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विमर्श

महत्वपूर्ण लेख: कलंक लगने के बाद और मजबूत हो जाते हैं भारत के स्टार पत्रकार

Janjwar Desk
19 Jan 2021 3:05 PM GMT
महत्वपूर्ण लेख:  कलंक लगने के बाद और मजबूत हो जाते हैं भारत के स्टार पत्रकार
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रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स द्वारा प्रकाशित प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में कुल 180 देशों की सूची में भारत का स्थान 142वां था। [ Photo Edited By Nirmal Kant ]

अर्णव पर भले ही संगीन किस्म के आरोप लगे हैं लेकिन उनको मोदी का वरदहस्त प्राप्त है और भाजपा की ट्रोल सेना उनके साथ है, इसीलिए उनके सारे पापों को फर्जी देशभक्ति के नारे से धो दिया जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं.....

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार का विश्लेषण

जिन लोगों को लगता होगा कि ह्वाट्सएप चैट का खुलासा होने के बाद रिपब्लिक टीवी के मालिक पत्रकार अर्णव गोस्वामी के सितारे गर्दिश में चले जाएंगे, उनको अपनी गलतफहमी दूर करने के लिए अतीत की तरफ मुड़कर देखने की जरूरत है। अब तक भारत के जिन स्टार पत्रकारों पर जब भी कोई कलंक लगा है, वह पहले से ज्यादा ताकतवर और प्रभावशाली बनकर उभरा है। ऐसे कलंक उसके लिए अभिशाप की जगह वरदान साबित होते रहे हैं। सत्ता की दलाली, ब्लैकमेलिंग, ट्रांसफर-पोस्टिंग आदि तमाम भ्रष्ट आचरण मौजूदा भारत के पत्रकारों के आभूषण हैं। जो जितना ज्यादा भ्रष्ट है वह उतना ही बड़ा रसूखदार पत्रकार है। इस लिहाज से मौजूदा पत्रकारिता की तुलना मौजूदा राजनीति के साथ की जा सकती है, जहां अपराधी और भ्रष्ट नेताओं की ज्यादा इज्जत होती है और जिनका जनाधार हर चुनाव में पहले की तुलना में बढ़ता चला जाता है।

कायदे से किसी भी लोकतांत्रिक और नैतिक समाज में इस तरह के पत्रकारों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। लेकिन भारत का जर्जर कूपमण्डूक समाज दोहरे मापदंड का जीवन जीने में विश्वास करता है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अर्णव गोस्वामी या सुधीर चौधरी दलाली करते हुए पत्रकारिता का धंधा करते हैं। चूंकि इस सांप्रदायिक जुनून में जी रहे समाज के लोगों के लिए अपने आराध्य हिंदू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के लिए जो भक्ति का भाव है, उसके अंतर्गत दलाल पत्रकारों के पतित आचरण को भी भक्त गण अपने प्रभु की लीला का अंग मानते हैं और ऐसे आचरण की तरफ ध्यान देना जरूरी नहीं समझते।

उदाहरण के तौर पर हम जी न्यूज के एंकर सुधीर चौधरी का इतिहास देख सकते हैं। चौधरी ने उद्योगपति नवीन जिंदल की ब्लैकमेलिंग करते हुए एक सौ करोड़ रुपए की मांग की थी और इस मामले में उनको तिहाड़ जेल की यात्रा भी करनी पड़ी थी। चौधरी पर उद्योगपति नवीन जिंदल से कोयला घोटाले पर ख़बर ना चलाने के लिए 100 करोड़ रुपए मांगने का आरोप लगा था। उल्लेखनीय है कि जब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया इस बारे में जिंदल ग्रुप के साथ बात कर रहे थे तब जिंदल ग्रुप ने उनका एक सीडी बना लिया था। इस सीडी में दिखाया गया था कि ये पत्रकार पैसों की मांग कर रहे थे और कह रहे थे कि अगर उन्हें ये पैसा मिला तो वो जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक खबरें नहीं करेंगे।

एक और मामले में चौधरी ने एक स्कूल शिक्षिका पर सेक्स रैकेट चलाने की झूठी रिपोर्ट प्रचारित कर भीड़ को उस महिला पर हमला करने के लिए उकसाया था। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब चौधरी ने पत्रकारिता के पेशे को कलंकित किया। इसके बावजूद दिनों दिन चौधरी का रुतबा बढ़ता ही गया है। जी न्यूज पर चौधरी के कार्यक्रम को देशभर के भक्त चाव से देखते हैं और मोदी सरकार ने अपने इस प्रिय शावक की सुरक्षा के लिए वीआईपी श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करवाई है। अपने समस्त पाप कर्मों के बावजूद चौधरी मोदी राज का एक प्रतिष्ठित एंकर बने हुए हैं और भारत के समाज में भी उनके झूठ-फरेब को लेकर किसी को कोई दिक्कत नहीं है।

इसी प्रकार नीरा राडिया प्रकरण को याद करें तो उस समय देश के कई प्रतिष्ठित पत्रकारों की कलंक-कथा उजागर हुई थी। नीरा राडिया टेप प्रकरण ने भारत में जनसंपर्क, राजनीति और पत्रकारिता के गठजोड़ को उजागर किया था। इस प्रकरण में पहले अलग-अलग लोगों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के 104 ब्यौरे सार्वजनिक हो गए थे और इसके कारण राजनीति और पत्रकारिता के गलियारे हिल गए थे। कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के टेप कांड में प्रख्यात संपादक वीर सांघवी, प्रख्यात पत्रकार बरखा दत्त और कई अन्य प्रमुख पत्रकार कांग्रेस में अपने रसूख के दम पर डीएमके को विभाग दिलाने और किसी खास नेता को खास विभाग का मंत्री बनवाने के अभियान में शामिल थे।लेकिन सत्ता की दलाली के स्पष्ट आरोपों के बावजूद उन स्टार पत्रकारों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत उनका रुतबा पहले की तुलना में अधिक बढ़ता ही नजर आया।

सिर्फ तहलका के संपादक तरुण तेजपाल का मामला ऐसा है जिसे अपवाद कहा जा सकता है। यौन उत्पीड़न का आरोप लगने के बाद तेजपाल का समूचा कैरियर चौपट हो गया और उनको जेल की हवा खानी पड़ी। इससे भारतीय समाज के मापदंड का भी अनुमान लगाया जा सकता है जो यौन उत्पीड़न के आरोप को गंभीर मानता है, लेकिन सत्ता की दलाली या व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोपों को नजरंदाज करता है।

अर्णव पर भले ही संगीन किस्म के आरोप लगे हैं लेकिन उनको मोदी का वरदहस्त प्राप्त है और भाजपा की ट्रोल सेना उनके साथ है, इसीलिए उनके सारे पापों को फर्जी देशभक्ति के नारे से धो दिया जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं। जिस बेहयाई के साथ मोदी सरकार के सारे अंग और भक्त वृंद अर्णव का बचाव करते रहे हैं, उसका उदाहरण सुप्रीम कोर्ट में जमानत के तौर पर पूरा देश देख चुका है। अर्णव के चैट से देश की सुरक्षा को खतरा होता है और उससे स्वयं मोदी को कोई दिक्कत नहीं है बल्कि उनकी आपसी सहमति है, तो अर्णव का कोई क्या बिगाड़ सकता है?

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