Last Update : 09 07 2017 11:13:01 AM

गोर्खालैंड आंदोलन की असल मांग है सम्मान और बराबरी

गोर्खा कहते हैं राज्य से बाहर जाने पर हमें बंगाली नहीं समझा जाता है। इससे ऐसा लगता है कि हम भारतीय नहीं, नेपाल के रहने वाले हैं। हमारी राष्ट्रीय पहचान ही खो जाती है...

दार्जिलिंग से डाॅ. मुन्ना लाल प्रसाद

उत्तर बंगाल का पार्वत्य क्षेत्र दार्जिलिंग पुनः लहूलुहान होने लगा है। बंगला भाषा को अनिवार्य रूप में अध्यापन के विरूद्ध शुरू होकर यहां का यह आंदोलन एक बार फिर गोर्खालैंड की मांग की ओर अग्रसर हो चला है।

धीरे-धीरे यह आंदोलन हिंसक होता जा रहा है। पुलिस फायरिंग, आगजनी, आंसू गैस, लाठीचार्ज, तोड़फोड़ के रास्ते चल रहा यह आंदोलन कहां जाकर रूकेगा, नहीं कहा जा सकता।

एक तरफ राज्य सरकार अपनी पूरी शक्ति लगाकर इस आंदोलन को कुचलने के लिए प्रयासरत है, वहीं दूसरी ओर गोजमुमो के नेतृत्व में पार्वत्य क्षेत्र के अन्य दल या संगठन इस आंदोलन को तीव्र करने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंकने को तत्पर हैं।

ऐसा लगता है पश्चिम बंगाल सरकार और पार्वत्य क्षेत्र की आंदोलनरत शक्तियां एक दूसरे के सामने इस तरह मोर्चाबंदी करने में लगी हैं जैसे दोनों एक दूसरे के दुश्मन हों। किसी के प्रति किसी के अंदर न तो प्रेम दिखाई दे रहा है और न ही सहानुभूति और सदभावना ही।

एक राष्ट्र, एक राज्य में रहने वाले के अंदर इस तरह का भाव का आना चिंतनीय है। हमारी संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन, विचारधारा, चिंतन का अलग-अलग होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इन सबके बाद भी हम एक हैं। एक परिवार की तरह हैं।

एक परिवार में रहने वाले सदस्यों के अंदर किसी मुद्दे पर मतभेद हो सकते हैं। विचारों का मेल न होना संभव है, लेकिन फिर भी सभी सदस्यों के बीच आपसी सहयोग बना रहता है। लेकिन मुखिया का व्यवहार पक्षपातपूर्ण, दुराग्रह से भरा लगने लगता है तो उसके प्रति विद्रोह होना स्वाभाविक है।

आज इतने दिनों की शांति के बाद दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र गोर्खालैंड की मांग को लेकर फिर से सुलगने लगा है, पूरे पार्वत्य क्षेत्र में गोर्खालैंड की मांग गूंजने लगी है। कुछ ऐसे कारक हैं जिसके चलते यह क्षेत्र फिर हिंसक हो उठा है। वास्तव में दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र के रहने वाले निवासियों की अपनी एक अलग भाषा, संस्कार और संस्कृति होने के कारण वे अपने को भिन्न समझते हैं।

वे अपनी पहचान को लेकर वर्षों से आंदोलनरत हैं। उनका मानना है कि इस राज्य में उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है। यहां से बाहर जाने पर हमें बंगाली नहीं समझा जाता है। सभी नेपाली समझते हैं। इससे ऐसा लगता है कि हम भारतीय नहीं, नेपाल के रहने वाले हैं। एक तरह से हमारी राष्ट्रीय पहचान ही खो जाती है।

इसी को आधार बनाकर उन्होंने अपने को गोर्खा बताते हुए अपने लिए गोर्खालैंड की मांग शुरू की, ताकि उन्हें एक पहचान मिल सके। लोग उन्हें नेपाल का नागरिक न समझकर भारतीय नागरिक समझें, इसके लिए वे गोर्खालैंड की स्थापना को लेकर आंदोलनरत हैं। इसी पहचान के आधार पर दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र
में रहने वालों में एकजुटता कायम है।

यहां का नेतृत्व वर्ग जब चाहता है इस आंदोलन को हवा दे देता है। अब सवाल है कि अगर वास्तव में इस क्षेत्र के निवासियों को पहचान का संकट है और वे अपनी पहचान को लेकर आंदोलनरत हैं तो क्या कारण है कि यह आंदोलन कभी शांत रहता है तो कभी हिंसक हो उठता है। यह एक विचारणीय विषय है। वास्तव में देखा जाए तो यह आंदोलन अपने नेतृत्व वर्ग के राजनीति का हमेशा शिकार रहा है।

यहां के नेतृत्व वर्ग को यह भली-भांति ज्ञात है कि गोर्खालैंड की मांग यहां की जनभावनाओं से जुड़ी हुई है। जब-जब इसको हवा दी जायेगी, आंदोलन भड़क उठेगा और इसी जनभावना का वे लाभ उठाते हैं। समय-समय पर वे अपने व्यक्तिगत हित में इसका उपयोग करते हैं।

नेतृत्व वर्ग जब चाहता है, इस आंदोलन को हवा देता है और यहां की जनभावना भड़क उठती है। जनआंदोलन तीव्र होता है, लोग सड़कों पर उतर कर मरने मारने को तत्पर हो जाते हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने अनुसार अपना-अपना हित साधना शुरू करते हैं। सरकार इनके समक्ष मजबूर हो जाती है। फिर नेतृत्व वर्ग और सरकार के बीच वार्ता शुरू होती है।

सरकार अपना हित साधने का प्रयास करती है और नेतृत्व वर्ग अपना। दोनों के बीच परस्पर सुविधाओं के लेन-देन पर समझौता होता है और फिर आंदोलन शांत। अब तक कभी किसी सुविधा के आधार पर समझौता हुआ तो कभी किसी आधार पर। गोर्खालैंड की मांग ज्यों की त्यों बरकरार। नेतृत्व वर्ग सुविधाओं का भरपूर तब तक उपयोग करता रहा जब तक अवसर मिला।

जैसे ही सुविधाओं से वंचित होने का अवसर आता है फिर आंदोलन को हवा दे दी जाती है और जनता सड़कों पर उतर कर आंदोलनरत हो जाती है। यही कारण है कि कभी दागोपाप के नाम पर समझौता हुआ तो कभी जीटीए के नाम पर। अगर इन्हीं समझौतों के आधार पर आंदोलन की मांगें पूरी हो गयी तो फिर आंदोलन की क्या आवश्यकता।

इन समझौतों के बाद तो इस मांग को लेकर आंदोलन बंद हो जाना चाहिए और अगर इसी मांग को लेकर पुनः आंदोलन शुरू होता है तो इसका अर्थ तो यही है कि यह समझौता गलत था। ऐसा समझौता करना
ही नहीं चाहिए। समझौते में शामिल नेतृत्व द्वारा ही पुनः आंदोलन की कमान संभालना तो और भी आश्चर्यजनक है। किस आधार पर समझौता किया गया था कि पुनः आंदोलन करने की आवश्यकता पड़ गयी? समझौता करने के बाद समझौता तोड़ना क्या सही कदम है? फिर समझौता का अर्थ क्या रहा? उसकी अहमियत क्या रही? आंदोलनकारी जनता के मन में ऐसा प्रष्न क्यों नहीं खड़ा होता?

खूबी की बात है वर्तमान सरकार और वर्तमान गोर्खालैंड आंदोलन की कमान संभालने वालों के बीच ही समझौता हुआ था। सरकार द्वारा समझौते का क्रेडिट लेते हुए अपनी राजनीतिक सफलता का खूब ढिंढोरा भी पीटा गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बार-बार यह कहकर अपनी सफलता का बखान किया कि उनके आने के बाद उनके शासन में पार्वत्य क्षेत्र हंस रहा है। बार-बार वह यह कहती रही कि यहां के विकास के लिए वे कृतसंकल्प हैं।

यहां के विकास के नाम पर अनेक जातियों के नाम पर विकास परिषद का गठन किया और भरपूर आर्थिक अनुदान भी दिया। अब इन्हीं के शासन में पुनः आंदोलन का हिंसक होना और पुलिस द्वारा आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बरता करना बहुत सारे प्रश्न खड़ा करता है। अगर पहाड़ हंस रहा है तो उस पर बर्बरता कर रूलाने की क्या आवश्यकता है? क्या अब उनका हंसना उन्हें अच्छा नहीं लगता?

मुख्यमंत्री का कहना है कि उन्होंने यहां के विकास के लिए जो अनुदान दिया उसका दुरुपयोग किया गया है। उसकी जांच कराने के लिए उन्होंने कमिटी भी बनाकर जांच के लिए यहां भेज दिया है। आंदोलन होने पर इस तरह का प्रश्न उठाना यह प्रमाणित करता है कि अगर आंदोलन नहीं होता तो न तो इसकी जांच की जाती और न इस तरह के आरोप ही लगाये जाते।

अगर उन्हें मालूम था कि अनुदान का दुरुपयोग हो रहा है तो अनुदान देना बंद कर देना चाहिए था और आंदोलन पूर्व इसकी जांच करानी चाहिए थी। अब इस तरह कहने या करने पर कहीं न कहीं नियत पर संदेह होता है। कहीं ऐसा तो नहीं यह अनुदान इसलिए दिया गया कि इसका जो चाहे करो लेकिन मौन रहो।

यही कारण है कि कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के प्रदेश अध्यक्ष सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा है कि दादा और दादी के हठ के चलते पहाड़ जल रहा है। यानी यह दो के हठ का परिणाम है। यहां फैली हिंसा को लेकर अब आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू है। सरकार और आंदोलनकारियों की ओर से एक दूसरे के लिए चुनौतियां दी जा रही हैं। दोनों एक दूसरे के समक्ष ताल ठोक कर हिंसात्मक मुद्रा में खड़े हैं।

मुख्यमंत्री का कहना है कि इनका पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों से संबंध है। उनका मानना है कि पुलिस ने फायरिंग नहीं की, जबकि आंदोलनकारियों का कहना है कि पुलिस द्वारा 12 राउंड गोलियां चलायी गयीं। सीपीआई-एमएल लिबरेशन ने पुलिस फायरिंग की निंदा करते हुए इसकी न्यायिक जांच की मांग की है।

पार्थ घोष ने कहा है कि ममता बनर्जी विभाजनकारी राजनीति कर आग से खेल रही हैं। ऐसी दमनकारी नीति से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। केवल बातचीत से ही समस्या का समाधान संभव है।

पार्वत्य क्षेत्र की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस राह पर आंदोलनकारी एवं सरकार चल रहे हैं, उससे समस्या और विकराल होगी। ऐसी अवस्था में सबको मिलकर शांतिपूर्वक माहौल में इसका समाधान निकालना चाहिए, अन्यथा यह स्थिति किसी के लिए हितकर नहीं है।

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Posted On : 09 07 2017 11:13:01 AM

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