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घरेलू कामगारों के बेहतरी की कोशिश

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धीरे-धीरे ही सही शहरों में अब कामवाली बाइयों की यूनियनें गठित होने लगी हैं। राज्य सरकारें भी उसके अधिकारों और सम्मान के बारे में सजग हो चली हैं...

आशीष वशिष्ट

उदारीकरण के बाद के वर्षों में देश में आय वितरण की बढ़ती विषमता के कारण एक ओर जहां मध्यमवर्गीय लोगों की संख्या में बढ़ी, वहीं गरीबी के शिकार लोगों की संख्या में भी वृद्धि हुई। इस प्रक्रिया में एकल परिवारों और नौकरी करने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी, जिसके कारण घरेलू कामगार खासकर महिलाओं की मांग बढ़ी। वर्ष 1999-2005 के बीच घरेलू काम करने वाली महिलाओं की संख्या 22.5 लाख हो गयी थी।

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फिलहाल देश भर में कामकाजी महिलाओं की संख्या कितनी है इसका कोई आंकड़ा नहीं निकाला गया है, लेकिन इनकी संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, जिनमें से अधिकांश कई घरों में काम कर अपना गुजारा चलाती हैं। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ता है क्योंकि एक-दो घरों में काम कर परिवार का पोषण नहीं कर सकतीं।

काम के दबाव के कारण घरेलू काम से जुड़ी महिलाएं आमतौर पर पीठ दर्द, थकावट आदि का शिकार हो जाती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से अधिकांश महिलाओं के रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 3 ग्राम ही पाई गई है, जबकि इसका सामान्य स्तर 11.5 ग्राम से 15.5 ग्राम होता है। स्वास्थ्य खराब होने पर भी इनके लिए चिकित्सा प्राप्त करना कठिन होता है, क्योंकि सार्वजनिक अस्पतालों में लगने वाला समय उनके पास नहीं होता और निजी चिकित्सा सेवा की लागत चुका पाना इनके बस की बात नहीं है।

पिछले कुछ वर्षों में इन्हें काम दिलाने के नाम पर अनेक प्लेसमेंट एजेंसियां भी स्थापित हो गई हैं जो इनका शोषण ही करती हैं। पर्याप्त आय और बेहतर कार्य स्थल वाले रोजगार दिलाने के नाम पर एजेंट इन्हें शहरों में ले जाते हैं। युवा लड़कियों को अच्छे वर से शादी कराने के झांसा देकर भी आवास से काफी दूर शहरों में घरेलू कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है तथा उनका शारीरिक शोषण तक किया जाता है।

अकेले दिल्ली में 800 से 1000 के मध्य ऐसे प्लेसमेंट एजेंसिया कार्य कर रही हैं। यही स्थिति मुंबई, कोलकाता, चैन्नई जैसे शहरों में भी है। इन्हें शोषण से बचाने के लिए राज्य सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाए हैं। कामवाली बाइयों की बढ़ती संख्या, कार्य की विविधता, कार्य लेने वालों की निरंतर बढती संख्या के कारण इन्हें कानूनी सुरक्षा देने का कार्य काफी चुनौतीपूर्ण होते हुए भी आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो गया है।

गौरतलब है कि धीरे-धीरे ही सही शहरों में अब कामवाली बाइयों की यूनियनें गठित होने लगी हैं। राज्य सरकारें भी उसके अधिकारों और सम्मान के बारे में सजग हो चली हैं। लोकसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल में लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण संबंधी विधेयक 2010 पटल पर रखा गया था। यद्यपि इसमें घरेलू नौकरानियों के दैहिक शोषण के संबंध में स्पष्ट व्याख्या नहीं थी।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घरों में काम करने वाली महिलाओं को कामवाली बाई के बदले बहन जी अथवा दीदी के संबोधन से पुकारने की अपील की। उनका मानना है कि इससे घरेलू कामकाज करने वाली औरतों के सम्मान को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने घरेलू नौकरानियों की महापंचायत के आयोजन किए जाने का भी आह्वान किया। उन्हें फोटोयुक्त परिचय पत्र तथा प्रशिक्षण दिए जाने की योजना है।

महाराष्ट्र और केरल की भांति दिल्ली राज्य सरकार घरेलू कामगार एक्ट लागू करने के लिए प्रयास कर रही है। जिनके अंतर्गत कामवाली बाई को साप्ताहिक अवकाश के साथ-साथ अन्य सुविधाएं लेने की भी पात्र होंगी। दिल्ली सरकार के श्रम विभाग द्वारा साप्ताहिक अवकाश, न्यूनतम वेतन तथा अन्य सुविधाओं का खाका तैयार किया जा चुका है। यह लाभ उन सभी कामवाली बाइयों को मिलेगा जो अपना पंजीयन कराएंगी। यदि वह सब यथावत होता है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि कामवाली बाइयों की जीवन दशा में सकारात्मक सुधार होकर रहेगा।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से घरेलू श्रमिकों के लिए तैयार की जा रही राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार कर लिया है। नीति के तहत करीब 64 लाख घरेलू श्रमिकों को शामिल करने का अनुमान है। नीति के मसौदा प्रस्ताव के तहत न्यूनतम वेतन, सामान्य कार्य के घंटे, अतिरिक्त काम करने पर मुआवजा (ओवरटाइम), वेतन के साथ वार्षिक अवकाश और चिकित्सा अवकाश को शामिल किया गया है।

इसके साथ ही श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व लाभ और यौन शोषण से सुरक्षा जैसे मसलों को भी जोड़ा गया है। इन बदलावों को शामिल करने के लिए मंत्रालय 8 मौजूदा कानूनों में संशोधन की योजना बना रहा है। इन कानूनों में न्यूनतम मजदूरी कानून, ट्रेड यूनियन कानून, श्रमिक मुआवजा कानून आदि शामिल हैं। हालांकि श्रमिक का मामला राज्य सरकार के तहत आता है। ऐसे में केंद्र सरकार को इस मामले में राज्यों के साथ भी सहमति बनानी होगी।

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