Last Update : 10 04 2018 10:22:36 PM

दिल्ली के सुल्तानपुरी में आग से झुलस कर 4 मज़दूरों की मौत

रात में भी मज़दूरों से अधिकाधिक काम लिया जा सके इसलिए फैक्ट्री मालिक ने फैक्ट्री की इमारत के अंदर ही मज़दूरों के लिए कमरे बना रखे थे। एक तरह से बंधुआ मज़दूरों की तरह मज़दूरों से काम कराया जा रहा था...

सुल्तानपुरी से लौटकर नागेंद्र कुमार की रिपोर्ट 

जनज्वार, दिल्ली। सुल्तानपुरी के राजा पार्क इलाके के रिहायशी कालोनी में चल रही एक जूता फैक्ट्री में 9 अप्रैल को सुबह 6.40 बजे तड़के लगी भीषण आग में 4 मज़दूरों की मृत्यु हो गयी। इस फैक्ट्री में 45 के लगभग मज़दूर काम करते थे जिनमे कई नाबालिग मज़दूर भी थे।

राजा पार्क की एक संकरी गली में स्थित यह फैक्टरी चार मंजिला थी जिसमें कुछ कमरों में मजदूर रहते थे। 9 अप्रैल की सुबह 6 बजे आग लगी। स्थानीय लोगों के अनुसार आग लगने का कारण सबमर्सिबल के तार में शार्ट सर्किट होना रहा है।

दिल्ली के ही बवाना में हुए अग्निकांड की तरह यहाँ भी मज़दूरों को ताले में बंद करके काम कराया जाता था। फैक्टरी में एक मुख्य द्वार के अलावा पीछे एक संकरा गेट था। ये दोनों द्वार आग लगने के दौरान बंद थे। मजबूरन मज़दूरों ने दूसरी मंजिल पर स्थित खिड़की के कांच का शीशा तोड़ा।

फैक्ट्री के बगल में स्थित एक पड़ोसी ने सीढ़ी लगाकर मज़दूरों को निकलने में मदद की। कुछ मज़दूरों ने तीसरी मंज़िल से सीढ़ी के सहारे तथा कुछ ने पहली मंज़िल से कूदकर अपनी जान बचाई। लेकिन सभी मज़दूर इतने सौभाग्यशाली नहीं रहे। फैक्ट्री के भूतल पर भारी मात्रा में प्लास्टिक का सामान रखा हुआ था जिसके कारण आग बहुत जल्द ही पूरी इमारत में फ़ैल गयी। आग की लपटों और धुंए में घिरकर चार मज़दूर मारे गए।

फायर ब्रिग्रेड की गाड़ियों ने साढ़े तीन घण्टे की कवायद के बाद आग पर काबू पाया। गंभीर रूप से झुलसे मज़दूरों को स्थानीय संजय गांधी अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मृतक मज़दूर उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के थे।मृतकों में एक ही परिवार के दो भाई शामिल हैं।

फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूरों में ज्यादातर उत्तर प्रदेश के आगरा व हरदोई के थे। इन मज़दूरों को वेतन न देकर पीस रेट पर मज़दूरी दी जाती थी। जूते का एक जोड़ी अपर (ऊपरी हिस्सा) सिलने पर इन्हें 32 रूपये दिए जाते थे। इस तरह मज़दूरों पर गुजारे लायक कमाने के लिए लगातार दबाव बना रहता था और वे दिन रात काम करने के लिए मज़बूर थे।

रात में भी मज़दूरों से अधिकाधिक काम लिया जा सके इसलिए फैक्ट्री मालिक ने फैक्ट्री की इमारत के अंदर ही मज़दूरों के लिए कमरे बना रखे थे। एक तरह से बंधुआ मज़दूरों की तरह मज़दूरों से काम कराया जा रहा था।

इस फैक्ट्री में काम करने वाले एक मज़दूर के मुताबिक उस दिन भी मज़दूर रात दो बजे तक काम करने के बाद गहरी नींद में सो रहे थे जिसके चलते उन्हें आग लगने का तुरन्त पता नहीं लगा। आग और धुंए से घिरने पर ही उनकी नींद खुली।उनके लिए आग और धुंए के बीच रास्ता टटोलना काफी मुश्किल था ऊपर से दरवाजों पर ताला लगा होने के कारण उनकी मुश्किल काफी बढ़ गयी थी।

सारे नियम कानूनों को धता बताकर ये फैक्ट्री इस रिहायशी इलाके में पिछले 15 साल से चल रही थी।जाहिर है पुलिस प्रशासन व् श्रम विभाग की शह व् अभयदान के बगैर यह संभव नही लगता। इस इलाके में रिहायशी कालोनी के भीतर चलने वाली यह अकेली फैक्ट्री नहीं है।

भारी संख्या में यहां फैक्टरियां है जिनमें ज्यादातर प्लास्टिक की हैं। फैक्ट्री मालिकों के राजनीतिक पार्टियों से रिश्तों व पुलिस प्रशासन में पैठ के चलते बेखटके यह सब हो रहा है। इस अग्निकांड के दिन शाम को जब इंक़लाबी मज़दूर केंद्र के कार्यकर्ता इस इलाके में पहुंचे तब भी काफी संख्या में यहाँ कारखानों में काम हो रहा था।

जाहिर है कि श्रम कानूनों की बातें आज जमीनी स्तर पर बेमानी हो चुकी हैं। मज़दूरों की जान की कीमत मशीन के एक पुर्जे से अधिक कुछ नहीं।पूंजीवादी व्यवस्था में मज़दूरों को घनघोर शोषण और मौत के सिवा कुछ नहीं मिल सकता।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गत 3-4 माह में ही बवाना,राई,नरेला,नांगलोई, मुंडका व सुल्तानपुरी सहित कई स्थानों पर फैक्टरियों में आग लगने की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमे लगातार मज़दूर मारे जा रहे हैं।

इन सब घटनाओं में फैक्ट्री मालिकों द्वारा अधिक मुनाफे हेतु मज़दूरों की जान को दांव लगाकर कारखाना अधिनियम सहित श्रम कानूनों की घोर अवहेलना का तथ्य बार बार सामने आया है। इसके बावजूद अगर फैक्ट्री मालिकों पर नाम मात्र की कार्यवाही नहीं होती और बार बार ये घटनाएं घटती हैं तो यह पूंजीवादी व्यवस्था के आदम खोर चरित्र को ही दिखता है। बहरहाल पुलिस ने फैक्ट्री को सील करके फैक्ट्री के मालिक बृजेश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया है।

लेकिन सभी जानते हैं कि थोड़े दिनों में वह जमानत पर बाहर होगा और बाद में जैसा क़ि सामान्यतः होता है सुबूत और गवाहों के अभाव में बाईज्जत बरी हो जायेगा।

आज श्रम कानूनों को ताक पर रख कर मज़दूरों के घनघोर शोषण के खिलाफ संघर्ष के साथ साथ मज़दूरों के जीवन की सुरक्षा का सवाल मज़दूर आंदोलन के लिए तात्कालिक चुनौती बन गया है। मज़दूर आंदोलन को इस सवाल को संबोधित करना ही होगा।

(नागेंद्र कुमार इंकलाबी मजदूर केंद्र के उपाध्यक्ष हैं।)

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Posted On : 10 04 2018 10:11:25 PM

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