकिन उसी चश्मे से भारत के मूल निवासी गोरखाओं को देखना शर्मनाक है।

तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए ममता सरकार का गोरखाओं को राष्ट्र की अखण्डता का दुश्मन करार देना अशोभनीय और बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ममता बनर्जी लगातार कहती आईं है कि उनकी सरकार निष्पक्ष है और भेदभाव नहीं करती। लेकिन बार बार गोरखा आंदोलन को चीन के साथ जोड़ना, वो भी ऐसे वक्त में जब दोकलम में चीन के साथ भारत का तनाव अपने चरम पर है, उसे एक जाति के खिलाफ खतरनाक षड्यंत्र ही कहा जाएगा। सवाल उठता है कि कहीं ममता गोरखाओं के खिलाफ किसी गंभीर साजिश की तैयारी तो नहीं कर रहीं?

Posted On : 17 07 2017 11:17:45 AM

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