Last Update : 12 10 2017 11:35:56 AM

पार्टियों को संजीवनी देने के काम आने लगे हैं भ्रष्टाचार के खुलासे

भ्रष्टाचार के सनसनीखेज खुलासों से पार्टियां तो फर्श से अर्श पर पहुंच जाती हैं, लेकिन जनता का टके भर का भी फायदा नहीं होता, अलबत्ता वह साल—दर—साल भ्रष्टाचार के और जटिल और नए—नए तरीकों से पीसी जाती है...

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पंत का विश्लेषण

कहते हैं इतिहास ख़ुद को दोहराता है। और जब राजनीति में ऐसा होता है तो भूचाल सा पैदा होने लगता है क्योंकि कल जो आरोप लगा रहे होते हैं वे आज खुद को उन्हीं आरोपों से घिरा पाने लगते हैं।

कुछ ऐसा ही हुआ है एक न्यूज़ पोर्टल 'द वॉयर' में छपी पत्रकार रोहिणी सिंह की रिपोर्ट के बाद। रोहिणी ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) में दाखिल किए गए दस्तावेजों की पड़ताल करने के बाद अपनी खोजी रिपोर्ट में यह बात कही है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की स्वामित्व वाली कंपनी टेंपल एंटरप्राइज प्राइवेट लिमिटेड का सालाना टर्नओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और पिता अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद 16,000 गुना बढ़ गया.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी की बैलेंस शीटों और आरओसी से हासिल की गई वार्षिक रिपोर्टों से ये बात उजागर होती है कि 2013 और 2014 के मार्च में समाप्त होने वाले वित्तीय वर्षों में शाह की टेंपल एंटरप्राइज़ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कोई ख़ास उल्लेखनीय कारोबार नहीं कर रही थी और इन वर्षों में कंपनी को क्रमशः 6,230 और 1,724 रुपये का घाटा हुआ. 2014-15 में कंपनी ने महज 50,000 के राजस्व पर 18,728 रुपये का लाभ दिखाया. 2015-16 में कंपनी का टर्नओवर आसमान में छलांग लगाते हुए बढ़कर 80.5 करोड़ रुपये को छू गया.

रिपोर्ट आगे कहती है कि टेंपल एंटरप्राइज़ के राजस्व में यह हैरान करने वाली बढ़ोत्तरी एक ऐसे समय में हुई जब कंपनी को राज्यसभा सांसद और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शीर्ष एक्जीक्यूटिव परिमल नाथवानी के समधी राजेश खंडवाला के स्वामित्व वाली एक वित्तीय सेवा कंपनी से 15.78 करोड़ रुपये का असुरक्षित कर्ज मिला था।

हालांकि, एक साल बाद अक्टूबर, 2016 में जय शाह की कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों को अचानक पूरी तरह से बंद कर दिया. निदेशकों की रिपोर्ट में यह कहा गया कि पिछले वर्ष हुए 1.4 करोड़ रुपये के घाटे और इससे पहले के सालों में होने वाले नुकसानों के कारण कंपनी का नेटवर्थ पूरी तरह से समाप्त हो गया है।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि 2014-15 में टेंपल एंटरप्राइज़ के पास कोई अचल संपत्ति नहीं थी. न ही इसके पास कोई इनवेंट्री या स्टॉक था. इसे 5,796 रुपये का इनकम टैक्स रिफंड भी मिला. 2014-15 में इसने 50,000 रुपये के राजस्व की कमाई की. लेकिन 2015-16 में कंपनी का राजस्व आश्चर्यजनक ढंग से बढ़कर 80.5 करोड़ रुपये हो गया.

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एक साल पहले जहां कम मियाद के कर्जे और पेशगी के तौर पर ली गई रकम कुल 10,000 रुपये की थी, वहीं यह बढ़कर इस साल 4.14 करोड़ रुपये हो गई. पिछले साल जहां गोदामों में कुछ नहीं था, वहीं इस साल यह बढ़कर 9 करोड़ के बराबर का हो गया.राजस्व में होने वाली इस भारी बढ़ोत्तरी को फाइलिंग में ‘उत्पादों की बिक्री’ से हुई प्राप्ति के तौर पर दिखाया गया है. इसमें 51 करोड़ रुपये की विदेशी आय भी शामिल है. एक साल पहले विदेशी आय भी शून्य थी.

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने से भारतीय जनता पार्टी का तमतमाना लाजिमी था। जो पार्टी 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना सत्ता में आई थी और जिसका अध्यक्ष अमित शाह और प्रधान मंत्री मोदी कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद द्वारा अर्जित संपत्ति को लेकर तंज कसने से बाज नहीं आते थे, आज उसी पार्टी के अध्यक्ष के बेटे की कंपनी संदेह के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है। और पार्टी तो दूर, सरकार के मंत्रियों तक को उसके बचाव में आना पड़ रहा है।

ग़ौरतलब है कि इसी पत्रकार रोहिणी सिंह की कांग्रेस के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की कारगुजारियों का भांडा फोड़ करती एक रिपोर्ट 2011 में इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपी थी। तब भारतीय जनता पार्टी ने इसे हाथों-हाथ लिया था और प्रधानमंत्री तो सन्दर्भ के रूप में इसका इस्तेमाल अपने चुनावी भाषणों में 2017 के शुरुवाती महीनों तक करते रहें हैं।

लेकिन अब जब उनकी ही पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के बेटे की कंपनी व्यापारिक हेराफ़ेरी के आरोपों से घिर गयी है तो उनके भाषणों की धार कुंद होने का ख़तरा पैदा हो गया है। इसीलिये भारतीय जनता पार्टी के नेता और पार्टी की विभिन्न सरकारों के मंत्रीगण बढ़-चढ़ कर पार्टी अध्यक्ष के बेटे का बचाव करने में लगे हैं।

उन्हें डर है कि विपक्षी दलों, ख़ासकर कांग्रेस द्वारा यह राजनीतिक मुद्दा ना बना लिया जाए और अध्यक्ष के बेटे की पैरवी करते-करते 2019 का आम चुनाव उन्हें भारी न पड़ जाए। कुछ उसी तरह जैसे कोंग्रेसियों को रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करने में तीन साल गुजर गए और २०१४ मुंह बाये सामने खड़ा हो गया।

भारतीय जनता पार्टी चाहे ना चाहे, रोहिणी सिंह द्वारा किये गए खुलासे का राजनीतिक मुद्दे में तब्दील होना तय है। एक तरह से इस खुलासे ने कांग्रेस के लिए संजीवनी का और भारतीय जनता पार्टी के भ्रष्टाचार को लेकर ज़ीरो टॉलरेंस रूपी गुब्बारे की हवा निकालने का काम किया है। निसंदेह कांग्रेस इसे अब 2019 के चुनाव तक जिलाये रहेगी।

लेकिन सवाल यह है कि मीडिया द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष पर बैठे लोगों के रिश्तेदारों के भ्रष्टाचार का खुलासा महज राजनीतिक हथियार बन कर क्यों रह जाता है ? इन खुलासों की बाक़ायदा तहक़ीक़ात कर दोषियों को सज़ा क्यों नहीं दिलाई जाती ?

ज़रा याद कीजिये 2014 का लोकसभा चुनाव। भारतीय जनता पार्टी के नेता गला फाड़ के कहते थे कि सत्ता में आने के बाद रॉबर्ट वाड्रा की जगह जेल में होगी लेकिन आज तक वो छुट्टा घूम रहे हैं। इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस द्वारा छापे गए पनामा पेपर्स में उद्घाटित किये गए नामों के खिलाफ सरकार द्वारा अब तक कोई कार्यवाई नहीं की गयी है। तो क्या ये मान लिया जाये कि राजनीतिक दलों द्वारा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भरी जाने वाली हुंकार जनता को भरमा कर वोट बटोरने की साज़िश भर होती हैं ?

ऐसे में ये सवाल भी उठता है कि भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाला मीडिया क्या चौथे खम्भे की अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा होता है या फिर किसी न किसी राजनीतिक दल के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा होता है ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्रकार रोहिणी सिंह के खुलासे के माध्यम से 2011 में इकोनॉमिक टाइम्स भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा था और अब 2017 में द वॉयर कांग्रेस के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा हो ?

पेड न्यूज़ और गोदी मीडिया के इस दौर में कुछ कह पाना मुश्किल है लेकिन पत्रकार रोहिणी सिंह ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। अपनी फेसबुक वॉल पर ८ अक्टूबर को लिखी एक टिप्पणी में वे कहती हैं- मैं इस बारे में पाखण्डतापूर्ण टिप्पणी नहीं लिखना चाहती कि दूसरे पत्रकारों को क्या करना चाहिए। मैं केवल अपने बारे में कह सकती हूँ। मेरा मुख्य कार्य सत्ता से सच बोलना है, वर्तमान सरकार से सवाल करना है। मुझे नहीं याद आता कि जिस तरह का पलटवार अब मैं देख रही हूँ वैसा २०११ में देखने को मिला था जब मैंने रॉबर्ट वाड्रा के डीएलएफ के साथ व्यापारिक सांठ-गांठ का खुलासा किया था। .........किसी बड़े बीजेपी नेता का करीबी एक व्यक्ति डींग मारता रहता है कि पार्टी मुखियाओं के पास हमारे फ़ोन कॉल रिकॉर्ड्स हैं ( मैं कहती हूँ यह उनके लिए अच्छा है ). और हाँ, ऑन लाइन चलाया जा रहा बदनाम करने का अभियान।

रोहिणी आगे लिखती हैं, 'धमकी और प्रताड़ना ऐसे दो हथियार हैं जिनका इस्तेमाल शक्तिशाली लोग पत्रकारों पर नकेल कसने के लिए करते हैं। किसी के द्वारा कही गयी एक मशहूर पंक्ति है : ख़बर वो होती है जिसे कोई न कोई दबाना चाहता है, बाकी सब विज्ञापन है। मैं दूसरों के बारे में तो नहीं कह सकती लेकिन मैं इसके महत्व को नहीं खोना चाहती। जिस तरह की पत्रकारिता मेरे इर्द-गिर्द हो रही है वैसा करने के बजाय मैं पत्रकारिता छोड़ देना पसंद करूंगी।'

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पर सवाल यह है कि मीडिया द्वारा भ्रष्टाचार के खुलासों के पहले लाभार्थी जनता की बजाय नेता क्यों बनते हैं और भ्रष्टाचार के खुलासों का असर सिस्टम में ईमानदारी बढ़ने की जगह राजनीतिक पार्टियों की सीटें क्यों बढ़ने में होता है? इस पर विचार किए बगैर इन खुलासों के असल मकसद नहीं समझ में आएंगे। राजनीतिक दल बदलते रहेंगे पर जनता की स्थिति जस की तस बनी रहेगी।

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Posted On : 12 10 2017 11:04:37 AM

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