Last Update : 26 07 2017 02:46:30 PM

आज ही क्यों न करें सेना के चरित्र पर बात

26 जुलाई कारगिल दिवस पर विशेष

आज सेना पेशावर कांड के जननायक मेजर चन्द्रसिंह गढ़वाली के मानवीय आदर्शों से भी कोसों दूर है, जिन्होंने अप्रैल 1930 में आजादी की लड़ाई में शामिल निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था...

पूर्व आइपीएस वीएन राय का विशेष लेख

आज, कारगिल दिवस पर हमें भारतीय सेना की शानदार शौर्य-बलिदान गाथा को अवश्य याद करना चाहिए। 26 जुलाई, 1999 की कारगिल विजय में 527 बहादुरों की शहादत और 1357 के गंभीर घायल होने की कीमत को कौन भूल सकता है। उन्होंने मातृभूमि का कर्ज ही नहीं उतारा था, बल्कि अपने जनरलों की उन रणनीतिक निगरानी भूलों का खामियाजा भी भुगता था जिनके चलते प्रकृति के भरोसे खाली छोड़े भारतीय ठिकानों पर तत्कालीन पाक सेनाध्यक्ष मुशर्रफ की सेना कब्ज़ा कर बैठ गयी थी।

आज के युद्ध-केन्द्रित तनाव भरे माहौल में भावी उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने पाकिस्तान को 1971 याद करने को कहा है और इससे पहले चीनी सेना की ओर से हमारे रक्षा मंत्री जेटली को 1962 की याद दिलायी गयी थी। बहरहाल, इन जैसे पिलपिले बयानों की बात नहीं भी करें, तो भी प्रधानमन्त्री मोदी की टिप्पणी कि कारगिल भारत की सैन्य-शक्ति का सूचक है,सिर्फ एक-आयामी दावा भर हो सकता है।

हाल में, अनुशासित सैन्यकर्मियों के हाथों कश्मीर के एक नाके पर तैनात पुलिस वालों की पिटाई को सेना के सामंती संगठन के चश्मे से ही देखना पड़ेगा। यूं समझिये जैसे सामंती व्यवस्था में जीने वाला एक बड़ा सामंत अपने से छोटे सामंत को पीट गया हो। ध्यान रहे, सत्तर वर्ष पुराने भारतीय लोकतंत्र में सेना और पुलिस दोनों का वही औपनिवेशिक जमाने का सामंती ढांचा ही चला आ रहा है।

ठीक है, यह ब्रिटिश हुकूमत की वह सेना नहीं जिसने जनरल डायर के तानाशाही आदेश पर 1919 बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में नागरिकों की सभा को गोलियों से भून दिया था। पर यह पेशावर कांड के जन-नायक मेजर चन्द्र सिंह गढ़वाली के मानवीय आदर्शों से भी कोसों दूर है, जिन्होंने अप्रैल 1930 में आजादी की लड़ाई में शामिल निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था।

हम सभी सामान्यतः सेना के शौर्य और बलिदान की गाथाओं के कायल लोग हैं। लिहाजा सैन्य सौदों में रिश्वत या सैन्यकर्मियों की स्वेच्छाचारिता सामान्य तौर पर हमारी बहस के मुद्दे नहीं बनते। कभी अवसर निकालकर स्वदेश दीपक के सर्वकालिक नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ में सेना की उघड़ी सामंती परतों से बेतरह चौंका देने वाला साक्षात्कार कीजिये। नाटक में अफसरों की जातिसूचक गालियों समेत तरह-तरह से प्रताड़ित जवान अंततः अपने अफसरों पर गोलियां चला देता है।

मुझे याद आता है, स्वदेश दीपक भी अम्बाला में रहते थे और ‘कोर्ट मार्शल’ के एक बड़े प्रशंसक भाजपा के वरिष्ठ नेता सूरजभान भी। दीपक के साथ दर्जनों बार कोर्ट मार्शल देखने के दौरान सूरजभान मुझे कोई तीन बार मिले होंगे। हर बार उन्होंने नाटक के अंत में हमसे कहा की सवार रामचंदर को और मार गिराने चाहिए थे। हालाँकि, उनका गुस्सा जायज होते हुये भी, एक तरह से वे सेना के सम्पूर्ण सामंती कलेवर पर अंगुली उठाने से बचते ही रहे।

क्या आपने गौर किया, कश्मीर के तनावपूर्ण कार्य माहौल में दो वरिष्ठों को फलांग कर सेनाध्यक्ष बने जनरल बिपिन रावत ने मेजर गोगोई प्रसंग में तो जम कर हांकी थी, लेकिन मेजर थापा प्रसंग में बोलने को कुछ नहीं बचा था उनके पास भी। क्या मानव कवच की रणनीति पर सामंती हेकड़ी दिखाने वाले सेनाध्यक्ष को अपने ही जवान के हाथों एक होनहार सैन्य अफसर के मारे जाने की त्रासद शर्म में डूब जाना श्रेयस्कर नहीं होगा?

उपरोक्त प्रसंग में सेना के पीटने पर कश्मीर पुलिस ने मुक़दमा अवश्य दर्ज कर लिया। हालाँकि,सेना और पुलिस दोनों और से तुरंत यह भी बताया गया कि मामले को सुलटा लिया गया है। यानी, अपनी नाक ऊंची दिखाना ही सर्वोपरि, कानून के प्रति जवाबदेही गौण। एक खालिस सामंती तौर-तरीका! लोकतान्त्रिक कायदे से दोनों पक्षों को अराजकता के इस सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए हतप्रभ नागरिकों से माफ़ी मांगनी चाहिए थी। लेकिन जो सुरक्षा बल एक दूसरे के प्रति ही शालीन नहीं, वे नागरिकों को क्या आश्वस्त करेंगे।

मुख्यधारा मीडिया के प्राइम टाइम में, जहाँ कश्मीर की हर छोटी मोटी मार-धाड़ भी सुर्खी बन जाती है, इस खबर को लेकर सन्नाटा क्यों है? दरअसल, देश में एक नहीं तीन पवित्र गाय हैं। चौपाया गाय तो है ही अंध श्रद्धा का केंद्र, सेना और न्यायपालिका भी उसी वर्जित श्रेणी में रखे जाते हैं। जैसे मीडिया, पोलिथीन चरती गाय को प्राइम टाइम की विषयवस्तु नहीं बनाता, वैसे ही नागरिकों को सामंती धौंस देती सेना और औपनिवेशिक न्याय प्रणाली का खोल ओढ़े न्यायालयों को भी नहीं।

क्या होता है जब एक लोकतंत्र में सुरक्षा के सामंती चरित्र पर सवाल नहीं उठता? कैग की टिप्पणी कि सेना के पास दस दिन युद्ध लड़ने का ही गोला बारूद उपलब्ध है,तो सैन्य व्यापार में नए उतरे धुरंधर क्रोनी कॉरपोरेट मुनाफाखोरों, अम्बानी-अदानी की कृपा से मीडिया की सुर्ख़ियों में पहुँच जाती है। वहीं राइट टू एजुकेशन एक्ट के बावजूद स्कूली शिक्षा तक का करोड़ों बच्चों की पहुँच में न होना, मीडिया का वैसा ही ज्वलंत सरोकार नहीं बनता!

(पूर्व आइपीएस वीएन राय सुरक्षा और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं।)

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Posted On : 26 07 2017 02:43:34 PM

जनज्वार विशेष