Last Update : 08 08 2017 09:18:58 PM

पूंजीपतियों का मुंशी निकला जनता के खजाने का चौकीदार

देश का प्रधान जब मंचों से बोल रहे थे तब लोगों को लगा कि सच में वह सेवक साबित होंगे। लेकिन अमित शाह के शब्दों में कहें तो सबकुछ जुमला साबित हुआ...

शशांक यादव, विधान परिषद सदस्य, उत्तर प्रदेश

अपने जीवन के लगभग दो तिहाई हिस्से यानी 38 महीने बिता चुकी भाजपा की दिल्ली सरकार अब खुलकर अपने रंग में आ चुकी है। अपेक्षित परिणामों का न पाने की हड़बड़ाहट मोदी से लगाकर प्रदेश और जिला संगठनों तक साफ झलक रही है।

गोवा, मणिपुर, अरूणाचल, बिहार में किसी भी कीमत पर सरकार बनाने की जद्दोजहद, आयकर विभाग और सीबीआई का बेशर्म इस्तेमाल मीडिया को चंगुल में फँसाये रखना आधे दर्जन से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले पत्रकारों को पद छोड़ने पर मजबूर होना कहीं न कहीं भाजपा के अन्दर की छटपटाहट को दिखा रहा है।

किसी भी राजनीतिक दल ने हिन्दुस्तान की राजनीति में सत्ता का इतना बेशर्म इस्तेमाल नहीं किया। कांग्रेस के आपातकाल में भी सत्ता के दुरूपयोग के बाद कुछ लाज शर्म भारत में मूल बहुलतावादी चरित्र की रखी गई थी। राष्ट्रपति सहित देश के कई प्रतिष्ठान मुस्लिम व अन्य अल्पसंख्यक काबिज रहे।

मौजूदा हालात लगता है कि भाजपा किसी इशारे पर चल रही है। जिन योजनाओं का भाजपा व आरएसएस ने जमकर विरोध किया था, मसलन मनरेगा, आधार कार्ड, जीएसटी, नोटबंदी और आयकर कानून में कड़े प्रतिबन्ध, आज वे सबके सब ज्यादा ताकत के साथ लागू कर दिये गये हैं। ऐसा इसलिये कि पहले इनको लागू करने के लिये पूंजीपतियों का कांग्रेस पर दबाव था, लेकिन कांग्रेस सर्वानुमति बनाने की कोशिश में और राहुल गाँधी की साफगोई की उलझन में फँस गई।

छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उडीसा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत की खनिज संपदा की लूट और स्थानीय नागरिकों के प्रतिरोध को पूरी ताकत के बाद भी कांग्रेस नही संभाल पाई, तब अमेरिका में बैठी पूँजीपति लॉबी ने दक्षिणपंथी भाजपा पर दाँव लगाया। सरकार बनाने में वह सफल भी रहे, लेकिन एक चूक कर गये।

वह भूल गये कि 543 लोकसभा सीटों में से 400 से ज्यादा लोकसभा सांसद जिनके मतदाता 80 फीसदी खेती—किसानी व गाँव में रहने वाले हैं। इन सब मुद्दों से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए धार्मिक उन्माद का सहारा लिया गया। गोवध कानून, तीन तलाक पर बहस, कब्रिस्तान बनाम श्मशान जैसे मसले जनता पर काफी असर करते हैं। इसके लिए देशभर में सात लाख से ज्यादा पूर्णकालिक प्रचारकों को झोंका गया।

इतना सब करने पर भी भाजपा के आका डरे हुये हैं, क्योंकि केन्द्र में बैठी मोदी सरकार सिर्फ 31 प्रतिशत मत लेकर राज कर रही है। देश का 69 प्रतिशत मतदाता भाजपा के मिजाज के खिलाफ है। 2 प्रतिशत मतदाता का झुकाव भी तख्ता पलट करने के लिए काफी है।

मोदी जी की डोर आरएसएस के पास नहीं है। इसकी डोर पूँजीपतियों के पास है, क्योंकि नवाब शरीफ खुद ही बता सकते हैं कि बिना कार्यक्रम मोदी जी पाकिस्तान जन्मदिन की मुबारकबाद देने गये थे कि अडानी—अम्बानी के पावर हाउस की स्वीकृति दिलाने।

प्रोटोकाल तोड़कर मोदी जी का शेख हसीना से मिलना और 5 हजार हेक्टेयर के बदले 17 हजार हेक्टेयर भूमि बांग्लादेश को देना संबंध सुधारने के लिये था या अम्बानी के बाग्लादेश में पावर प्रोजेक्ट की भूमिका तैयार करने के लिये।

सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग यह कभी नहीं बतायेगा कि नोटबंदी से किसका भला हुआ और शुरूआत में जिओ सिम के लिये माँगे गये आधार कार्ड का कुछ लोगों ने नोट बदलने में गलत इस्तेमाल किया या नहीं, क्योंकि शुरू के 1 सप्ताह में कोई रिकॉर्ड रखा ही नहीं गया। मोदी सरकार के तीन सालों कार्यकाल में लगभग सुरक्षा बलों के 700 जवानों की शहादत रिकार्ड है।

पाकिस्तान व चीन सीमा उल्लंघन के लिए शहीद हुए सैनिकों में इसमें शामिल करें तो कुल मिलाकर आंकड़ा हजार के पार पहुँच गया है। नक्सली हिंसा में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के बराबर ही जवान शहीद हुये हैं, लेकिन मीडिया में सिर्फ प्रायोजित पाकिस्तानी आतंकवाद की चर्चा है।

2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा करने वाली सरकार के तीसरे साल में मात्र हजारों की संख्या में सरकारी भर्तियां हुई हैं। शोर मचाया जा रहा है कि कौशल विकास से 7 करोड़ से ज्यादा रोजगार सृजित हुए हैं।

जीएसटी की मार से सूरत के कपड़ा व्यापारियों का आंदोलन, हथकरघा और छोटे उद्यमियों की बर्बादी और किसानों की बढ़ती कर्ज के कारण आत्महत्यायें हमारी संवेदना से दूर हैं। नौजवानों की अपराध में बढ़ती भागीदारी और स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में सरकार का लगातार कम खर्च असर दिखा रहा है। यूपी के दो लाख के लगभग शिक्षामित्रों की बेकारी इसकी एक बानगी है।

मीडिया के जरिये विपक्ष की आपसी फूट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी आर्थिक मंदी के चलते तथा धर्म के सम्मान के बढावे के प्रचार से चीजें दबी हैं। धार्मिक भावनाएं एक न एक दिन रोजी—रोटी की माँग के नीचे दब जाती हैं। यही कारण है कि दो प्रतिशत वोटों के बिखराव को रोकने के लिये सत्ता के हर तंत्र पर हर कीमत पर कब्जा करने की पूँजीवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कोशिशें मोदी सरकार को नंगे, भद्दे और फूहड़ और अलोकतांत्रिक फैसले लेने पर मजबूर कर रहा है।

इन्हीं सब कारणों के चलते केन्द्र ही नहीं भाजपा सत्तासीन प्रदेश सरकारों में भी हड़बड़ी मची है। राज्य सभा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति ही नहीं विधान परिषद सदस्य, नगर पालिका हर कहीं सत्ता व सीबीआई आयकर विभाग के दम पर पासे फेंके जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री की सीटें फँसी हुई हैं। मात्र 6 महीने का समय है, लेकिन वे इस्तीफा देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। यह सब इसलिये क्योंकि पूँजीपति जानता है कि जनता में आक्रोश पनप रहा है, लेकिन विपक्ष उसे भुना नहीं पा रहा है।

कांग्रेस द्वारा लगाए गए आपातकाल में इन्दिरा जी को लगता था कि विपक्ष है ही नहीं, मैं सफल रहूँगी। मगर भाजपा सरकार होशियार है। इसको मालूम है कि जब तक धर्म के नाम गोलबंदी पूरी नहीं होगी, तब तक पूंजीपतियों के इरादे पूरे नहीं होंगे।

अभी एजेंडे में रेलवे प्लेटफार्म की बिक्री और डीजल सप्लाई रिलायन्स को मिली है। भारत सरकार के खनिज निगम के स्थान पर आस्ट्रेलिया में व्यापार के लिये स्टेट बैंक ने अडानी को चुना है। किसानों के एक लाख करोड़ एनपीए की मदद ठुकराते हुये पूँजीपतियों को तीन लाख करोड़ की राहत मिल चुकी है और 6 लाख करोड रुपये का एनपीए बाकी है। गैस पर सब्सीडी खत्म करने से शक पैदा हो रहा है कि कहीं अंबानी की रिलायन्स कंपनी अपनी गैस बेचने तो नहीं आ रही है।

भाजपा ने पहले कहा कि कांग्रेसमुक्त भारत बनायेंगे, फिर एक कदम और आगे बढ़ गये कि रामराज्य लायेंगे क्योंकि रामराज्य में विपक्ष था ही नहीं।

दलित—पिछड़ों का आरक्षण खत्म करने की साजिश जारी है। नीट के एमबीबीएस प्रवेश में पैसों का खेल जाहिर हो चुका है। उत्तर प्रदेश में पुलिस दरोगाओं की भर्ती प्रक्रिया रद्द हो गई है। उत्तर भारत में गौवध प्रतिबंध रहेगा, भीड़ धर्म के नाम पर पीटकर हत्या करेगी।

पूर्वोत्तर व गोवा में भाजपा गौ मांस की दावतें जारी रहने देगी। उत्पादन घट रहा है। रोजगार सृजन बंद है। किसान मरने को मजबूर हैं और खुद भाजपा का आत्मसम्मानी कार्यकर्ता धन्नासेठों के दखल से परेशान हैं। यह सरकार विचारधारा छोड़कर हिन्दुत्व के नाम पर अडानी सरीखों की गुलाम बन चुकी है, मगर आरएसएस खामोश है।

जनपक्षधर पत्रकारिता को सक्षम और स्वतंत्र बनाने के लिए आर्थिक सहयोग दें। जनज्वार किसी भी ऐसे स्रोत से आर्थिक मदद नहीं लेता जो संपादकीय स्वतंत्रता को बाधित करे।
Posted On : 08 08 2017 07:38:54 PM

विमर्श